देवरिया में तिवारी परिवार बना किसानों के लिए प्रेरणा:पारंपरिक खेती छोड़ व्यवसायिक खेती को अपनाया, केला, पपीता और गोभी से हो रही आमदनी

देवरिया2 महीने पहले
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तिवारी परिवार क्षेत्र के लिए बना मिसाल - Dainik Bhaskar
तिवारी परिवार क्षेत्र के लिए बना मिसाल

देवरिया के बनकटा विकास खंड के भड़सर गांव की पहचान उन्नतिशील किसान तिवारी परिवार के नाते भी है। इनकी खेती देखने जिले भर से लोग आते हैं। यूपी ही नहीं बल्कि बिहार के सीमावर्ती इलाकों से लोग व्यवसायिक खेती सीखने आते हैं। चाहें जितनी भी व्यस्तता हो। तिवारी परिवार का कोई व्यक्ति समय जरूर देता है।

व्यवसायिक खेती को दी है धार
प्रभाषकर नारायण तिवारी ने बताया कि पारंपरिक खेती में लागत बढ़ती जा रही है और मुनाफा जस का तस है। ऐसे में व्यवसायिक खेती कर किसान अपनी आमदनी बढ़ाकर खेती को मुनाफे में तब्दील कर सकते हैं।

गर्मी वाली गोभी की खेती
प्रभाष्कर बताते हैं गर्मियों वाली गोभी की नर्सरी के लिए 20 फरवरी से बीज गिरा सकते हैं। यह 22 से 23 दिनों में पौधे की शक ने आ जाता है। इसे लगाने के 55 से 60 दिनों में फूल आना शुरू हो जाता है। एक एकड़ में 22 से 23 हजार पौधे आसानी से लग जाएंगे। गोभी का एक फूल 500 से 800 ग्राम तक वजन होगा।

व्यवसायिक खेती से तिवारी परिवार ने सुधारा अपना जीवनस्तर
व्यवसायिक खेती से तिवारी परिवार ने सुधारा अपना जीवनस्तर

खेत से ले जाते हैं स्थानीय थोक व्यापारी
बनकटा से छह किलोमीटर की दूरी पर बिहार के मैरवा में सब्जी मंडी है। 40 रुपए प्रति किलो ग्राम गोभी बेचने के लिए व्यापारियों को बाहर से गोभी लाने में दस रुपए के आसपास मंडी और माल भाड़ा लग जाता है।ऐसे में उनका मुनाफा घट जाता है। यहां से ले जाने पर मंडियों का शुल्क और माल भाड़ा बहुत कम हो जाता है। इसलिए व्यापारी यहां से ले जाना ज्यादा पसन्द करते हैं।

सितंबर तक होती है गोभी की बिक्री
प्रभाष्कर बताते हैं कि गर्मियों वाली गोभी सितम्बर तक बिकती है। इस दौरान लग्न होने से बाजार में बहुत मांग रहती है। सितंबर तक गोभी का रेट चढ़ता रहता है और 40 रुपए से कम कभी नहीं होता।
आसपास समेत बाहर के किसानों को बताते हैं खेती की तरकीब प्रभाष्कर और उनके पिता रमाशंकर तिवारी क्षेत्र में किसानों के बीच बीते एक दशक से आइकॉन बनकर उभरे हैं। जिले और बिहार बार्डर इलाकों के किसान उनसे खेती के गुर सीखने आते हैं। पिता पुत्र किसी को निराश नहीं करते। पिता पुत्र कहते हैं कि किसानी घाटे का सौदा नहीं है बल्कि तकनीकी और समय को पहचान कर खेती करने की जरूरत है।

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