महाराणा प्रताप से ये सीख लें तो नहीं होंगे दंगे:मुस्लिम को युद्ध की कमान; महिला काे अगवा किया तो बेटे पर भड़के

उदयपुर3 महीने पहले

महाराणा प्रताप को दुनियाभर में उनके स्वाभिमान, वीरता, शौर्य और पराक्रम के लिए पहचाना जाता है। उनके बारे में बहुत कुछ है जो बेहद कम लोग ही जानते होंगे। आज जब राजस्थान सहित पूरा देश सांप्रदायिक दंगों से जूझ रहा है, महाराणा प्रताप की नीतियां मेवाड़ और राजस्थान में सदियों से चली आ रही एकता को बताती हैं।

पूरे मेवाड़ को सांप्रदायिक सौहार्द में बांधकर रखने वाले प्रताप ने ही हल्दीघाटी के युद्ध में एक मुस्लिम को हरावल दस्ते का जिम्मा सौंपा था। आर्थिक नीतियां और रिसोर्स मैनेजमेंट इतना जबरदस्त था कि कई साल युद्ध में रहने के बावजूद कभी कोई क्राइसिस नहीं आने दिया। युद्ध कौशल में जितने पारंगत थे उससे भी ज्यादा कौशल उनके फाइनेंशियल मैनेजमेंट में दिखता है। आज उनकी जयंती ( 9 May 1540) पर आपको बताते हैं उन 6 खूबियों के बारे में जिनसे राजस्थान ही नहीं पूरे देश को सीख लेने की जरूरत है....

किस्सा 1 : (हिन्दू-मुस्लिम एकता)
16वीं सदी के दौरान विदेशी आक्रमणों का सबसे बड़ा विरोध मेवाड़ में हुआ। महाराणा प्रताप की जंग किसी कौम के खिलाफ नहीं थी, बल्कि बाहरी आक्रांताओं के खिलाफ थी। महाराणा प्रताप पर पीएचडी करने वाले इतिहासकार डॉ. चंद्रशेखर शर्मा बताते हैं कि 16वीं शताब्दी में पठानों को बेदखल कर मुगल सल्तनत सत्ता पर काबिज हुई थी। उस दौर में हुमायूं को हराने वाले शेरशाह सूरी के वंशज हाकिम खां युद्ध नीति में पारंगत था।

Creative : हाकिम खां को हरावल दस्ते की जिम्मेदारी सौंपते हुए महाराणा प्रताप।
Creative : हाकिम खां को हरावल दस्ते की जिम्मेदारी सौंपते हुए महाराणा प्रताप।

इस दौर में मुगलों ने युद्ध में बारूद का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था। मेवाड़ सेनाओं को उस दौरान बारूद और तोप का ज्ञान नहीं था। ऐसे में महाराणा प्रताप ने हाकिम खां की योग्यता को पहचाना। हाकिम खां ने तोपची के रूप में मेवाड़ में सेवाएं दी। इसी कौशल की वजह से खां ने हल्दीघाटी के युद्ध में हरावल दस्ते का नेतृत्व किया, जबकि परंपरागत रूप से अपने त्याग और बलिदान के लिए ये जिम्मेदारी चुंडावतों को मिलती थी। वो नेतृत्व हरावल पहली बार किसी मुस्लिम पठान को सौंपा गया था।

हल्दीघाटी दर्रें के समीप खमनोर में स्थापित हाकिम खां की मजार।
हल्दीघाटी दर्रें के समीप खमनोर में स्थापित हाकिम खां की मजार।

किस्सा 2 ( महिलाओं का सम्मान)
अब्दुल रहीम खान-ए-खाना को अकबर ने हल्दीघाटी युद्ध के बाद अजमेर का सूबेदार बनाया था। डॉ. शर्मा बताते के मुताबिक रहीम खान को एक ही आदेश था महाराणा प्रताप को जिंदा या मुर्दा पकड़ना है। इसके लिए रहीम ने अपना कैंप आबू की तहलटी में लगाया। प्रताप उस दौरान सुंधा माता की पहाड़ियों में थे। तभी प्रताप के बेटे अमर सिंह को रहीम के कैंप का पता पता लगता है। अमरसिंह रहीम की सेना को परास्त करके उसकी बेगम को अगवा कर प्रताप के पास ले आया। अमर सिंह ने तर्क दिया कि जो मुगल उनके साथ करते हैं वहीं वो उनके बच्चों के साथ करेंगे।

अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना उर्फ रहीम खान के पिता बैरम खां अकबर के शिक्षक थे।
अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना उर्फ रहीम खान के पिता बैरम खां अकबर के शिक्षक थे।

जैसे ही ये बात महाराणा प्रताप को पता चली तो वे अमर सिंह पर क्रोधित हो गए। अमरसिंह को वापस महिला को सम्मान से सुरक्षित उनके कैंप में भिजवाने की व्यवस्था के आदेश दिए। प्रताप ने कहा चाहे वो हिंदू हो या मुस्लिम नारी, स्त्री हमेशा भारतीय संस्कृति में आदरणीय रही है।

इसका परिणाम होता है कि रहीम खुद अकबर को जाकर मना कर देता है। रहीम अकबर को कहता है कि प्रताप इतने महान हैं। ऐसे महान व्यक्तित्व के खिलाफ वह संघर्ष नहीं कर सकता। इसके बाद रहीम की अजमेर से सूबेदारी हटा दी गई थी। अब्दुल रहीम ही बाद में श्रेष्ठ कवि रहीम के रूप में पहचाने गए।

