रानी V/S पटरानी में फंसी BJP:गरिमा सिंह-अमिता सिंह की लड़ाई में पार्टी किसके साथ, अमेठी में राजघराने की दोनों बहुओं ने ठोंकी दावेदारी

अमेठी6 दिन पहले
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राजघराने की दो बहुएं चुनावी दंगल में आमने-सामने हैं। अमेठी में गरिमा सिंह वर्सेज अमिता सिंह बीजेपी के लिए मुश्किल बनने जा रहा है। साल 2017 चुनाव में तत्कालीन कांग्रेस नेता संजय सिंह की पहली पत्नी गरिमा सिंह को टिकट देकर भाजपा ने चुनाव जीता था। वहीं, इस बार संजय सिंह अपनी दूसरी पत्नी अमिता सिंह समेत भाजपा में शामिल हो चुके हैं। अब वह भी अमेठी सदर सीट से चुनाव में अपनी दावेदारी ठोंक रही हैं। जिसके लिए वह लगातार क्षेत्र में जनसंपर्क कर रही हैं।

दूसरी तरफ गरिमा सिंह वर्तमान भाजपा विधायक भी क्षेत्र में सक्रिय हैं। ऐसे में क्षेत्र में चर्चा है कि भाजपा आखिर किसे टिकट देगी। बताते चलें कि 2017 में गरिमा सिंह ने अपनी सौतन कांग्रेस प्रत्याशी अमिता सिंह को हराकर यह सीट भाजपा की झोली में डाली थी।

बहरहाल, भाजपा सूत्रों की माने तो जो कैंडिडेट क्षेत्र में भारी पड़ेगा। उसी को पार्टी टिकट देगी। जिसके लिए सिर्फ अमेठी सदर ही नहीं बल्कि कई अन्य सीटों पर भी मंथन चल रहा है। जानकारों की माने तो राजघराने की लड़ाई से पार्टी को कोई मतलब नहीं है। उसकी नजर सिर्फ जिताऊ कैंडिडेट पर है। फिलहाल अभी दोनों रानियां अपनी मजबूत दावेदारी का दम भर रही हैं।

2017 में गरिमा सिंह ने अपनी सौतन कांग्रेस प्रत्याशी अमिता सिंह को हराकर यह सीट भाजपा की झोली में डाली थी।
2017 में गरिमा सिंह ने अपनी सौतन कांग्रेस प्रत्याशी अमिता सिंह को हराकर यह सीट भाजपा की झोली में डाली थी।

2017 में दोनों एक-दूसरे के खिलाफ लड़ चुकी हैं चुनाव

2017 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के गढ़ अमेठी की सदर सीट पर न तो राहुल गांधी चर्चा में थे न ही उनका अखिलेश यादव के साथ गठबंधन चर्चा में था। इस सीट पर बस आम लोगों के बीच एक राजा की दो रानियों की जंग चर्चा में थी। दरअसल, गठबंधन के बावजूद इस सीट से सपा से गायत्री प्रसाद प्रजापति ने पर्चा भरा था तो कांग्रेस से अमिता सिंह उतरी थीं। भाजपा को इस सीट को जीतने के लिए ट्विस्ट पैदा करना था। इसलिए उसने गरिमा सिंह को टिकट दिया। उसके बाद से उन्होंने जनता की भावनाओं को हथियार बनाया। हर जनसभा में वह अमेठी की जनता से रानी को राजा से न्याय दिलाने की मांग करती दिखीं। उन्होंने सीट जीत ली। इसके बावजूद उन्हें अभी न्याय नहीं मिल पाया है।

भूपति भवन में ही रहती हैं दोनों रानियां

संजय सिंह और अमिता सिंह की शादी 1995 में हुई थी। उसके बाद 2017 में अचानक गरिमा सिंह लाइम लाईट में आई और उन्होंने बताया कि संजय सिंह से उनका तलाक नहीं हुआ। उन्होंने राजमहल समेत विरासत पर अपना दावा ठोंक दिया और राजमहल के दो कमरों में रहने लगी। जबकि बाकी महल पर संजय सिंह और अमिता सिंह का ही कब्जा है। बताया जाता है कि भूपति भवन में 100 से ज्यादा कमरें हैं। बहरहाल, गरिमा सिंह के बेटे अनंत विक्रम सिंह अपनी विधायक मां के प्रतिनिधि हैं और क्षेत्र में वही सक्रिय रहते हैं।

अमिता सिंह 2002 में बीजेपी के टिकट पर अमेठी से विधायक चुनी गई थीं।
अमिता सिंह 2002 में बीजेपी के टिकट पर अमेठी से विधायक चुनी गई थीं।

अमिता कांग्रेस के टिकट पर भी लड़ चुकी हैं चुनाव?

