इंट्रावस्कुलर शॉक वेव लिथोट्रिप्सी:आगरा में पहली बार हुई नई तकनीक से एंजियोप्लास्टी, हार्ट अटैक के मरीज की बचाई जान

आगरा2 महीने पहले
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इंट्रावस्कुलर शॉक वेव लिथोट्रिप्सी तकनीक से एंजिओप्लास्टी कर  हार्ट अटैक का इलाज करने वाले सीनियर इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. मनीष शर्मा - Dainik Bhaskar
इंट्रावस्कुलर शॉक वेव लिथोट्रिप्सी तकनीक से एंजिओप्लास्टी कर  हार्ट अटैक का इलाज करने वाले सीनियर इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. मनीष शर्मा

आगरा के एक निजी अस्पताल में पहली बार एंजियोप्लास्टी की नई इंट्रावस्कुलर शॉक वेव लिथोट्रिप्सी तकनीक से गंभीर हार्ट अटैक के मरीज के ब्लॉकेज का सही ऑपरेशन कर उसकी जान बचाई गयी। 56 वर्षीय महेंद्र कुमार (परिवर्तित नाम) को सीने में तेज दर्द की शिकायत के बाद उन्हें एक निजी अस्पताल ले जाया गया। यहां जांच में सामने आया कि मरीज की सबसे बड़ी हार्ट आर्टरी में कैल्शियम वाला ब्लॉकेज है तो इंट्रावस्कुलर शॉक वेव लिथोट्रिप्सी (आईवीएल) तकनीक से मरीज की एंजियोप्लास्टी कर उसे बचाया गया। आगरा में पहली बार इस तकनीक का इस्तेमाल कर किसी मरीज की एंजियोप्लास्टी की गई।

कैल्शियम से ब्लॉक हो गई थी नस

शहर में पहली बार इस नई तकनीक का इस्तेमाल करने वाले केस करने वाले निजी हॉस्पिटल के सीनियर इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. मनीष शर्मा ने बताया कि जब मरीज को लाया गया तो मरीज का हार्ट सिर्फ 25 प्रतिशत ही काम कर रहा था। ऐसे में बायपास सर्जरी करने पर उसकी जान को खतरा हो सकता है। जांच में पता लगा कि उसकी कोरोनरी आर्टरी में कैल्सिफाइड ब्लॉकेज था, जिसकी सामान्य स्टेंटिंग करने पर आर्टरी के फटने या स्टेंट के वापस ब्लॉक होने की संभावना थी।

नई तकनीक से हुआ सफल ऑपरेशन

इंट्रावस्कुलर शॉक वेव लिथोट्रिप्सी (आईवीएल) तकनीक से न केवल उनका कैल्सिफाइड ब्लॉकेज टूटा, बल्कि सेफ स्टेंटिंग से उनकी जान भी बचाई जा सकी। मरीज के परिजन डॉक्टरों का धन्यवाद कर रहे हैं।

मरीजों के लिए बेहद कारगर है यह तकनीक

जिन मरीजों की हार्ट की नसों में कैल्सिफाइड ब्लॉकेज होता है और उनके स्टेंट वापस बंद होने की संभावना होती है, उनके लिए इंट्रावस्कुलर लिथोट्रिप्सी से एंजियोप्लास्टी बेहद कारगर है। इसमें सोनोग्राफिक वेव से कैल्शियम को तोड़ा जाता है और स्टेंट डाला जाता है। डॉ. मनीष ने बताया कि आर्टरी में स्टेंट ठीक से खुला है या नहीं, इसका पता लगाने के लिए ऑप्टिकल कोहैरेंस टोमोग्राफी (ओसीटी) जांच की जाती है। इस जांच में आर्टरी को सोनोग्राफी की अपेक्षा 10 गुना अधिक रेज्यूलेशन से देखा जा सकता है और शॉक वेव लिथोट्रिप्सी से कैल्शियम कितना टूटा है, स्टेंट अच्छे से खुला है या नहीं, इसका पता लगाया जा सकता है।

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