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मेवाड़ की रग-रग में राम:अयोध्या में श्रीराम मंदिर आरंभ पूजन आज दैनिक भास्कर में पढ़िए श्रीराम से इस वीर धरा का कैसा है नाता

उदयपुरएक महीने पहले
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  • यहां रामायण काल के प्रमाण, राम मंदिर आंदोलन का हिस्सा बन चुके मेवाड़ वासियों ने मंदिर निर्माण में भी भेजे श्रद्धा के पुष्प

अयोध्या में बुधवार को होने वाले श्रीराम मंदिर आरंभ पूजन के उल्लास की हिलोर उदयपुर और मेवाड़ तक पहुंची है। इसकी कई वजहें भी हैं। सबसे बड़ी यह कि राम और रामायण काल से मेवाड़ का भी जुड़ाव रहा है। झाड़ोल तहसील में आवरड़ा की पहाड़ियों के बीच कमलनाथ शिव धाम हो या मेवाड़-मालवा के बीच सीता माता वनखंड।

ये स्थल उस काल खंड के जीवंत प्रमाण हैं। दूसरी वजह 1990 के दशक में राम मंदिर आंदोलन है, जिसमें उदयपुर से सैकड़ों कार सेवक ‘राम कारज’ के लिए अयोध्या पहुंचे थे। विश्व हिंदू परिषद के संगठन मंत्री धनराज सिंह ने बताया कि कोरोना के कारण उदयपुर और मेवाड़ वासियों की अयोध्या जाने की इच्छा पूरी नहीं हो सकी, लेकिन भूमिपूजन के लिए कई वस्तुएं पहुंचाकर अपनी श्रद्धा के पुष्प अर्पित किए हैं।

परिषद के पूर्व अध्यक्ष अशोक सिंघल के भतीजे सलिल सिंघल ट्रस्ट के बुलावे पर मंगलवार को अयोध्या के लिए रवाना हुए हैं। इस बीच मंगलवार को शहर के हनुमान मंदिरों सहित कई देवालयों में दीपदान हुआ। श्रद्धालुओं ने चालीसा और मानस पाठ किए।

कण-कण में राम

मां सीता की आश्रय स्थली रहा सीता माता वन खंड

  • धरियावद के सीतामाता अभयारण्य को लेकर मत है कि यहां वाल्मीकि आश्रम में मां सीता, लव-कुश रहे थे। स्थानीय निवासी वन क्षेत्र में आश्रम के आकार और जलकुंड को भी वाल्मीकि आश्रम से जोड़कर देखते हैं। लव-कुश के हाथों हनुमानजी को बांधने और मां सीतामाता के इसी धरा खंड में समाने की मान्यताएं भी हैं।

रावण ने की थी कमलनाथ की प्रतिष्ठा

  • झाड़ोल में कमलनाथ मंदिर की प्रतिष्ठा रावण के हाथों होने की मान्यता है। इतिहासविद प्रो.चन्द्रशेखर शर्मा बताते हैं कि लोकमतों में भी इसका जिक्र है। यही कारण है कि इस शिव धाम को लेकर क्षेत्र के आदिवासी समाज में भी विशेष श्रद्धा है। किंवदंतियां सीसारमा गांव को लेरक भी है। कहते हैं कि इसका पूर्व नाम सियाराम था, जो सीसारमा हो गया।

मेवाड़ परिवार का है दावा- हम लव के वंशज

  • मेवाड़ के पूर्व राजपरिवार का भी दावा रहा है कि वे श्रीराम के वंशज हैं। इस दावे के अनुसार राम के बेटे लव ने लवकाेट (लाहौर) बसाया था। लव के वंशज कालांतर में गुजरात हाेते हुए आहाड़ यानी मेवाड़ में आए, जहां सिसोदिया साम्राज्य स्थापित किया। श्रीराम की तरह मेवाड़ का राज प्रतीक सूर्य रहा और पूर्व राजपरिवार भी महादेव (एकलिंगनाथ) का उपासक है।

आंदोलन : हर मन में राम
1990 में अयोध्या गया पहला जत्था, जगदीश मंदिर से निकला था जुलूस

शहर से 22 अक्टूबर, 1990 काे मावली के पूर्व विधायक जोधसिंह चाैहान (दायजी) और शहर विधायक शिव किशाेर सनाढ्य के नेतृत्व में पहला जत्था रवाना हुआ था। इसमें 123 कार सेवक शामिल थे। रवानगी जगदीश चौक से हुई और जुलूस निकला। मेवाड़ से करीब 437 कार सेवकों ने कूच किया था। इनमें भीम, देवगढ़ और आमेट से भी 200 से ज्यादा कार सेवक थे।

