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कृषि विज्ञान केंद्र चित्तोड़िया:कृषि बीज अनुसंधान के लिए 1949 में मिली थी 185 बीघा जमीन, 80 बीघा से ज्यादा पर हो गए कब्जे

प्रतापगढ22 दिन पहले
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  • शेष जमीन से हर वर्ष बस औसत 1000 क्विंटल गेहूं के बीज से ही करनी पड़ रही संतुष्टि

धरियावद उपखंड मुख्यालय से 7 किमी दूर चित्तोडिया ग्राम पंचायत के अर्न्तगत राजस्थान कृषि स्टेट सीडस कॉपरेशन लिमिटेड उदयपुर को करीब 185 बीघा जमीन 1949 में कृषि संबंधित विभिन्न अनुसंधान के लिए आवंटित की गई थी। विभाग की मिली भगत, शिथिलता के चलते उक्त जमीन के आस-पास की करीब 80 बीघा से ज्यादा बहुमूल्य जमीन पर कई लोगों ने अतिक्रमण कर लिया। जिसका प्रकरण उच्च न्यायालय में विचाराधीन है।

किसानों को उन्नत और हाइब्रिड बीज देने के लिए इस जमीन का आवंटन किया गया था, ताकि किसान खेती में नए-नए प्रयोग करके मुनाफा कमा सके। लेकिन आज जमीन का उद्देश्य केवल हर वर्ष औसत रूप से गेहूं के करीब 1000 क्विंटल तो सोयाबीन के करीब 400 क्विंटल तक बीज देने तक ही सीमित रह गया है। हर 3 साल में ठेकेदारों के साथ यहां जमीन की स्थिति और परिस्थिति भी लगातार बदलती गई। उदयपुर सीड्स कॉरपोरेशन खुद की जमीन की मॉनिटरिंग करने की बजाय इसे ठेकेदारों के निजी हाथों में सौंप दिया। बाद में जब विवाद लगा तो सरकार ने इसे 5 साल के लिए उदयपुर महाराणा प्रताप कृषि अनुसंधान विश्वविद्यालय को दे दिया। एमपीयूएटी की शाखा प्रतापगढ़ कृषि विज्ञान अनुसंधान केंद्र पिछले 3 साल से इसकी जिम्मेदारी संभाल रहा है, लेकिन यहां से भी ठेका पद्धति अभी तक चल रही है। इस जमीन को लोग कृषि विज्ञान केंद्र की जगह चित्तोड़िया कृषि फार्म के नाम से लोग जानने लग गए। कई लोगों ने मिलकर इस जमीन पर कब्जे किए तथा कई बहुमूल्य सागवान एवं पत्थरगढ़ी आदि को भी तहस नहस कर दिया।

आवंटन के समय करीब 185 बीघा थी जमीन, लीज पर 100 बीघा ही दस्तावेज में
वर्ष 1949 में जब यह जमीन उदयपुर बीज निगम को दी गई थी, तब यह करीब 185 बीघा से ज्यादा थी। जबकि लीज पर दी जाने वाली जमीन 100 बीघा ही बची हुई है। बाकी करीब 80 बीघा से ज्यादा जमीन पर अतिक्रमण का मामला हाई कोर्ट में चल रहा है। तीन वर्ष पूरे होने के पश्चात 31 मई 2021 को फिर से इसे कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से लीज पर दिया जाने वाला है।

किसानों काे नहीं मिला पूरा फायदा
धरियावद क्षेत्र में जाखम बांध परियोजना की नहरें चारों अाेर फैली हुई है, ऐसे में यहां पानी की कमी नहीं है। अगर इस जमीन पर कृषि वैज्ञानिक अनुसंधान होते उन्नत और हाइब्रिड बीजों का उत्पादन होता तो यहां के करीब दो लाख से ज्यादा किसानों को इसका फायदा निश्चित रूप से मिलता। किसान आज भी परंपरागत बीज और खेती से ही अपना काम चला रहे हैं। तकनीकी खेती के तरीके, फसलों की उन्नत वैरायटी तैयार करना, एग्रीकल्चर की वैज्ञानिक पद्धति से आविष्कार करना, मौसम अनुकूल वैरायटी, किसानों को जानकारी जैसे काम यहां पर होने थे।

