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नेताओं से खफा हैं वाजमिया गांव के लोग:एक ही नाम के अगल-बगल में दो गांव, लोग बोले- वोट देते-देते थक गए, अब उम्मीद नहीं

उदयपुर3 महीने पहलेलेखक:  सतीश शर्मा
वल्लभनगर का आखिरी गांव छोटा वाजमिया।

वल्लभनगर ​विधानसभा का आखिरी गांव है वाजमिया। ठीक इससे 2 किमी दूर एक और वाजमिया गांव है, जो मावली विधानसभा का हिस्सा है। यानी अगल-बगल में एक ही नाम के दो गांव हैं। परिसीमन के वक्त एनीकट (बांध) के ऊपर का हिस्सा मावली और नीचे वाला वल्लभनगर विधानसभा में बांट दिया गया था। तब से वल्लभनगर में पड़ने वाले गांव को छोटा वाजमिया कहा जाता है, जबकि मावली में आने वाले गांव को बड़ा वाजमिया कहते हैं।

चुनावी माहौल के बीच मुख्यमंत्री गहलोत से लेकर तमाम मंत्री और बड़े नेताओं के दौरे जारी हैं। ऐसे में भास्कर टीम ने वल्लभनगर में पड़ने वाले छोटा वाजमिया से ग्राउंड रिपोर्ट की। छोटा और बड़ा वाजमिया के विकास में दिन-रात का अंतर दिखा। नेताओं के रवैये को लेकर छोटे वाजमिया गांव के लोग बेहद खफा हैं। हालांकि वे लोग मतदान करने की बात तो करते हैं। मगर भावी विधायक के विकास के दावों पर उम्मीद नहीं रखना चाहते।

ग्रामीणों को परिसीमन के बाद विकास की आस थी, लेकिन कई साल बीत जाने के बाद हालात नहीं बदले।
ग्रामीणों को परिसीमन के बाद विकास की आस थी, लेकिन कई साल बीत जाने के बाद हालात नहीं बदले।

दरअसल, परिसीमन के बाद दोनों गांवों को अलग-अलग विधानसभा में बांटने के बाद ग्रामीणों को विकास की आस थी। दोनों गांव विधानसभा मुख्यालय से मात्र 12-12 किलोमीटर दूरी पर हैं। वक्त के साथ बड़ा वाजमिया में तो सड़कें, स्कूल, पेयजल और स्वास्थ्य केन्द्र समेत विकास के कई काम हुए। मगर वल्लभनगर विधानसभा के छोटा वाजमिया पहुंचने के लिए एक पक्की सड़क और प्राइमरी स्कूल को छोड़कर ज्यादा कुछ नहीं है। यह गांव गोटिपा ग्राम पंचायत का हिस्सा है, जो इससे करीब 8 किलोमीटर दूर है।

राजपूत बहुसंख्यक होने से इस गांव को राजपूतों का वाजमिया से भी जाना जाता है। 350 घरों वाले इस गांव की आबादी करीब 1300 है। 870 वोटर हैं, जिनमें 450 राजपूत, 300 एससी और 100 एसटी वर्ग से हैं। खास बात यह है कि बीजेपी के प्रत्याशी हिम्मत सिंह झाला भी इसी गांव से हैं। ग्रामीण बताते हैं कि प्रत्याशी झाला का शहरों में कारोबार होने से वो गांव में बेहद कम रहते हैं।

पहली तस्वीर बड़ा वाजमिया गांव की है, जहां डामर की सड़कें हैं। दूसरी तस्वीर में छोटा वाजमिया गांव की, जहां सड़क का नाम तक नहीं।
पहली तस्वीर बड़ा वाजमिया गांव की है, जहां डामर की सड़कें हैं। दूसरी तस्वीर में छोटा वाजमिया गांव की, जहां सड़क का नाम तक नहीं।

विकास और चुनाव के संबंध में पूछे जाने पर महिलाएं मायूस हो जाती हैं। कहती हैं कि वोट देते-देते जब इतने सालों में गांव के मोहल्लों में सड़कें और बड़ा स्कूल नहीं बन पाया तो अब क्या हो जाएगा। गांव के अलग-अलग 3 बड़े मोहल्लों में जाकर हमने पड़ताल की तो सरकारी काम के तौर पर एकमात्र प्राइमरी स्कूल के अलावा कुछ खास नजर नहीं आया। कच्चे-पक्के घरों के बाहर बैठे ग्रामीण भी पेयजल और बच्चों की शिक्षा को लेकर खासे आक्रोशित दिखे।