विद्यार्थी परिषद के तत्कालीन नगर मंत्री यज्ञनारायण शर्मा आदि भी शामिल थे। सिटी रेलवे स्टेशन से वरिष्ठ भाजपा नेता भानुकुमार शास्त्री, गुलाबचंद कटारिया, पूर्व विधायक श्यामा कुमारी सेंगर आदि ने जत्थे काे रवाना किया था। इस जत्थे को उत्तर प्रदेश के उन्नाव रेलवे स्टेशन पर ही गिरफ्तार कर लिया गया था।

ये लाेग 17 दिन जेल में रहे। जत्थे में पूर्व पार्षद दिनेश गुप्ता, वर्तमान पार्षद मनाेहर चाैधरी, प्रवीण खंडेलवाल, अशाेक घरबड़ा, भंवर दाेशी, सुरेंद्र स्वामी भी शामिल थे। भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष दिनेश भट्ट ने तब राजस्थान से आने वाले कारसेवकों से जुड़ी व्यवस्थाओं संभालने का काम किया था। उसके बाद 1992 में भी जत्थाें में कई कार सेवक अयोध्या पहुंचे थे।

विवादित ढांचा ढहाया, उस दिन भी अयोध्या में थे उदयपुर के कार सेवक

1 दिसंबर 1992 काे भी उदयपुर से कई कार सेवक अयोध्या गए थे। पूर्व पार्षद विजय प्रकाश विप्लवी बताते हैं कि 6 दिसंबर, 1992 काे जब विवादित ढांचा ढहाया गया था, उस दिन वे अाैर उनके साथी सुबह के समय अयोध्या में सरयू किनारे थे।

उदयपुर के कई और कार सेवक अयोध्या और आसपास के इलाकाें में थे। बजरंग दल के तत्कालीन विभाग संयोजक शंकरलाल लोढ़ा बताते हैं- तब करीब 5 हजार लोग मेवाड़ से निकले, लेकिन 200 ही अयोध्या पहुंच पाए थे। कई लोगों की गिरफ्तारियां हुई थीं।
1991 में सम्मेलन के बाद लगा था कर्फ्यू
विद्यार्थी परिषद के तत्कालीन सदस्य बीएल दोशी बताते हैं कि वर्ष 1991 में उदयपुर में सम्मेलन हुआ था। विश्व हिंदू परिषद, दुर्गा वाहिनी सदस्यों के अलावा भी जैन साधु-सन्त भी मंच पर थे। राममन्दिर आंदोलन पर मंथन हुआ। फिर 1992 में भी उदयपुर से करीब 550 कारसेवक अयोध्या पहुंचे, लेकिन 6 दिसम्बर को ढांचा गिराए जाने के बाद 8 दिसम्बर को उदयपुर में कर्फ्यू लग गया था। कार्यकर्ताओं को भूमिगत होना पड़ा और 12 दिसम्बर को कई कारसेवकों ने आत्मसमर्पण किया था।

सबके राम
अब हमारी श्रद्धा के पुष्प

  • सुभाष नगर निवासी डॉ. अलका मूंदड़ा के परिवार की ओर से पहली चांदी की ईंट ‘राम-काज’ में समर्पित की गई है।
  • मेनार गांव के एक परिवार की ओर से मिट्टी, चांदी की ईंट और कलश भेजा गया है।
  • एकलिंगनाथ, द्वारकाधीश, चारभुजा मन्दिर के अलावा हल्दीघाटी सहित मेवाड़ के प्रमुख स्थलों से जल और मिट्टी भी भेजी गई।

और मेवाड़ी साहित्य-कलाओं में ये हैं संदर्भ
डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू बताते हैं- बावजी चतर सिंह ने चतुर चिंतामणि में मेवाड़ के राजकुल को रघुकुल से संबद्ध करते हुए लिखा- ‘राणा धीर धरम रखवाळा, थें रघुकुल रा वटवाळा’। बावजी ने ही मेवाड़ी में मानव मित्र रामचरित्र भी लिखी। श्रीराम के वनवास स्थलों में से एक चित्रकूट के नाम पर चित्तौड़ का मूल नामकरण हुआ है।

इसका कई शिलालेखों में उल्लेख है। महाराणा स्वरूपसिंह और महाराणा सज्जन सिंह के काल तक दोस्ती-लंदन के सिक्कों पर भी चित्रकूट अंकित था। यही नहीं, महाराणा भीम सिंह के काल के साहित्यकार किशना आढ़ा ने ‘रघुवर जस प्रकाश’ में राजस्थानी गीतों-छंदों में राम का यश गान किया। सवा सौ साल पहले कानोड़ के रसिक बिहारी ने राम चरित्र पर आधारित राम रसायन लिखा था। राजसमंद की नौचौकी पर शिलालेख राज प्रशस्ति में संपूर्ण सूर्य वंशावली उत्कीर्ण है।

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