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आदिवासी दिवस आज:इस बार नहीं है थाली-मांदल की गूंज, कोरोना ले डूबा गवरी भी

उदयपुरएक महीने पहले
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  • दुनिया भर में मशहूर है मेवाड़ की गवरी

विश्व आदिवासी दिवस रविवार काे प्रदेशभर में मनाया जाएगा। आदिवासी समाज सामाजिक मुद्दाें काे लेकर हमेशा से ही जागरूक रहा है। इनकी संस्कृति और परंपराएं भी अनूठी है। मेवाड़ क्षेत्र में भील जनजाति का गवरी नृत्य संस्कृति और आस्था का प्रतीक है, जिसने विश्व स्तर पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है। काेराेना संक्रमण के चलते इस बार गवरी नृत्य नहीं हाे सकेगा।

यह नृत्य भाद्रपद मास से शुरू हाेकर आश्विन माह तक करीब 40 दिन तक चलता है। मांदल और थाली की झंकार के साथ हाेने वाले इस नृत्य काे राई नृत्य के नाम से भी जाना जाता है। आदिवासी क्रांति मंच के प्रदेश महासचिव बाबूलाल कलासुआ ने बताया कि इस बार गांवों में गवरी नृत्य नहीं करने काे लेकर पहले ही सहमति बना ली गई थी।

विशेषज्ञों से जानिए इस लोक नाट्य अनुष्ठान के पीछे क्या हैं मान्यताएं

महिलाओं की स्वतंत्रता का प्रतीक है गवरी
सुखाड़िया विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र की विभागाध्यक्ष प्रो. सुधा चौधरी ने बताया कि आदिवासी समाज में शिव की पूजा कर गवरी का प्रदर्शन करते हैं। प्रो. चौधरी ने कहा कि इस खेल या नृत्य के कई हिस्सों में महिलाओं की स्वतंत्रता काे लेकर भी जागरूकता के प्रसंग आते हैं। हालांकि आज के व्यवसायीकरण के दौर में नृत्य का मूल कहीं पीछे छूट गया है।

देवी अंबाव की पूजा है गवरी
राजस्थान विद्यापीठ में अंग्रेजी विभाग में प्रोफेसर हेमेंद्र चंडालिया ने बताया कि गवरी नृत्य देवी अंबाव की पूजा है। इसकाे लेकर एक चरवाहे की कथा प्रचलित है जाे अपनी भेड़ाें काे डकैताें से बचाने के लिए देवी से प्रार्थना करता है। गवरी नृत्य गांवाें और शहराें के मुख्य स्थानाें पर एक भाला गाड़ने के साथ शुरू हाेता है। प्रदर्शन के बीच गायकाें का एक समूह “गेलुरिया” लाेक गीत का गायन करता है। गवरी के प्रमुख पात्र राजा बंजारा, राई, बुड़िया, कालबेलिया, सेठजी आदि हैं। इसमें राई और बुड़िया के किरदार दिलचस्प और मनोरंजक हाेते हैं।

कोटड़ा : खुशी हो, गमी या कोई खतरा... यहां ढोल से मिलता है संकेत
सेवा मंदिर के मीडिया प्रभारी एमएस रावत ने अपने लेख कोटड़ा की ढोल वादन परंपरा में लिखा है कि आधुनिकीकरण में कोटड़ा आदि आदिवासी अंचल के इलाके में आज भी ढोल की थाप सुनते ही कुछ ही देर में समाज के लोग अपने घर-टापरों से निकलकर इकट्ठा हो जाते हैं। बैठक की सूचना, मृत्यु की सूचना, चढ़ोतरा या वारी ढोल (पड़ोस में हत्या हो जाने पर), चोरी हो जाने पर ढोल बजने लगता है। सूचना देने के इस तरीके को आज भी आदिवासी समाज में विश्वसनीय माना जाता है।

शिवजी-पार्वती से जुड़ा है यह खेल
लोक संस्कृति के जानकार श्रीकृष्ण जुगनू के अनुसार गवरी का उद्भव शिव-भस्मासुर की कथा काे माना है। उन्हाेंने बताया कि गवरी नृत्य में शंकर-पार्वती के खेल के साथ कलाकार कई रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत करते है। जनजातियां सामुदायिक स्वास्थ्य से लेकर कई मुद्दों और जागरूक रहीं है। इसी के चलते गवरी जैसे प्राचीन आदिम नृत्य में देवी-देवताओं और पूर्वजों को खुश करने के लिए शिव और पार्वती की पूजा की जाती है। नृत्य में एक भाग तांडव का भी शामिल होता है।

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