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  • Told In The E books Of MA Livein Mango Among The Tribals, The Interpretation Of Dapa Natra Also Changed, Now The Controversial Content Will Be Removed

सुविवि में नया विवाद:एमए की ई-किताबों में बताया- आदिवासियों में लिवइन आम, दापा-नातरा की व्याख्या भी बदली, अब हटेगा विवादित कंटेंट

उदयपुर2 महीने पहले
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  • पूर्व डीन प्रो. सीमा के संपादन में तैयार किताबों पर बवाल, जनजाति परिषद में रोष

सुविवि में एमए चौथे सेमेस्टर के ऑड ऑन विषय के रूप में तैयार 3 ई-बुक ‘वागड़ का लोक साहित्य’ से बवाल मचा है। ये ई-बुक्स विवि की वेबसाइट पर हैं, जिसकी संपादक आर्ट्स व लॉ कॉलेज की पूर्व डीन प्रो. सीमा मलिक हैं। किताबों की सामग्री पर जनजाति शाेध परिषद ने सोमवार को कड़ी आपत्ति जता कुलपति प्रो. अमेरिका सिंह को ज्ञापन दिया।

परिषद ने कहा कि ई-बुक्स में आदिवासियों में लिव इन रिलेशनशिप को मान्य बताने के साथ दापा, नातरा, नोतरा आदि प्रथाओं की व्याख्या भी समाज की गलत छवि पेश करती है। विरोध देख कुलपति को ये ई-पुस्तकें हटाने के निर्देश जारी करने पड़े। ज्ञापन देने वालों में परिषद संरक्षक विकास कुमार मीणा, डूंगरपुर जिलाध्यक्ष चंद्र रोत, डॉ. केसरीमल निनामा, प्रतापगढ़ जिलाध्यक्ष पुष्पक मीणा, सह संरक्षक प्रदीप कुमार मीणा आदि शामिल थे।

लिवइन का चलन नहीं, प्रथाएं व्यवस्था का हिस्सा : परिषद

परिषद संरक्षक विकास ने बताया कि ई-बुक के पेज नंबर 29 पर वागड़ क्षेत्र के आदिवासियों में गैर अनुमतिक संबंध मान्य बताए गए हैं। जबकि हकीकत यह है कि ऐसी कोई प्रथा या रिवाज प्रचलित नहीं है। जिस दापा प्रथा को सामाजिक दंड बताया है, वह वैवाहिक प्रक्रिया का हिस्सा और स्वैच्छिक है। इसमें लड़की का पिता वर पक्ष से क्षमतानुसार कुछ धन या आभूषण लेता है। किताब कहती है कि दापा भुगतान के बाद एक व्यक्ति विधवा से शादी कर सकता है, जबकि आदिवासी समुदाय में विधवा पुनर्विवाह प्रचलित है। इसका दापा से कोई संबंध नहीं है। नातरा को प्रेम विवाह बताया है। सच यह है कि इसमें महिला और पुरुष दोनों को पुनर्विवाह का अधिकार है, बशर्ते पति-पत्नी का रिश्ता टूट चुका हो। ऐसा नहीं है कि पूर्व पति को दापा देकर नातरा किया जाता है। ईबुक में शादी के लिए लड़की के अपहरण को भी अनुमत बताना सरासर गलत है।

वागड़ में नहीं रमते गवरी : ईबुक के पेज-31 के अनुसार नोतरा प्रथा गरीब परिवार को समाज द्वारा सहयोग देने के लिए है जबकि यह व्यवस्था आदिवासी समुदाय में सहयोग व सामुदायिक एकता का भाव विकसित करने के लिए है। गवरी को उदयपुर, बांसवाड़ा और डूंगरपुर जिलों में खेला जाने वाला लोक नृत्य बताया है, जबकि मेवाड़ के इस आदिवासी लोक नाट्य का वागड़ में चलन नहीं है।

किसी को आहत करने का मकसद नहीं : प्रो. सीमा

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत पहली बार वागड़ की संस्कृति को संघर्ष के साथ पाठ्यक्रम में शामिल कराया है ताकि विद्यार्थी इस समृद्ध विरासत को जानें। फिर भी ई-बुक की किसी भी जानकारी से कोई आपत्ति है तो उसे हटाकर नए सर्वमान्य तथ्य जोड़ेंगे। मेरा उद्देश्य किसी को आहत करना नहीं, बल्कि वागड़ की अद्वितीय संस्कृति से जन-जन को रू-ब-रू कराना है। -प्रो. सीमा मलिक, ई-बुक संपादक

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