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बलिया में विभागों में सड़ रहे करोड़ों के सरकारी वाहन:CMO आवास में सालों से खड़ी हैं दर्जनों गाड़ियां, नई एंबुलेंस रखे-रखे हुईं खराब, थानों का भी यही हाल

बलिया7 महीने पहले
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बलिया के कुछ सरकारी विभागों में करोड़ों रुपए की गाड़ियां जंग खा रही हैं। विभाग की ओर से न तो उनकी मरम्मत कराई जा रही है और न ही निलामी की प्रक्रिया ही हो रही है। ऐसे में कीमती वाहनों को सड़ते देखना लाचारी है। सरकारी महकमों में कर्मचारियों के लिहाज से स्वास्थ्य विभाग शायद सबसे बड़ा है। इस विभाग में छोटे-बड़े वाहनों का बड़ा बेड़ा हैं। अधिकारियों के लिए कार और जीप तथा कर्मचारियों के लिए मिनी बस तक मुहैया कराई जाती है। इसके साथ ही रोगियों के लिए बड़ी संख्या में एंबुलेंस भी स्वास्थ्य विभाग के पास है।

सूत्रों की मानें तो कई बार मामूली तकनीकी गड़बड़ी पर उसकी मरम्मत कराने के बजाय अधिकारी खड़ा कर देते हैं। यही कारण है कि पिछले कुछ साल में दर्जनों की संख्या में स्वास्थ्य विभाग की गाड़ियां सीएमओ आवास में खड़ी हो गईं। वर्तमान समय में तो कइयों का पहिया और अन्य सामान गायब हो चुके हैं, जबकि बाकी सड़ने के कागार पर हैं। विभाग के कुछ लोगों का कहना है कि महज हजार दो हजार रुपए के लिए लाखों की गाड़ियां कबाड़ बन चुकी हैं। आलम यह है कि सीएमओ के बंगले के अंदर गाड़ियों को अब रखने तक की व्यवस्था नहीं है।

एंबुलेंस के ऊपर जमी झाड़ियां।
एंबुलेंस के ऊपर जमी झाड़ियां।

झुरमुटों के बीच छिपी नीली बत्ती कार

नीली बत्ती लगी गाड़ियों का अपना एक अलग रुतबा होता है। उससे चलने वाला व्यक्ति गजेटेड ऑफिसर कहलाता है। हालांकि सीएमओ आवास में खड़ी नीली बत्ती कार को देखने से यह बात बेमानी लगती है। जिस नीली बत्ती लगी अम्बेसडर कार से कभी सीएमओ चलते थे, वह अब झुरमुटों के बीच छिप गई है। पूरी तरह से सढ़ने के कागार पर पहुंच चुकी कार के ऊपर घासफूस जम चुके हैं। हालत यह है कि गाड़ी के ऊपर सिर्फ नीली बत्ती ही नजर आ रही है।

शहर को साफ-सुथरा रखने के लिए नगर पालिका की ओर से लाखों रुपए की गाड़ियों की खरीदारी होती है। हालांकि रख-रखाव के अभाव में कुछ साल में गाड़ियां खड़ी होकर सड़ने लगती हैं। जगदीशपुर पानी टंकी में नगर पालिका की आधा दर्जन गाड़ियां खड़ी हैं, जिनके कल-पुर्जे जंग से समाप्ति के कगार पर पहुंच चुके हैं। सूत्रों की मानें तो इनमें कुछ गाड़ियां तो बिल्कुल नई हैं। खास बात यह है कि एक वाहन का अब तक रजिस्ट्रेशन भी नहीं हो सका है।

एंबुलेंस के ऊपर जमी झाड़ियां।
एंबुलेंस के ऊपर जमी झाड़ियां।

थानों में सड़ रहा महामाया सचल अस्पताल

लोगों को स्वास्थ्य सुविधा आसानी से उपलब्ध कराने के लिए करीब एक दशक पहले महामाया सचल अस्पताल योजना शुरू हुई। उसकी गाड़ियां आज जगह-जगह खड़ी होकर जंग खा रही हैं। सीएमओ आवास और पुलिस थानों में खड़े सचल अस्पताल में लगे अधिकांश उपकरण चोरी हो चुके हैं। वर्ष 2007 में तत्कालीन बसपा सरकार ने गांव-गांव तक ग्रामीणों को स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने के लिए महामाया सचल अस्पताल जैसी महत्वाकांक्षी योजना लागू की।

इसके तहत एक पूरी तरह आधुनिक वातानुकूलित बड़ी वैन में चिकित्सक और पैरा मेडिकल स्टाफ विभिन्न प्रकार की दवाओं आदि से लैश होकर गांवों में पहुंचते और ग्रामीणों का स्वास्थ्य परीक्षण कर उन्हें समुचित परामर्श और दवाएं उपलब्ध कराते थे। इसके साथ ही एएनएम व पैरा मेडिकल स्टाफ के लोग गांव की गर्भवती महिलाओं, किशोरियों और बच्चों के लिए टीके, आयरन की गोली और आवश्यक दवाओं का वितरण करते। इस योजना के तहत जिले को करीब 21 सचल अस्पताल उपलब्ध कराए गए। हालांकि कुछ दिनों बाद ही यह योजना बंद हो गई, लिहाजा करोड़ों रुपए की कीमती गाड़ियां जगह-जगह खड़ी होकर सड़ रही हैं।

रखे-रखे कबाड़ा हो गए वाहन।
रखे-रखे कबाड़ा हो गए वाहन।

लोनिवि के गेट पर जंग खा रहे वाहन

लोक निर्माण विभाग के कुंवर सिंह चौराहा स्थित कार्यालय के बाहर टैंकर और अन्य वाहन वर्षों से खड़े हैं। अब उनका अस्तित्व मिटने के कगार पर पहुंच चुका है। सिंचाई विभाग, नलकूप विभाग आदि महकमों में भी सरकारी गाड़ियां सड़-गल रही हैं। सरकारी सम्पत्ति होने के चलते वाहनों के मरम्मत अथवा निलामी करने का प्रयास कोई अधिकारी नहीं कर सका।