अवैध रूप से पेड़ों की कटाई और खनन
कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से नए और उन्नत तरह के बीज को लेकर होने वाले प्रयोग तो हुए नहीं, उल्टा इस जमीन को खाली पड़ा रखने की बजाय उपयोग के लिए हर 3 साल के टाइम पीरियड पर ठेकेदारों को बुवाई के लिए दी जाने लगी। ठेकेदार भी टेंडर के अनुसार निश्चित मात्रा में गेहूं और सोयाबीन के बीज अनुसंधान केंद्र को उपलब्ध करवा देते हैं और बाकी अपने उपयोग के लिए ले लेता है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि जमीन पर अवैध रूप से पेड़ों की कटाई और खनन का कार्य भी होता है। इस वजह से इस जमीन पर लगे जंगल अब बिल्कुल नजर ही नहीं आते, यह जमीन पूरी तरह से उजाड़ बंजर नजर आती है।

लोगों ने शिकायत की तो धणी-धोरी बदले, लेकिन स्थिति वही
ग्रामीणों द्वारा राज्य सरकार के पास शिकायतें जाने के पश्चात सरकार ने यह जमीन बीज भंडार की जगह 5 वर्ष के लिए उदयपुर महाराणा प्रताप कृषि प्रोधोगिकी विश्वविद्यालय उदयपुर के हवाले कर दी। उसी की ब्रांच प्रतापगढ़ जिला मुख्यालय पर कृषि विज्ञान केंद्र के नाम से संचालित है। लेकिन धणी धोरी बदलने के बावजूद इस जमीन की किस्मत नहीं बदली। आज जमीन का उद्देश्य महज प्रतिवर्ष एक हजार क्विंटल गेंहू एवं 400 क्विंटल सोयाबीन का बीज उत्पादन करने तक सीमित रह चुका है।

आसपास के किसानों की मांग, अतिक्रमण हटे
चित्तौड़िया निवासी रखमल मीणा, भूरा मीणा, विष्णु कुमार, धरियावद निवासी संजय शर्मा, वागराम, मनीष धाकड़ अधिक किसानों का कहना है कि कृषि विज्ञान कंद्र द्वारा इस भूमि का तीन वर्ष के लिए लीज पर दिए जाने के नियम को सरकार तुरंत प्रभाव से रद्ध करे। जिस प्रायोजन से सन 1949 में जमीन आरक्षित कर किसानों के लिए इसे रखा गया था, उसी प्रायोजन से इसे फिर से चलाया जाए। यहां पर कृषि संबंधी प्रयोग हों, उन्नत बीज तैयार हो। 70 वर्ष के दौरान यहां पर जिन जिन लोगों ने अतिक्रमण किए, उनके अतिक्रमण भी हटाए जाएं।

सरकार ने हमें 5 वर्ष के लिए कृषि फार्म दिया है, पूर्व में बीज निगम द्वारा इस पर मूलभूत ध्यान नहीं दिया गया। इस कारण अतिक्रमण वाले मामले हाईकोर्ट में विचाराधीन है। फिर भी हमारे केन्द्र द्वारा इस पर बीज उत्पादन का कार्य ठेके के माध्यम से कराया जा रहा है। पिछले 3 साल में स्थिति काफी सुधरी है। यदि जमीन पर अनुसंधान केन्द्र के लिए सरकार स्टाफ व बजट जारी कर देती है तो निश्चित ही किसानों के लिए इस जमीन का बेहतर उपयोग फायदा।
-योगेश कनौजिया, प्रभारी, कृषि विज्ञान केंद्र प्रतापगढ़।

राज्य सरकार ने माइक्रो मेनेजमेंट के तहत यह जमीन कृषि महाविद्यालय को सुपुर्द की है। यदि सरकार यहां अनुसंधान केंद्र खोलती है तो उसके अनुकूल व्यवस्थाएं होंगी। मौके की स्थिति देखते हुए उन्नत बीज उत्पादन के लिए ठेके पर देना उचित है। प्रशिक्षण केंद्र अधीनस्थ बहुत कुछ हो सकता है, परंतु मौके पर सिर्फ जमीन ही है तो उसके लिए हमारे पास जो भी विकल्प है, उसी को अपनाएंगे। इसके विकास के लिए जनप्रतिनिधि, किसान, सरकार से संपर्क करके कुछ होता है तो हमारा विभाग भी सक्रियता के साथ अच्छे परिणाम देने में सक्षम है।
-एनएस राठौड़, वीसी, एमपीयूएटी, उदयपुर।

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