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दुनिया का अनूठा वाटर मैनेजमेंट सिस्टम:जब अमेरिका में एनिकट नहीं थे, तब मेवाड़ के राजाओं ने बना दिए थे बांध और झील, बारिश की एक बूंद भी नहीं होती बर्बाद

उदयपुर7 महीने पहलेलेखक: निखिल शर्मा
उदयपुर की झीलें और बांधों काे इस तरह से लिंक किया गया है कि पानी व्यर्थ नहीं जाता।

उदयपुर में अच्छी बारिश के बाद अब झीलें और बांध भरने लगे हैं। पिछले कुछ दिनों कई छोटे बांध ओवरफ्लो होकर छलक गए। वहीं पीछोला, बड़ा मदार और टीडी डैम जैसे बड़े बांध और झीलों मे पानी बढ़ा। इन बांध और झीलों के ओवरफ्लो हो जाने के बाद भी पानी व्यर्थ नहीं जाता है। उदयपुर के अनूठे वाटर मैनेजमेंट सिस्टम से बांध और झीलों का पानी सहेजा जाता है। ये मैनेजमेंट सिस्टम आधुनिक नहीं बल्कि 400 से 500 साल पुराना है। महाराजा उदयसिंह के समय से शुरू हुआ मेवाड़ में पानी को संजोने का सिलसिला अब तक जारी है।

राजस्थान में मानसून के चार महीने ही बारिश होती है। इसी अवधि में ही नदियों में पानी आता है, जिसे बांध बनाकर संग्रहित करने की जरूरत रहती है, ताकि साल भर पानी काम में लिया जा सके। मानसून भी हर साल एक सा नहीं रहता। इस कारण 10 साल में लगभग 5 साल सामान्य वर्षा के, तीन साल अनावृष्टि के और दो साल अतिवृष्टि के होते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए कई वर्षों पूर्व ही मेवाड़ के राजाओं ने इसका स्थाई समाधान ढूंढ लिया था।

बड़ा मदार तालाब ओवरफ्लो होने के बाद फतहसागर को भरता है।
बड़ा मदार तालाब ओवरफ्लो होने के बाद फतहसागर को भरता है।

अमेरिका में जब एनिकट नहीं बने, तब मेवाड़ में बन गई थीं झीलें
जल संसाधन विभाग के पूर्व सुपरिनटैंडैंट इंजीनियर जीपी सोनी बताते हैं कि मेवाड़ के शासकों ने यह अच्छी तरह जान लिया था कि बांधों का निर्माण मानव सभ्यता के लिए बेहद जरूरी है। इनकी जल संग्रह क्षमता को इतनी अधिक रखने की आवश्यकता है कि अतिवृष्टि का पानी अनावृष्टि काल में काम आ सके। उदयसागर झील का निर्माण महाराणा उदयसिंह ने 1560 के लगभग करा दिया था। तब अमेरिका मे एनिकट तक नहीं बने थे। वहीं राजसमंद झील का निर्माण 1671 और जयसमंद झील का निर्माण 1730 में हो गया था। उस समय अमेरिका में एनिकट तक नहीं बने थे।

देश के नेशनल डेम रजिस्टर के अनुसार 1900 तक भारत में कुल 40 बांध थे, जिनमें से 12 राजस्थान में (यानी 30 प्रतिशत) और इन 12 में से 10 (यानी 75%) मेवाड़ में थे। आज पानी की अधिकता वाले क्षेत्रों से कमी वाले क्षेत्रों में पानी पहुंचाने के लिए इंटर बेसिन वाटर ट्रांसफर की बात होती है, मगर यह काम मेवाड़ के शासक 18वीं सदी में ही कर चुके थे।

फतेहसागर को मदार और पीछोला को सीसारमा से किया लिंक

नांदेश्वर चैनल से गुजरकर सीसारमा नदी पीछोला झील को भरती है।
नांदेश्वर चैनल से गुजरकर सीसारमा नदी पीछोला झील को भरती है।

जीपी सोनी बताते हैं कि 1882 से 1889 के बीच जब महाराणा फतेहसिंह ने फतेहसागर का निर्माण कराया था। तब इसमें जल आवक बढ़ाने के लिए मदार के प्राकृतिक नाले पर थूर गांव के पास एक एनिकट बनाया गया। यहां से फतेहसागर के उत्तरी छोर तक लगभग 6 किलोमीटर लंबी नहर बनाकर पानी को फतेहसागर में पहुंचाने की व्यवस्था की गई। इसी प्रकार पीछोला झील में सिसारमा क्षेत्र से आने वाले पानी को फतेहसागर में पहुंचाने के लिए करीब 400 मीटर लंबी लिंक नहर चट्टानें काट कर बनाई गईं। इससे पहले महाराणा स्वरूप सिंह ने लगभग 1850 के करीब स्वरूप सागर का निर्माण कराया था।

