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मथुरा के गांव में हुई अनोखी परंपरा:15 फीट चौड़ी दहकती आग में कूदा पंडा मोनू, एक बार फिर जीवंत हो उठी भक्त प्रह्लाद की लीला

मथुराएक महीने पहले
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धधकती आग से होकर गुजरता मोनू पंडा। - Dainik Bhaskar
धधकती आग से होकर गुजरता मोनू पंडा।
  • मथुरा से 50 किमी दूर है फालैन गांव, यहां सदियों से निभाई जा रही परंपरा
  • एक माह पहले से अन्न छोड़कर जप-तप में लीन हो जाता है मोनू पंडा

उत्तर प्रदेश में मथुरा का फालैन गांव में मनाए जाने वाली होली पौराणिक आख्यान का साक्षात प्रतिनिधित्व करती है। गांव में सोमवार सुबह होली की अनोखी परंपरा हुई। प्रह्लाद की तरह 15 फीट चौड़ी धधकती आग में मोनू पंडा नाम का एक शख्स कूद गया। दहकती होलिका की आग के बीच से जब पंडा दौड़ते हुए निकला तो इसे देखने वाला हर कोई अचंभित हो उठा। यह नजारा देखकर लोग भक्त प्रह्लाद के जयकारे लगाने लगे। आग में कूदने के बाद मोनू को कुछ नहीं हुआ। मोनू का कहना है कि उनका परिवार सदियों से इस परंपरा को निभा रहा है।

अनोखे रिवाज को देखने के लिए उमड़े लोग

मथुरा से 50 किमी दूर छाता तहसील के गांव फालैन में होली पर एक अद्भुत परंपरा का निवर्हन किया जाता है। इस गांव में भक्त प्रह्लाद का मंदिर है। मंदिर के बाहर 15 फीट चौड़ी होलिका सजाई गई। इस के बगल में प्रह्लाद कुंड है। रविवार देर रात से ही इस अनोखे रिवाज को देखने के लिए हजारों लोग जमा थे। महिलाएं भक्त प्रह्लाद के गीतों को गा रही थीं। वहीं मोनू पंडा मंदिर में बैठकर जप-तप कर रहा था। यहां होलिका का दहन सोमवार सुबह करीब 5 बजे किया गया। आग की लपटें तेजी से ऊपर उठने लगीं। इस दौरान मोनू को प्रह्लाद कुंड तक ले जाया गया। जहां उसने डुबकी लगाई और फिर दौड़ते हुए जलती हुई होलिका में कूद गए। जब वह बाहर निकले तो ग्रामीणों ने उन्हें लपक लिया। इसके बाद उन्होंने होलिका की परिक्रमा की और घर चले गए।

गांव में दिवाली जैसा माहौल

कुंड से करीब 50 मीटर दूर रखी जाने वाली यह होली और सभी जगह रखी जाने वाली होलियों से बड़ी होती है। इसी होली में से मोनू पंडा निकला। यहां होली पर पूरे गांव में लोग दिवाली की तरह साफ सफाई करते हैं। इस दौरान ग्रामीण अपने घरों की रंगाई पुताई करते हैं। इस अद्भुत मेले के लिए गांव में अलग ही माहौल होता है। ग्रामीण इस मेले में जलती होली से मोनू पंडा के सकुशल निकलने के लिए भजन पूजन करते हैं।

एक माह पहले छोड़ दिया था अन्न

मोनू पंडा बताते हैं कि जलती होलिका में कूदने के लिए वे बसंत पंचमी से मंदिर में रह रहे थे। इस दौरान उन्होंने एक महीने तक व्रत रखा। अन्न छोड़ दिया था और पानी और फल का सेवन करते रहे। मोनू पंडा के अनुसार यह परंपरा सतयुग से चल रही है। सतयुग से होते हुए आज कलयुग में भी इस परंपरा को बखूबी निभाया जा रहा है। धधकती होलिका में कूदने के दौरान कंधे पर एक गमछा, गले में माला व सिर पर पगड़ी व धोती पहने हुए थे।

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