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  • In The Temple Of Maa Chamunda Built At A Height Of 200 Feet In Molela Village, Famous For Clay Crafts, Worship Is Done To Guard The Khed, On The Request Of A Jain Saint, Animal Sacrifice Is Banned For 16 Years.

650 सालों से खुले में विराजी है मां चामुंडा:मोलेला में पहाड़ी पर बना खेड़ादेवी माता का मंदिर, दूसरे राज्यों से भी दर्शन के लिए आते हैं भक्त, मन्नत पूरी होने पर चढ़ाते हैं त्रिशूल

राजसमंद2 महीने पहले
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खेड़ादेवी माताजी। - Dainik Bhaskar
खेड़ादेवी माताजी।

मोलेला गांव में पहाड़ी पर स्थित खेड़ा देवी माताजी मंदिर में शारदीय नवरात्रि के मौके पर घट स्थापना की गई। मंदिर के भोपाजी मांगी लाल कुम्हार के सानिध्य में घट स्थापना की गई है। कोरोना संक्रमण को देखते हुए श्रद्धालुओं को कोरोना प्रोटोकॉल की पालना के अनुसार दर्शन करवाए जा रहे है। मंदिर के गेट पर खड़े लोग मास्क लगाने और दो गज दूरी के नियम की पालना करवा रहे है और मंदिर में प्रवेश​​​​ दिया जा रहा है।

खेड़ा देवी माताजी मंदिर
खेड़ा देवी माताजी मंदिर

650 साल से भी ज्यादा पुराना है मंदिर
मोलेला गांव में पहाड़ी पर करीब 650 वर्ष से भी ज्यादा पुराना खेड़ा देवी माता का मंदिर है। दुनियाभर में मृण शिल्प के लिए प्रसिद्ध मोलेला गांव की पहाड़ी पर स्थित मंदिर करीब 200 फीट ऊंचाई पर बना है और 25 बीघा क्षेत्र में फैला है। इस मंदिर में चामुंडा माता की प्रतिमा की पूजा अर्चना होती है। पहाड़ी पर स्थित मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब 120 सीढ़ियां है। नवरात्रि के मौके पर मुंबई, गुजरात, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में रहने वाले क्षेत्र के प्रवासी दर्शन करने आते हैं। हरियाली के बीच पहाड़ी पर विराजित मां खेड़ा देवी का मंदिर आकर्षक लगता है।

जैन संत के आग्रह पर पशु बलि पर लगा दी रोक
साल 2006 से पहले माता को पशु बलि दी जाती थी। पुजारी जीवन लाल कुम्हार ने बताया कि मोलेला गांव में 2004 में चातुर्मास कर रहे श्रमण संघीय महामंत्री सौभाग्य मुनि को नवरात्रि पर माता के मंदिर में पशु की बलि देने की जानकारी मिली थी। तब उन्होंने गांव के लोगों से पशु बलि नहीं देने का आग्रह किया। वे खुद मंदिर पहुंचे थे। इसके बाद साल 2006 से नवरात्र सहित वर्ष भर होने वाले कार्यक्रमों में बलि पर रोक लग गई।

मन्नत पूरी होने पर चढ़ाते हैं त्रिशूल
यह मंदिर मोलेला और आसपास के गांवों में रहने वाले भक्तों की गहरी आस्था का केंद्र है। भक्त मन्नत पूरी होने पर मंदिर में अपने शरीर के बराबर वजन का त्रिशूल चढ़ाते हैं। मंदिर में आने वाले भक्तों के लिए तो कई सुविधाएं है। लेकिन माताजी आज भी बैर के पेड़ के नीचे खुले में विराजे हैं।

ड्रोन पर्सन-: भूपेश दुर्गावत

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