कांग्रेस को इसलिए जरूरी है चिंतन:2019 से अबतक 19 राज्यों की 1782 सीटों पर चुनाव लड़ा, जीती सिर्फ 248

उदयपुर4 महीने पहलेलेखक: निखिल शर्मा

उदयपुर में कांग्रेस का नवसंकल्प शिविर 13 मई से शुरू होगा। शिविर के लिए 6 अलग-अलग मसलों को लेकर कमेटियां बनाई गई है। देशभर की राजनीति की नजर कांग्रेस के इस शिविर पर है। इसे कांग्रेस में शुरू होने वाले एक नए अध्याय के तौर पर देखा जा रहा है। कांग्रेस भी इस शिविर से अपने आप को एक नए कलेवर में पेश करने की तैयारी में है। मगर कांग्रेस को इस चिंतन की जरुरत क्यों पड़ी ये कांग्रेस का पिछले लगभग 3.5 साल का प्रदर्शन बताता है।

2014 लोकसभा चुनाव में महज 44 सीटों पर सिमटने वाली कांग्रेस 2019 में करिश्में की उम्मीद कर रही थी। मगर वह अपनी सिर्फ 8 सीटें ही बढ़ा पाई। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में 2018 में मिली जीत कांग्रेस के लिए खुश होने का आखिरी मौका था। इसके बाद से कांग्रेस कोई विधानसभा चुनाव नहीं जीत सकी।

2019 से अबतक के विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो यह साफ पता चलता है कि कांग्रेस को चिंतन की जरुरत क्यों है। 2019 से अबतक 19 राज्यों के विधानसभा चुनाव हुए। इनमें से एक भी कांग्रेस नहीं जीत सकी है। दो राज्य महाराष्ट्र और झारखंड में कांग्रेस की सरकार जरुर है। मगर वहां भी कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी नहीं है। इन 19 राज्यों में से 6 में बीजेपी की सरकार है, जबकि 3 राज्यों में बीजेपी गठबंधन की सरकार है।

2019 से अबतक बात करें तो बीजेपी ने 19 राज्यों की 2042 सीटों पर चुनाव लड़ा। इनमें से 819 सीटों पर बीजेपी ने जीत दर्ज की। यानी जितनी सीटों पर चुनाव लड़ा उसमें से 40.19 प्रतिशत सीटें बीजेपी ने जीती।

वहीं दूसरी ओर अगर कांग्रेस की बात की जाए तो 2019 से अबतक इन्हीं 19 राज्यों के चुनाव में कांग्रेस 1782 सीटों पर चुनाव लड़ा। इनमें से महज 248 सीटों पर कांग्रेस चुनाव जीत सकी। यानी जितनी सीटों पर चुनाव लड़ा उसकी सिर्फ 13.91 प्रतिशत सीटों पर कांग्रेस जीत दर्ज कर सकी है।

चार राज्यों में खाता तक नहीं खुला
इन चुनावों में चार राज्य आंध्र प्रदेश, दिल्ली, पश्चिमी बंगाल और सिक्किम में तो कांग्रेस 1 सीट तक भी नहीं जीत सकी। वहीं कई राज्यों में वह दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू पाई। उत्तर प्रदेश और पुंडूचेरी में 2-2, अरुणाचल प्रदेश में 4, मणिपुर में 5 और ओडिशा में महज 9 ही सीटें कांग्रेस जीत सकी।

कई नेता छोड़कर गए, बनी बनाई सरकार गंवाई

चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाने के साथ-साथ रणनीति और संगठन के मोर्चे पर भी कांग्रेस काफी कमजोर हुई। 2018 में कर्नाटक में बनी गठबंधन और मध्यप्रदेश में बनी पूर्ण बहुमत की सरकार कांग्रेस ने गंवा दी। मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्स सिंधिया, यूपी में जितिन प्रसाद और आरपीएन सिंह सहित कई बड़े नेता कांग्रेस का दामन छोड़ गए।

युवाओं को तरजीह नहीं, गिने-चुने लोग चला रहे पार्टी

कांग्रेस के एक बड़े तबके का यह मानना है कि कांग्रेस में आज के दौर में युवाओं को खास तरजीह नहीं दी जा रही है। कुछ चिर-परिचित नाम ही पार्टी में निर्णय लेने में अहम रोल अदा करते हैं। सचिन पायलट इसका बड़ा उदाहरण हो सकते हैं। 2020 में राजस्थान सरकार से हुए मनमुटाव के बावजूद दो साल में पायलट को कोई पद नहीं दिया गया है। जबकि पायलट लगातार कांग्रेस की दी जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं। वहीं चिंतन शिविर में भी प्रदेशों के यूथ कांग्रेस, महिला कांग्रेस और एनएसयूआई के अध्यक्षों को शामिल नहीं किया गया। इसे लेकर भी कुछ युवा नेताओं में नाराजगी है।

2024 से पहले 10 राज्यों पर फोकस

कांग्रेस का फोकस 2024 से पहले होने वाले 10 राज्यों के विधानसभा चुनावों पर है। इनमें राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड, तेलंगाना शामिल हैं। इन 10 राज्यों में कुल 145 लोकसभा सीटें आती हैं। 2019 के चुनाव में इन 10 राज्यों की 145 सीटों में से 121 सीटों पर बीजेपी ने जीत दर्ज की थी। जबकि कांग्रेस को सिर्फ 8 सीटें ही मिली थी। ऐसे में इन राज्यों में विधानसभा सीटों में बेहतर प्रदर्शन कर कांग्रेस अपने मिशन 2024 की ओर देखेगी।

सीएसडीएस से जुड़े राजनीतिक विशेषज्ञ प्रोफेसर संजय लोढ़ा कहते हैं कि ये आंकड़े बताते हैं कि कांग्रेस को चिंतन की जरुरत है। संगठन में क्या खामियां हैं, नेतृत्व में क्या खामियां हैं, जमीनी मुद्दों पर पकड़, जिन दलों के साथ गठबंधन है उनके साथ समन्वय होना जरूरी है। जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को मजबूत करना। लीडरशिप में ऐसे चेहरे हों जिनसे लोग सीधा जुड़ाव महसूस कर सकें। ऐसे कई मसलें हैं जिनपर कांग्रेस को मंथन करने की जरुरत है। तभी चुनावों में हार के कारणों का विश्लेषण कर मजबूती से आगे बढ़ा जा सकता है।