आलापुर...बाबा गोविंद साहब का मेला समापन की ओर:मेले में 230 वर्षों से सोने-चांदी मिश्रित खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा

आलापुर, अम्बेडकरनगर12 दिन पहले
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बाबा गोविंद साहब की तपोस्थली पर माह भर से अधिक समय तक चलने वाला पूर्वांचल का ऐतिहासिक गोविंद साहब मेला अब धीरे-धीरे समापन की ओर है। विगत 230 वर्षों से यहां सोने, चांदी के जेवरात के अलावा हजारों रुपए के चावल मिश्रित कच्ची खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा है।

ऐसा कहा जाता है कि आंतरिक प्रेम का प्रतीक होने के कारण चावल मिश्रित कच्ची खिचड़ी महात्मा को अत्यंत प्रिय थी। मठ समिति के आंकड़ों के मुताबिक पिछले वर्ष भक्तों ने महात्मा की समाधि पर करीब चार लाख का चढ़ावा चढ़ाया था। नगदी और खिचड़ी के चढ़ावे से मठ के खाते में अब तक करोड़ों रुपए जमा हो चुके हैं। आजमगढ़ की सीमा पर आलापुर तहसील क्षेत्र के अहिरौली गोविंद साहब में प्रतिवर्ष अगहन मास की गोविंद दशमी तिथि से मेला लगता है।जो निरन्तर एक माह तक चलते हुए मकर संक्रांति पर समाप्त होता है। जिसमें गाजीपुर बलिया मऊ संत कबीर नगर बस्ती गोरखपुर आजमगढ़ वाराणसी चंदौली कुशीनगर देवरिया समेत पूर्वांचल के विभिन्न अंचलों एवं सीमावर्ती बिहार प्रांत के आधा दर्जन जिलों से श्रद्धालु आते हैं और महात्मा की समाधि पर आस्था रूपी चावल मिश्रित कच्ची खिचड़ी चढ़ाते हैं। मान्यता है कि यहां गोविंद सरोवर में स्नान के बाद भीगे कपड़ों में ही महात्मा की समाधि पर खिचड़ी चढ़ाने से भक्तों की मुरादें पूरी होती हैं।बाद में इसे मठ प्रशासन द्वारा नीलामी के माध्यम से बेचा जाता है।

मठ परिसर के आसपास दर्जनों लोग कपड़े की पोटली में चावल मिश्रित कच्ची खिचड़ी बेंचकर स्वरोजगार करते हैं। खिचड़ी के साथ नगदी भी।गोविंद साहब की समाधि पर श्रद्धालु खिचड़ी के गट्ठर के साथ नगदी भी चढ़ाते हैं। नीलामी व गट्ठर से प्राप्त रकम को गोविंद साहब के खजाने में जमा कर दिया जाता है। मठ समिति के सदस्यों के मुताबिक खिचड़ी की नीलामी व जमीनों के किराए आदि की आय से लगभग तीन करोड़ से अधिक की धनराशि मठ के बैंक खाते में जमा है।

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