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राधा जन्मोत्सव:राधाष्टमी पर प्रभु के श्रीअंग पर हीरे, मोती-माणक और स्वर्ण जड़ाव के आभरण धराए

नाथद्वारा11 दिन पहले
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  • प्रभु श्रीकृष्ण से लगभग एक वर्ष पूर्व राधाजी का जन्म हुआ लेकिन राधजी नेे नेत्र नहीं खोले

भाद्रपद शुक्लपक्ष अष्टमी मंगलवार को श्रीजी प्रभु की हवेली में राधा जन्मोत्सव पर्व मनाया। बालस्वरूपों को अलौकिक शृंगार धराकर राग, भोग सेवा के लाड़ लडाए। राधाष्टमी प्रभु श्रीकृष्ण की अर्धांगिनी श्रीराधारानी का जन्मदिन है। पुष्टिमार्ग में मंगलवार का उत्सव भी जन्माष्टमी की भांति ही मनाया। गत भाद्रपद कृष्ण पंचमी के दिन केसर से रंगे गए वस्त्र जन्माष्टमी एवं राधाष्टमी दोनों उत्सवों पर श्रीजी को धराए। आगामी वामन द्वादशी को धराए जाने वाले वस्त्र भी उसी दिन रंगे जाते हैं। श्रीप्रभु की स्वामिनीजी श्री राधिकाजी का प्राकटय बृज के बरसाना गांव में वृषभान नामक गोप के यहां माता कीर्तिरानी के गर्भ से हुआ था। प्रभु श्रीकृष्ण से लगभग एक वर्ष पूर्व राधाजी का जन्म हुआ लेकिन राधजी नेे नेत्र नहीं खोले।

11 माह 15 दिवस बाद जब गोकुल में नंदरायजी के यहां प्रभु श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ और बधाई में जब थाली-मांदल बजाए तब नेत्र खोले थे। राधिकाजी के प्राकट्य के समय अलौकिक बालिका के दर्शन करने नारद मुनि, गर्गाचार्य जी, शांडिल्य मुनि पधारे थे। उत्सव होने से श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी को हल्दी से लीप कर आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बांधी गई। मंगला झांकी के बाद प्रभु को चंदन, आंवला एवं फुलेल से अभ्यंग स्नान कराया। गोपी वल्लभ के भोग के बाद स्वामिनीजी के शृंगार धराए। प्रभु के मुखारविंद पर चंदन से कपोलपत्र मांड़े। श्रीजी प्रभु को केसरी रंग की जामदानी की रुपहली फूल वाली किनारी से सुसज्जित चाकदार, चाेली व रेशम का लाल रंग का सुनहरी छापा का सूथन अंगीकार कराया। श्रीमस्तक पर केसरी रंग की कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, पांच मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ एवं बायीं ओर शीशफूल सुशोभित किया। श्रीकर्ण में मकराकृति कुंडल धराए गए। प्रभु को मेघश्याम ठाड़े वस्त्र धराए।

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