आते हैं कलरव करने, बन जाते हैं निवाला:बलिया के सुरहा ताल में विदेशी मेहमानों का शिकार, अब कम संख्या में पहुंचते हैं साइबेरियन पक्षी

बलिया10 दिन पहले
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बलिया में करीब 10 किमी की परिधि में फैले प्राचीन सुरहा ताल पक्षी विहार में सर्दी के शुरुआत के साथ ही प्रवासी पक्षियों के आने का सिलसिला भी शुरू हो गया। सुरहा की वादियों में पक्षियों का झुंड खुले आसमान तले मस्ती करते हैं। हालांकि स्वंछद रूप से ताल के पानी में कलरव करने के लिए पहुंचने वाले विदेशी मेहमानों में से कितने शिकारियों से बचकर सुरक्षित वापस लौटेंगे, यह स्थानीय लोगों और सुरक्षा के जिम्मेदारों पर निर्भर करेगा।

10 किमी क्षेत्र में फैला है सुरहा ताल

बता दें कि सर्दी शुरू होते ही परदेश से हजारों की संख्या में लगभग 10 किमी क्षेत्रफल में फैले सुरहा ताल में विदेशी पक्षियों के आने का क्रम शुरू हो जाता है। आने वाले परिंदे करीब एक-डेढ़ दशक पहले यहां आने के बाद पूरी तरह महफूज रहते थे। ताल के किनारे स्थित गांवों के बड़े व बूढ़े इन विदेशी महमानों को पानी में अटखेलियां करते देख खुश होते थे। हालांकि इधर के कुछ वर्षों से स्थानीय लोगों ने इनका शिकार कर खाना और बेचना शुरू कर दिया।

हजारों मील की दूरी तय कर पहुंचते हैं पक्षी

धीरे-धीरे कुछ लोगों ने इसे अपना व्यवसाय बना लिया। इस बात का असर इनके आवक पर भी पड़ा और कुछ नस्लों के पक्षियों ने तो यहां का रुख करना ही बंद कर दिया। इस साल सर्दी के साथ हजारों मील की दूरी तय कर प्रवासी पक्षी पहुंच रहे हैं। शिकारी भी अब उन्हें निवाला बनाने की टोह में जुट गए हैं। ऐसे में प्रशासन की जिम्मेदार बढ़ गई है।

वाइल्ड लाइन पर है सुरक्षा का जिम्मा

राजा सुरथ के नाम से जुड़े सुरहा के किनारे बसे गांवों फुलवरिया, बघौता, मैरीटार, कैथवली, सूर्यपुरा, दतिवड़, शिवपुर और बंसतपुर आदि गांवों को बीच से चीरते हुए बारहों मास बहने वाले सुरहा ताल में पैदा होने वाले ललका, सूर्यपंखी, टुड़ैला आदि धान को खाने के लिए आने वाले प्रवासी मेहमानों को शौकीनों का निवाला बनने से रोकने के लिए कुछ साल पहले शासन ने ताल को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया। साथ ही इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी काशी वन्य जीव प्रभाग रामनगर वाराणासी के हवाले कर दी। बावजूद, उनके शिकार होने का सिलसिला थम नहीं पा रहा है। अब देखने वाली बात यह है कि इस साल इन परदेशी परिदों की सुरक्षा वन विभाग किस हद तक कर पाता है।