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47 साल पहले शुरू हुई प्रतियोगिता का असर:आदिवासी गांव जावर के हर घर में फुटबॉल, पढ़े-लिखे भले नहीं, डी-पेनल्टी-कॉर्नर खूब समझते हैं, अब तक 500 खिलाड़ी दिए

उदयपुर14 दिन पहलेलेखक: अजय मिश्रा
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आज जिंक-सिल्वर के साथ फुटबॉलरों की खान बना जावर। - Dainik Bhaskar
आज जिंक-सिल्वर के साथ फुटबॉलरों की खान बना जावर।

| उदयपुर

उदयपुर का जावर माइंस गांव... जिंक, लैड व सिल्वर की खानों के लिए ख्यात। इस गांव का इन दिनों अलग ही नजारा है। अरावली की वादियों के बीच फुटबॉल का खूबसूरत स्टेडियम सजा है। इसके बाहर गाड़ियों का जमावड़ा और मेले जैसा माहौल है। हम पहुंचे तो फुटबॉल का ब्राजील साॅन्ग बज रहा था। पहाड़ी की चोटी तक आदिवासी दर्शकों के रूप में जमे थे। यहां इन दिनों माेहन कुमार मंगलम (एमकेएम) राष्ट्रीय फुटबाॅल प्रतियाेगिता चल रही है। ग्रामीण मैच शुरू होने से दो घंटे पहले ही पहुंच चुके थे। 70 साल की खातूबाई से जब पूछा कि यहां क्या कर रही हो? बोली- मैच देखने आई हूं।

कौनसा मैच? तो बाेली- फुटबॉल। खातूबाई पिछले 20 साल से मैच देखने आ रही हैं। बोली- ज्यादा समझ नहीं आता, लेकिन मजा आता है। मेरे बच्चे भी घर पर फुटबॉल खेलते हैं। कुछ ऐसी ही कहानी आसपास के हर गांव के हर घर की है। जावर सहित आसपास के 10 से 15 गांवाें के घर-घर में फुटबाॅल मिल जाएगी। आदिवासी आधुनिक सहित अन्य संसाधनाें से भले ही अछूते हाें, लेकिन होश संभालते ही बच्चे मोबाइल, पेन-कॉपी की जगह फुटबॉल उठाते हैं। आदिवासी दर्शक भी भले ही पढ़े-लिखे न हों, लेकिन डी, पेनल्टी और कॉर्नर सहित फुटबाॅल के खेल की पूरी शब्दावली और नियमों को अच्छे से समझते हैं।

इसी क्रेज का नतीजा है कि अब तक 100 से ज्यादा बच्चे नेशनल और 400 से ज्यादा राज्य स्तर पर खेल चुके हैं। 170 युवा सरकारी नाैकरी पा चुके हैं। पिछले 6 साल से यहां हिंदुस्तान जिंक ने अंतरराष्ट्रीय सुविधाओं वाली फुटबॉल एकेडमी भी शुरू कर दी है, जिसमें इन प्रतिभाओं को और तराशने का काम हाे रहा है। घर-घर में खिलाड़ी होने का ही नतीजा रहा कि पिछले साल फुटबॉल की स्टेट चैंपियन का खिताब उदयपुर के नाम रहा और अधिकांश खिलाड़ी जावर व आसपास के गांवों के थे।

मैच में दाेस्त को चोट लगी तो चिराग ने पहनाया जूता
जावर माइंस से 7 किमी दूर ओड़ा गांव के एक पहाड़ पर शाम 5:48 बजे कुछ बच्चे फुटबॉल खेल रहे थे। मैदान पथरीला था और गोल पोस्ट बांस की लकड़ी था। कुछ खिलाड़ी नंगे पैर थे तो कुछ जूते पहने हुए। टॉरगेट सिर्फ गोल था। तभी 13 साल के अमृत को पैर में चोट लग गई। इस पर दोस्त 11 साल के चिराग ने अपना बाएं पैर का जूता उतार कर उसे पहना दिया और उसकी एक चप्पल खुद पहन ली। मैच फिर शुरू। टॉरगेट गोल। गोल कीपर रंजीत मीणा ने बताया कि छह माह से खेल रहे हैं। क्लब में खेलने वाला करण हमें सीखा रहा है।

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