धरियावद-वल्लभनगर चुनाव के बड़े सैटबैक:रणधीर सिंह भींडर 28 साल और 7 चुनाव में पहली बार तीसरे स्थान पर रहे

उदयपुरएक वर्ष पहले
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राजस्थान में दोनों सीटों पर आए उपचुनाव के परिणामों ने प्रदेशभर को चौंका दिया। कांग्रेस की जीत का अनुमान तो लगाया था रहा था मगर जिस अंतर से कांग्रेस जीती वह किसी ने नहीं सोचा था। सबसे बड़ा उलटफेर वल्लभनगर में देखने को मिला। पिछले 6 चुनाव और 28 साल से वल्लभनगर की राजनीति रणधीर सिंह भींडर के इर्द-गिर्द घूमती थी। इन 28 साल में हुए चुनाव में हर पार्टी के चेहरे बदले, मगर रणधीर सिंह भींडर ऐसा नाम था जो हमेशा यहां अहम जगह रखता था। या तो भींडर चुनाव जीतते थे या फिर उन्हें हराया जाता था। इन 28 साल में भींडर पहले और दूसरे स्थान पर ही रहे। मगर पहली बार ऐसा हुआ जब रणधीर सिंह वल्लभनगर में मतगणना में तीसरे स्थान पर रहे।

भींडर की सबसे बड़ी हार

भींडर ने अबतक वल्लभनगर से 6 चुनाव लड़े। वे गुलाब सिंह शक्तावत और गजेंद्र सिंह शक्तावत दोनों के खिलाफ लड़े और दोनों को हराया भी। भींडर ने 6 में से चुनाव तो महज 2 ही जीते। मगर कभी भी भींडर अपने प्रतिद्वंदी से 8 हजार वोट से ज्यादा के अंतर से नहीं हारे। मगर प्रीति शक्तावत ने उन्हें बड़े अंतर से हरा दिया। ना ही उनके ससुर गुलाबसिंह शक्तावत और ना ही उनके पति कभी भींडर को इतने बड़े अंतर से हरा पाए। प्रीति चुनाव 20606 वोट से जीती। मगर भींडर और प्रीति के बीच वोट का अंतर 21896 वोट का रहा।

इससे पहले भींडर ने पहली बार 1993 में शक्तावत के खिलाफ चुनाव लड़ा था। तब भींडर 8275 वोटों से हार गए थे। इसके बाद 1998 में एक बार फिर भींडर शक्तावत के खिलाफ खड़े हुए। इस बार भींडर महज 4004 वोट से हारे। इसके बाद 2003 में भींडर बड़े अंतर से चुनाव जीते। यहां उन्होंने तत्कालीन गृहमंत्री गुलाब सिंह शक्तावत को 32101 वोट से हराया था। यह अबतक वल्लभनगर में किसी प्रत्याशी द्वारा हासिल की गई सबसे बड़ी जीत है। इसके बाद 2008 में भींडर 6796 वोट से चुनाव हारे। इसके बाद 2013 में 13 हजार से ज्यादा वोटों से जीते। 2018 चुनाव में भींडर महज 3719 वोटों से हारे थे। मगर इस बार भींडर को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी है।

धरियावद में बीजेपी की सबसे बड़ी हार

इधर धरियावद में बीजेपी को अबतक की सबसे बड़ी हार झेलनी पड़ी। 1980 से लेकर इस उपचुनाव तक बीजेपी ने यहां 10 चुनाव लड़े। इनमें से 5 में जीत दर्ज की, वहीं 5 चुनाव बीजेपी हारी। 1990 से तो यहां बीजेपी का शानदार रिकॉर्ड था। 1990 से 2018 के बीच बीजेपी सिर्फ 2 चुनाव हारी थी। यहां भी पहली बार बीजेपी तीसरे नम्बर पर लुढ़की। उपचुनाव में कांग्रेस की जीत तो 18725 वोटों की रही। मगर कांग्रेस और बीजेपी के बीच वोटों का अंतर 23288 वोटों का रहा। यह बीजेपी की अबतक की सबसे बड़ी हार है। इससे पहले बीजेपी को यहां 2009 में हार मिली थी। तब बीजेपी 17675 वोट से हारी थी। इसी तरह 1998 में 6686 वोट, 1985 में 11190 वोट और 1980 में 11610 वोट से हारी थी।

मेवाड़ में अब सिर्फ दो सीटों का अंतर

2018 विधानसभा चुनाव और 2021 उपचुनाव के तीन साल में मेवाड़ में कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीटों का अंतर काफी कम हो गया। 2018 में जहां बीजेपी की 15 और कांग्रेस की 10 सीटें थी। जिसके चलते यह अंतर 5 सीटों का था। मगर अब उपचुनाव के बाद बीजेपी की 14 और कांग्रेस की 12 सीटें हो गई हैं। दोनों पार्टियों में अब अंतर सिर्फ 2 सीटों का है।

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