बदहाली के आंसू बहा रही नजीर अकबराबादी की मजार:ताजमहल के पश्चिमी गेट से 300 मीटर की दूरी पर भी नहीं पड़ी अफसरों की नजर, आज लगता है मेला

सिकंदरा, आगरा10 दिन पहले

भारत में उर्दू के मशहूर शायर नजीर अकबराबादी का जन्म 1737 में दिल्ली में हुआ था। बताया जाता है कि वह 22 वर्ष की उम्र में अपनी मां और नानी के साथ आगरा आ गए, जहां पर उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा को पूरा किया। नजीर अकबराबादी की मजार ताजगंज क्षेत्र की मलको गली में ताजमहल के पश्चिमी गेट से मात्र 300 मीटर की दूरी पर स्थित है।

साथ ही उनके परिवार के अन्य लोगों की मजार भी उनके पास ही बनी हुई है। लेकिन अब यह मजार अपने बदहाली के आंसू रो रही है। जहां उनकी और उनके परिवार की मजार बनी है उसे मियां नजीर पार्क भी कहा जाता है लेकिन की मजार के पास तमाम गंदगी और आवारा जानवरों का डेरा लगा रहता है। 25 जनवरी को मियां नजीर की मजार पर बसंत उत्सव मनाया जाता है। लेकिन साल में यही एक ऐसा दिन है जब उन्हें याद किया जाता है। उसके अलावा कोई भी साहित्य, कलाकार व जनप्रतिनिधि उनकी मजार पर सजदा करने भी नहीं आता।

नजीर की गजल सुनकर मीर ने दी थी शाबाशी

नजीर अकबराबादी का जन्म वैसे तो 1737 में दिल्ली में हुआ था लेकिन कई अन्य इतिहासकार यह भी बताते हैं कि वह आगरा में पैदा हुए थे। उनकी मां आगरा किले के किलेदार नवाब सुलतान खां की बेटी थी। नजीर का असली नाम वली मोहम्मद था और उनके वालिद मोहम्मद शाह रंगीला थे। बताया जाता है कि 1770 में मीर तकी मीर आगरा आए थे। मीर तकी मीर ने नजीर की गजल पर उन्हें शाबाशी दी और इसके बाद नजीर आगरा के शायर के नाम से मशहूर हो गए। नजीर की सबसे प्रमुख प्रस्तुति बंजारा नामा बताई जाती है। नजीर अकबराबादी का समय 1737 से 1830 बताया जाता है और उनकी मजार इस समय ताजगंज की मलको गली में स्थित है।

इस मजार के पास गंदगी के ढेर लगे रहते हैं। रखरखाव कोई इंतजाम नहीं है।
इस मजार के पास गंदगी के ढेर लगे रहते हैं। रखरखाव कोई इंतजाम नहीं है।

हिंदू मुस्लिम दंगों के यहीं से गया शांति का पैगाम

नजीर अकबराबादी की मजार की देखभाल करने वाले तैमूर अली का कहना है कि करीब 100 साल पहले आगरा में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए थे और आगरा में एक जुलूस निकाला गया था। जिसमें सभी को शांति का पैगाम दिया गया था। यह जुलूस नजीर अकबराबादी की मजार पर ही खत्म हुआ था। उसके बाद से ही यहां पर बसंत के दिन उत्सव का आयोजन होना शुरू हो गया। ऐसे में हर साल जनवरी में 25 तारीख को यहां बसंत मेले का आयोजन किया जाता है। कई बड़े साहित्यकार यहां आते हैं और ग़ज़ल व नज्में में पेश करते हैं।

आपको बता दें कि नजीर अकबराबादी को उर्दू 'नज़्म का पिता' भी कहा जाता है। उन्होंने आम जीवन, रितु, त्यौहार, फल और सब्जियों पर नज्म लिखी। बताया जाता है कि उन्होंने करीब दो लाख रचनाएं लिखी लेकिन अधिकतर रचनाएं नष्ट हो गई और अब सिर्फ 6000 रचनाएं बची है जिनमें करीब 600 ग़ज़लें शामिल है।नजीर अकबराबादी की यह खासियत थी कि उन्होंने उर्दू शायरी को उस समय एक नए और अनोखे तरीके से पेश किया।

श्री कृष्ण पर लिखी थी नज्म

नजीर ने अपनी शायरी के लिए अपने आसपास बिखरी हुई जिंदगी से विषयों को चुना और होली, दिवाली, राखी, शब ए बारात, ईद, पतंगबाजी, कबूतर बाजी, बरसात और इस तरह के कई विषयों के बारे में नज़्म और गजलें लिखी। वही नजीर अकबराबादी ने अपनी शायरी में हिंदू मुस्लिम एकता का भी परिचय दिया।

उन्होंने श्री कृष्ण, राधा, मीरा और मुस्लिम त्योहारों के साथ हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों पर भी कई नज्में लिखी हैं। जिसमें एक नज्म जो उन्होंने माखन चोर कृष्ण के लिए लिखे उसमें उन्होंने लिखा-ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन। क्या क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन। यारों सुनो यह दधि के लुटैया का बालपन।और मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन। मोहन सरूप निरत करैया का बालपन। बन बन के ग्वाल गौए चरैया का बालपन। ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।

मजार के पास का नजारा देख बदहाली किसी से छिप नहीं सकती।
मजार के पास का नजारा देख बदहाली किसी से छिप नहीं सकती।

'सब ठाट पड़ा रह जाएगा, जब लाद चलेगा बंजारा

1830 में नजीर का निधन हो गया लेकिन सालों तक उनकी लिखी हुई नज्मों को कोई भी पहचान ना मिली। बीसवीं शताब्दी के मध्य काल में आकर मियां नजीर उभरे और ऐसे उभरे कि आलोचकों के पास उनकी धार्मिक सहिष्णुता, देश प्रेम, भ्रात भाव और पैनी दृष्टि की प्रशंसा करने के अतिरिक्त कोई भी चारा नहीं रहा। उनकी एक लाइन 'सब ठाट पड़ा रह जाएगा, जब लाद चलेगा बंजारा' जैसी कविताएं जो 19वीं शताब्दी के आलोचकों की दृष्टि में सिर्फ उपहास समझी जाती थीं अब कविता प्रेमियों जुबान पर सज रही हैं। भारत में उर्दू के प्रसिद्ध शायर नजीर अकबराबादी की मजार और उनके परिवार की मजार साथ में ही बनी हुई है। आज 25 जनवरी को उनकी मजार पर बसंत मेले का आयोजन हो रहा है।

ऐसे में मजार का सौंदर्यीकरण करने के लिए कई लोगों को लगा दिया गया है। लेकिन 25 जनवरी के अलावा अन्य दिनों में यहां पर सिर्फ कूड़े और आवारा जानवरों का कब्जा रहता है। नजीर अकबराबादी ने मुस्लिम समुदाय में पैदा होने के बावजूद हिंदू और मुस्लिम एकता की मिसाल अपनी नज्मों में दिखाई। कहीं ना कहीं इसी की वजह से उनके समुदाय ने उनसे किनारा भी कर लिया और इसी का कारण है कि आज उनकी मजार बदहाली के आंसू रो रही है।

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