कमलेश नगारची बताते हैं कि चुनाव के वक्त गांव में वोट के लिए नेता बड़ी-बड़ी गाड़ियां लेकर आते हैं। मगर बाद में हमारी सुध लेने कोई नहीं आता। गांव के अधिकांश बच्चों को प्राइमरी के बाद पढ़ने के लिए समीपवर्ती मुंड़ोल, पुरियाखेड़ी या गोटिपा भेजना पड़ता है। स्थानीय निवासी देवीलाल बताते हैं कि 6 से 7 किलोमीटर दूर साइकिल लेकर जाना हमारी बच्चियों के लिए भी सुरक्षा के लिहाज से बिल्कुल ठीक नहीं हैं। गांव में जो प्राइमरी स्कूल है, वो केवल शिक्षाकर्मियों के भरोसे हैं।

गांव में पेयजल के हालात बताता एक युवा। यहां नलकूप तो हैं, लेकिन ज्यादा फ्लोराइड होने के कारण पानी पीने योग्य नहीं है।
गांव में पेयजल के हालात बताता एक युवा। यहां नलकूप तो हैं, लेकिन ज्यादा फ्लोराइड होने के कारण पानी पीने योग्य नहीं है।

नरेन्द्र सिंह चुण्डावत कहते हैं कि गांव तक पहुंचने के लिए एक सड़क जरूर है, मगर टुकडों में बसावट के कारण गली-मोहल्लों में इंटरकनेक्टेट रोड नहीं है। जब सड़कें ही ठीक रूप में नहीं बन पाई तो नालियां बनना तो संभव है। वे बताते हैं गांव में प्राइमरी हेल्थ सेंटर का भवन तैयार है, लेकिन उद्घाटन के इंतजार में बंद पड़ा है।

पास में बैठे रमेश चन्द्र कटाक्ष करते हुए कहते हैं कि असल में आज तक सारे विधायकों की पहली प्राथमिकता तो भींडर कस्बा रहा है। उसके बाद कानोड, वल्लभनगर होते हुए मैन रोड के गांव। विधानसभा के आखिरी गांव तक आते-आते बजट और प्राथमिकता दोनों खत्म हो जाते हैं। इससे बेहतर होता कि हम भी पास वाले वाजमिया गांव में होते, जहां सड़कें और उच्च माध्यमिक विद्यालय से लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र और पेयजल की व्यवस्था तो है। ​हमारे हिस्से में भी कुछ विकास तो आता।

दोनों तस्वीरें बड़ा वाजमिया गांव की हैं। जहां आज पक्की सड़कें, हाई स्कूल से लेकर पानी की सप्लाई और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र तक है।
दोनों तस्वीरें बड़ा वाजमिया गांव की हैं। जहां आज पक्की सड़कें, हाई स्कूल से लेकर पानी की सप्लाई और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र तक है।

गांव की महिलाएं बताती हैं कि आखिरी बार 2018 में विधायक ने एक साल में ही पेयजल व्यवस्था करने आश्ववासन दिया, जो आज तक पूरा नहीं हुआ। गांव में पानी फ्लोराइड युक्त है। कुछ हैंडपंप हैं, लेकिन वे काम नहीं कर रहे। दो-दो किलोमीटर दूर कुओं या ट्यूबवेल से पानी लाने को मजबूर होना पड़ता है। हालांकि बीच में दूसरी महिलाएं कहती हैं कि पहली बार हमारे गांव के युवक को भी टिकट मिला है, शायद यह जीते तो गांव का कुछ उद्धार हो पाए। वरना विकास में तो हमारा नंबर नहीं आएगा।

पानी की सप्लाई नहीं होने से गांव में कई लोगों को आज भी अपने कुंए पर जाकर कपडे़ धोने पड़ते हैं।
पानी की सप्लाई नहीं होने से गांव में कई लोगों को आज भी अपने कुंए पर जाकर कपडे़ धोने पड़ते हैं।
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