अमिता सिंह और उनके पति संजय सिंह जुलाई 2019 में कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल हुए हैं। अमिता सिंह 2002 में बीजेपी के टिकट पर अमेठी से विधायक चुनी गई थीं। राजनाथ सरकार में मंत्री भी रहीं। 2004 का उपचुनाव और 2007 का चुनाव उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर जीता था। अमिता सिंह को 2012 में सपा के गायत्री प्रजापति ने हरा दिया था।

विधायक बनने के पहले वह सुल्तानपुर से भाजपा की जिला पंचायत अध्यक्ष भी रहीं। अमिता सिंह के पास राजनैतिक अनुभव भी है। साथ ही वह अब अमेठी के गली मुहल्लों में आसानी से दिख जाती है। जाहिर है उनके ऊपर भी दबाव है कि किसी न किसी तरह से भाजपा का टिकट उन्हें लेना है। इससे जहां उनका राजनैतिक रुतबा बढ़ेगा। साथ ही साथ पारिवारिक झगड़े में भी वह एक कदम आगे हो जायेंगी।

2022 की तैयारियों में लगे हैं दोनों दावेदार

अमेठी विधायक गरिमा सिंह के प्रतिनिधि व उनके बेटे अनंत विक्रम सिंह ने टिकट दावेदारी को लेकर कहा कि इसमें भी कोई संदेह नहीं है। हमने सीट जीता और काम किया है। आगे भी काम करेंगे। जबकि पूर्व मंत्री अमिता सिंह ने कहा कि हम दावेदारी की रेस में हैं। पार्टी हाईकमान जो निर्देश देगा। हम उसे मानने के लिए तैयार हैं। क्षेत्र में हमारा जनसंपर्क भी जारी है।

2022 से तय होगा संजय और अमिता का राजनैतिक भविष्य

संजय सिंह अपनी दूसरी पत्नी अमिता सिंह समेत अब भाजपा में हैं। यदि उन्हें 2022 विधानसभा का टिकट नहीं मिलता है तो जानकार मानते हैं कि इससे दोनों की राजनैतिक भविष्य पर विराम लग जायेगा। अब उन्हें दूसरा मौका 2024 लोकसभा चुनावों में ही मिल पायेगा। जब संजय सिंह भाजपा को दूसरी बार अमेठी जितवाएंगे। तब ही वह राज्यसभा या उन्हें कोई अन्य पद दिया जा सकता है।

क्या है राजघराने का इतिहास?

  • अमेठी राजघराने से जुड़े लोग 10 बार विधायक और 5 बार संसद सदस्य रह चुके हैं। अमेठी राजपरिवार के राजा रणंजय सिंह 1952 के पहले चुनाव में निर्दलीय विधायक चुने गए थे।
  • 1969 में जनसंघ और 1974 में कांग्रेस के टिकट पर जीते। 1962 से 1967 तक अमेठी से कांग्रेस के टिकट पर संसद का चुनाव भी जीते। वो कोई भी चुनाव नहीं हारे थे।
  • उनकी राजनैतिक विरासत को उनके बेटे संजय सिंह ने संभाला। कांग्रेस के टिकट पर वो 1980 से 1989 तक वो अमेठी से विधायक चुने गए। कई विभागों के मंत्री भी रहे।
  • वीपी सिंह ने जब जनता दल बनाई तो वे उनके साथ हो लिए। 1989 के चुनाव में संजय सिंह ने राजीव गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा लेकिन वो राजीव गांधी को हरा नहीं पाए। फिर वो बीजेपी में शामिल हो गए।
  • 1998 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उन्हें टिकट दिया इस बार संजय सिंह जीत गए। लेकिन अगले साल हुए लोकसभा चुनाव में सोनिया ने अमेठी से पर्चा भरा इस बार संजय सिंह को गांधी परिवार से फिर हार का सामना करना पड़ा।
  • संजय सिंह 2003 में एक बार फिर कांग्रेस में वापस लौटे। 2009 के चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर सुल्तानपुर से जीते। बाद में कांग्रेस ने उन्हें राज्य सभा भेज दिया लेकिन कार्यकाल खत्म होने से पहले ही जुलाई 2019 में एक बार फिर बीजेपी में शामिल हो गए।
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