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कोरोना जितना बढ़ा, हैसियत उतनी घटी:पहले 1 रोगी पर कई किमी में लगवाता था कर्फ्यू, अब घरों तक सिमटा

उदयपुरएक महीने पहले
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  • इसलिए कोरोना से डरने की नहीं, बचने की जरूरत है...

कोरोना थमने का नाम नहीं ले रहा। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। कोरोना जितना बढ़ा, इसकी हैसियत उतनी ही कम होती गई। यह सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन एक समय था कि कोरोना का एक मरीज मिलने पर कई किलोमीटर में कर्फ्यू लग जाता था। अब हर दिन उदयपुर में ही औसतन 50 से 100 के बीच नए मरीज मिल रहे हैं, लेकिन ये एक-एक घर में ही सिमटे हैं। उदयपुर में सबसे पहला कोरोना केस 2 अप्रैल को मल्लातलाई में मिला था।

तब पूरे अंबामाता क्षेत्र में कर्फ्यू लगा दिया गया था और करीब 40 हजार की आबादी घरों में कैद हो गई थी। धीरे-धीरे यह दायरा सिमटता गया। मरीज मिलने पर कॉलोनी में थाना क्षेत्र, फिर कॉलोनी और बाद में गली-मोहल्लों को ही बंद किया गया। लेकिन अब कोरोना ग्रस्त मरीजों को घरों में ही आइसोलेट किया जा रहा है। गंभीर हालात होने पर ही कोविड-हॉस्पिटल में भर्ती किया जाता है।

टेंस्टिंग, ट्रेसिंग और ट्रीटमेंट का पैटर्न भी बदला

पहले संक्रमण का केस मिलने पर उसके संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति की जांच होती थी। रिपोर्ट निगेटिव आने पर भी होम क्वारेंटाइन के निर्देश थे। दूसरे राज्यों से आने वालों की सैंपलिंग व क्वारेंटाइन जरूरी था। क्लॉज कॉन्टैक्ट वाले लोगों में लक्षण पाए जाने पर ही सैंपल लिया जाता है। संपर्क में आए लोगों को आइसोलेट होने की भी जरूरत नहीं है। दूसरे राज्यों से आने वालों की सैंपलिंग और उनका क्वारेंटाइन होना भी जरूरी नहीं है। पहले कोई कोरोना रोगी मिलने पर उनके कॉन्टेक्ट में आए लोगों की भी ट्रेसिंग की जाती थी, ताकि कम्युनिटी संक्रमण न फैल जाए।

इसके लिए रोगी के मोबाइल नंबर तक खंगाले जाते थे और उसके संपर्क में आए लोगों की पहचान की जाती थी। उन लोगों पर भी नजर रखी जाती थी, लेकिन यह सिलसिला भी धीरे-धीरे कम होता गया। अब टेस्टिंग के दौरान भी संक्रमण की स्थिति का भी पता लगाया जाता है। ताकि मरीज के स्वास्थ्य की सही स्थिति जानकर इलाज किया जा सके। एमबी हॉस्पिटल के अतिरिक्त अधीक्षक डॉ. रमेश जोशी ने बताया कि अब डायग्नोस भी आसान हो गया है।

टेस्टिंग के दौरान यह भी पता लगाया जाता है कि मरीज को ऑक्सीजन की जरूरत है या नहीं, फेफड़ों में खून के जमाव का भी पता लगाया जाता है। फेफड़ों में सूजन होने पर स्टीरॉयड दिया जाता है। जबकि इससे पहले एजिथ्रोमाइसिन, हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन, पैरासिटामोल का डोज दिया जाता था। लेकिन अब मरीज की क्लॉज मॉनिटरिंग के साथ खून पतला करने वाले इंजेक्शन (एंटी कॉगुलेंट एप्रिन) का लॉ डोज भी दिया जाता है।

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