पुरखों ने जो दिया, हमें उसे सहेजने की जरूरत : लक्ष्यराज सिंह मेवाड़

लक्ष्यराज सिंह मेवाड़।
लक्ष्यराज सिंह मेवाड़।

मेवाड़ राजघराने के वशंज लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ कहते हैं कि पुरखों ने आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व हमें जो विरासत दी थी हमें उसे सहेजना होगा। पानी की महत्ता उन्होंने उस दौर में समझी। मगर हम अब तक नहीं समझ पाए हैं। पानी को हमें बचाना होगा। पानी की एक बूंद भी व्यर्थ करना बेहद नुकसानदायक हो सकता है। भविष्य जितना चुनौती भरा है उसे देखते हुए हम सबको आगे आकर इसे सहेजने के बारे में सोचने और इसके लिए काम करने की जरूरत है।

इस तरह काम करता है सिस्टम
उदयपुर जिले में गोगुंदा की पहाड़ियां जिले का सबसे ऊंचा पॉइंट हैं, जहां सबसे पहले बारिश होकर तीन अलग-अलग हिस्सों में डायवर्ट होती है। उदयपुर की झीलों में पानी दो रास्तों से आता है।

पहला लिंक

- गोगुंदा की पहाड़ियों और आसपास के कैचमेंट क्षेत्र में होने वाली बारिश का पानी 24 फीट क्षमता वाले बड़ा मदार, 21 फीट क्षमता वाले छोटा मदार और 32 फीट क्षमता वाली बड़ी झील को भरता है।

- बड़ी झील की क्षमता हालांकि काफी ज्यादा होने से वह 10 साल में एक बार ही भर पाती है। दोनों मदार तालाब लगभग हर बारिश में भरते हैं।

- दोनों मदार तालाब भरने के बाद इनका पानी लिंक नहर के माध्यम से उदयपुर की 13 फीट भराव क्षमता वाली फतेहसागर झील में पहुंचता है।

पीछोला झील के ओवरफ्लो होने के बाद इसका पानी फतेहसागर झील में डायवर्ट किया जाता है।
पीछोला झील के ओवरफ्लो होने के बाद इसका पानी फतेहसागर झील में डायवर्ट किया जाता है।

दूसरा लिंक

- उदयपुर के देवास, नाई, कोडियात क्षेत्र के पहाड़ों में होने वाली बारिश से पानी कैचमेंट क्षेत्र में इकट्ठा होता है।

- यहां से यह नादेंश्चर चैनल होते हुए सीसारमा नदी के माध्यम से पीछोला झील में पहुंचता है।

- इसी तरह देवास क्षेत्र में होने वाली अच्छी बारिश से वहां के कैचमेंट से उतरकर पानी 32 फीट क्षमता वाले देवास प्रथम बांध और मादड़ी बांध को भरता है।

- जब ये दोनों बांध ओवरफ्लो होते हैं तो इनका पानी टनल और सीसारमा नदी के माध्यम से 11 फीट भराव क्षमता वाली पीछोला झील में पहुंचता है।

डैम मैनेजमेंट का ऐतिहासिक नक्शा (सन 1900 की स्थिति के अनुसार)
डैम मैनेजमेंट का ऐतिहासिक नक्शा (सन 1900 की स्थिति के अनुसार)

तीसरा लिंक

- पीछोला झील पूरी तरह भरने पर इसका पानी फतेहसागर झील को भरने के लिए डायवर्ट किया है।

- फतेहसागर झील पीछोला के लेवल तक यानी 11 फीट तक भर जाने के बाद पीछोला के गेट खोल आयड़ नदी में इसका पानी छोड़ जाता है।

- फतेहसागर झील के भी ओवरफ्लो होने पर इसका पानी भी लिंक नहर के माध्यम से आयड़ नदी में छोड़ा जाता है।

चौथा लिंक

- फतेहसागर और पीछोला दोनों झीलों में से जब पानी आयड़ नदी में छोड़ा जाता है तब यह पानी लगभग 10 किमी का सफर तय कर 24 फीट भराव क्षमता वाली उदयसागर झील में पहुंचता है।

- दोनों ओर से आने वाले पानी और उदयसागर के कैचमेंट क्षेत्र में होने वाली बारिश के पानी से उदयसागर झील भर जाती है।

- उदयसागर झील भरने के बाद इसका पानी 19.5 फीट भराव क्षमता वाले वल्लभनगर बांध में पहुंचता है और उसे भरता है।

- वल्लभनगर बांध भरने के बाद यहां से पानी बड़गांव और फिर अन्य बांधों को भरते हुए बीसलपुर बांध में पहुंचता है।

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