अयोध्या में जातीय समीकरण फेल !:ब्राह्मण बाहुल्य इस विधानसभा से केवल तीन ब्राह्मण विधायक चुने गए, सात बार मिली हार

अयोध्या9 महीने पहले
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देश की राजनीति का केंद्र बनी अयोध्या में आजादी के बाद से अब तक विधानसभा चुनाव में कभी भी जातीय समीकरण काम नहीं आया। - Dainik Bhaskar
देश की राजनीति का केंद्र बनी अयोध्या में आजादी के बाद से अब तक विधानसभा चुनाव में कभी भी जातीय समीकरण काम नहीं आया।

अयोध्या विधानसभा क्षेत्र का जातीय गणित हमेशा गड़बड़ होता रहा है। यहां कभी भी हार -जीत में जातीय समीकरण काम नहीं आया। ब्राह्मण बाहुल्य इस क्षेत्र में केवल तीन विधायक ब्राह्मण चुने गए और जब भी ब्राह्मण प्रत्याशी जीते, ब्राह्मण मतदाताओं का उनकी जीत में योगदान न के बराबर रहा। तीनों ही ब्राह्मण विधायक समाजवादी खेमे के रहे। सात बार ब्राह्मण प्रत्याशियों को यहां हार मिली, जिसमें से दो बार तो वे कम वोट बैंक वाले पंजाबी (खत्री) बिरादरी से हारे।

ब्राह्मणों की संख्या लगभग 70 हजार
क्षेत्र का सबसे अधिक पांच बार प्रतिनिधित्व करने वाले भारतीय जनता पार्टी के लल्लू सिंह क्षत्रिय हैं। जबकि क्षत्रियों का मत कभी निर्णायक नहीं रहा, लेकिन एक तरफा स्वजातीय प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करने से क्षत्रिय प्रत्याशियों को हमेशा लाभ हुआ। चुनाव में जीत दर्ज करने वाले पहले क्षत्रिय प्रत्याशी कांग्रेस के सुरेंद्र प्रताप सिंह थे। तब ब्राह्मण कांग्रेस का वोट बैंक माना जाता था। 1985 के चुनाव में जब वह जीते थे, तब संवेदना लहर कांग्रेस के पक्ष में बड़ा निर्णायक कारक बनी। क्षत्रिय मतदाताओं की अनुमानित संख्या इस क्षेत्र में लगभग 28 हजार है, जबकि ब्राह्मणों की संख्या लगभग 70 हजार है।

बार-बार बिगड़ता रहा है जातीय समीकरण
पहली बार जब 1967 में वैश्य बिरादरी के बृजकिशोर अग्रवाल भारतीय जनसंघ से चुनाव जीते, तब वैश्यों की शहरी आबादी बहुत नहीं थी। उसके बाद विश्वनाथ कपूर ने बीकेडी के ब्राह्मण प्रत्याशी को हराया। 1974 के चुनाव में जनसंघ के वेद प्रकाश अग्रवाल ने बीकेडी के ही संत श्री राम द्विवेदी को बहुत ही कम अंतर से हराया। 1977 में जयशंकर पांडेय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े। वह समाजवादी खेमे के थे। ब्राह्मण कांग्रेस का वोट बैंक था। लेकिन जनता लहर में वह जातीय समीकरण के विपरीत होते हुए भी चुनाव जीत गए, लेकिन अगले ही चुनाव में उन्हें चंद परिवारों तक सीमित खत्री बिरादरी के निर्मल खत्री से शिकस्त मिली। फिर सुरेन्द्र प्रताप सिंह कांग्रेस से जीते। उन्होंने भाजपा के पिछड़ा वैश्य वर्ग से आने वाले जुझारू नेता भगवान जायसवाल को हराया।

दलितों के हैं 50 हजार मत
इस विधानसभा क्षेत्र का गणित 22000 वैश्य, 22000 कायस्थ और लगभग इतने ही निषाद तय करते हैं। यादवों के 40 हजार और मुस्लिम के लगभग 27 हजार वोट जरूर हैं, लेकिन एक दो चुनावों को छोड़ दें तो ये कभी खेल बिगाड़ नहीं पाए। यूं तो दलितों के 50 हजार मत हैं, लेकिन इनके सहारे किसी की नैया पार नहीं लगी, बल्कि कुर्मी के लगभग 18 हजार मत ज्यादा दबाव बनाते हैं।

लल्लू सिंह और अशोक तिवारी ने बिगाड़ा खेल
2007 के चुनाव में ब्राह्मण मतों के बूते जब इंद्र प्रताप तिवारी खब्बू चुनाव लड़े। उनके विरुद्ध लल्लू सिंह के साथ बसपा के अशोक तिवारी ने उनका खेल बिगाड़ दिया। वह 6000 मतों से हारे और सपा के आधार वोट पर ही सिमट गए। अगले चुनाव में उनकी बनाई जमीन पर सपा के पवन पांडेय ने फसल काटी। हालांकि, क्षत्रियों के वर्चस्व वाले मया बाजार के अयोध्या विधानसभा क्षेत्र से अलग होने से बदली परिस्थितियों ने उनकी राह आसान की और 1991 से चले आ रहे भाजपा के लल्लू सिंह का वर्चस्व तोड़ने में कामयाब रहे।

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