किस्सा- 3 (आर्ट एंड लिटरेचर प्रमोशन )
महाराणा प्रताप की राजधानी जब चावंड में थी तब उस दौर को शांतिकाल कहा जाता है। तब उन्होंने कला, साहित्य, संस्कृति, खेती को प्रोत्साहन दिया। डॉ. शर्मा बताते हैं कि निसारदी नाम का मुस्लिम कलाकार ने रागमाला का चित्र बनाया था। जो कला के इतिहास में चावंड कलम के नाम से जाना गया है। ये सारे चित्र भागवत पुराण पर आधारित हैं। कौमी एकता की मिसाल का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि 'चावंड कलम' का आविष्कारक मुस्लिम है और उसका सब्जेक्ट पौराणिक है। उस दौर में महाराणा प्रताप ने चावंड कलम को बहुत प्रमोट किया।

मेवाड़ की चित्रशैली चावंड रागमाला की एक पेंटिंग।
मेवाड़ की चित्रशैली चावंड रागमाला की एक पेंटिंग।

किस्सा- 4 (फाइनेंसियल क्राइसिस मैनेजमेंट)
महाराणा प्रताप फाइनेंशियल मैनेजमेंट के भी अच्छे जानकार थे। मेवाड़ को आर्थिक संपन्न बनाने वाला सबसे बड़ा व्यापारिक रूट उन्हीं के साम्राज्य से होकर निकलता था। वैश्विक व्यापार के लिए गुजरात को जाने का रास्ता और हज करने के लिए मक्का-मदीना का रास्ता मेवाड़ होकर गुजरता था। इस व्यापारिक रूट और हज मार्ग को हथियाने के लिए मुगलों की हमेशा से नजर थी।

मेवाड़ के पास उस दौर में मांडलगढ़ और जावर दो अहम माइंस थी। जिनसे सबसे बड़ा राजस्व आ रहा था। लेकिन चित्तौड़ पर आक्रमण कर मुगलों ने मांडल माइंस पर कब्जा कर लिया। लेकिन जावर माइंस पर कब्जा नहीं कर पाए।

उदयपुर से 40 किलोमीटर दूर टीडी चौराहे से जावर माइंस के बीच चावंड में एक गुफा जहां महाराणा प्रताप ने शस्त्रागार भी बनाया था।
उदयपुर से 40 किलोमीटर दूर टीडी चौराहे से जावर माइंस के बीच चावंड में एक गुफा जहां महाराणा प्रताप ने शस्त्रागार भी बनाया था।

इतिहासकार डॉ. भानू कपिल बताते हैं कि उस समय जावर माइंस से बड़ी मात्रा में चांदी निकलती थी। यही वजह रही कि इतने लम्बे समय तक चली लड़ाई को प्रताप बरकरार रख पाए। जावर माइंस के ठीक नजदीकी पहाड़ियों चावंड पर प्रताप ने अपनी राजधानी स्थापित की। ताकि उस क्षेत्र की पूरी सुरक्षा की जा सकें। इन्ही आर्थिक संसाधनों से कई सालों तक मेवाड़ की आवश्यक्ता पूरी होती रही। आजादी के बाद भी राजस्थान के राजस्व का सबसे बड़ा क्षेत्र जावर माइंस रहा है।

पांचवा किस्सा (गुड गवर्नेंस)
प्रताप की गवर्नेंस बेहद मजबूत थी। डॉ. भानू कपिल बताते हैं कि उस दौर में अच्छी राशन व्यवस्था, कृषि के क्षेत्र में सामंजस्य था। उन्होंने किसानों और आदिवासियों को स्वपोषित अधिकार दे रखे थे। इसी वजह से युद्ध के समय आदिवासियों ने प्रताप का साथ दिया। प्रताप की कृषि नीति जबरदस्त थी। पीडीएस सिस्टम भी शानदार था। आज पैंडेमिक के दौरान कर्फ्यू होता है उसमें सबसे बड़ा संकट फूड सप्लाई पर आता है।

प्रताप कई सालों तक लगातार ( 1576 से 1585-86 के बीच लगभग 10 साल युद्ध की स्थिति में रहे) युद्ध में व्यस्त रहे, लेकिन तब भी फूड सप्लाई चैन को कमजोर नहीं पड़ने दिया। आमजन और सेना के सामने कभी खाद्यान्न संकट नहीं आने दिया।

1576 ई. के हल्दीघाटी युद्ध में पूंजा ने महाराणा प्रताप का साथ दिया था। पूंजा गुरिल्ला युद्ध प्रणाली के जबरदस्त योद्धा थे।
1576 ई. के हल्दीघाटी युद्ध में पूंजा ने महाराणा प्रताप का साथ दिया था। पूंजा गुरिल्ला युद्ध प्रणाली के जबरदस्त योद्धा थे।

छठा किस्सा ( वाटर रिसोर्सेज मैनेजमेंट)
प्रताप ने जहां-जहां भी राजधानी बनाई, वहां वाटर रिर्सोसेज खड़े किए। आवरगढ़, उदय की पहाड़ियां, बलुआ की घाटी, चावंड क्षेत्र से लेकर सुंधा माता तक। सब जगह प्रताप ने अपने वाटर रिर्सोसेज उस समय के अनुसार बनाए। मिट्टी का कटाव रोकने के लिए द्रोण बद्ध तकनीक, क्यारियां बनाकर पानी स्टोर किया ताकि 12 महीने पानी की उपलब्धता रहे। उनमें से कई संसाधन आज भी मौजूद हैं।

सुंधा माता पर्वत : पानी को स्टोर करने के लिए यहां आज भी पहाड़ी की तलाई में पोंड स्थापित है।
सुंधा माता पर्वत : पानी को स्टोर करने के लिए यहां आज भी पहाड़ी की तलाई में पोंड स्थापित है।