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माेरे ठाकुर, फिर ना दीजाे ऐसा विछाेह:कपाट बंद, जन्माष्टमी के उत्सव मंदिराें के भीतर, आधी रात बजे शंख-घड़ियाल, पहला माैका जब प्रभु और भक्ताें के बीच ऐसी दूरी

राजसमंदएक महीने पहले
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यह पहली जन्माष्टमी थी, जब भक्त मंदिराें में अपने ठाकुरजी के जन्माेत्सव पर हाेने वाले अनुष्ठान और दर्शनाें से वंचित रहे। काेराेना संक्रमण के चलते पुष्टिमार्गीय मत की प्रधान पीठ श्रीनाथजी से वैष्णवाें का ऐसा विछाेह 348 साल में पहली बार दिखा। कांकराेली में प्रभु द्वारकाधीशजी और गढ़बाेर में चारभुजानाथ मंदिर के इतिहास में भी यह पहला माैका था, जब प्रभु और भक्ताें के बीच ऐसी दूरी रही।

हालांकि मंदिराें में जन्माष्टमी पर आधी रात जन्म के दर्शन खुलने, श्रीनाथजी में तीनाें ठाकुरजी का साथ में पंचामृत स्नान का साल में एक बार हाेने वाले दर्शन सहित सभी परंपराएं विधि-विधान से निभाई गई, कमी सिर्फ भक्ताें की थी। नाथद्वारा के रिसाला चाैक में आधी रात 2 ताेपाें से 21 बार सलामी दी गई। द्वारकाधीश मंदिर में भी बंदूकाें से सलामी देने की परंपरा निभाई गई। चारभुजानाथ मंदिर में जन्माष्टमी पर प्रभु काे पंचामृत तथा पंजीरी का भाेग धराया।

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