ऐतिहासिक शिव मंदिर पर गिरी आकाशीय बिजली:इटावा में मंदिर के गुंबद में आई दरारें, चंबल के बीहड़ में है भारेश्वर मंदिर; यहां पांडवों ने की थी पूजा, पीछे हट गए थे अंग्रेज

इटावा2 महीने पहले
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भारेश्वर मंदिर पर गिरी बिजली। - Dainik Bhaskar
भारेश्वर मंदिर पर गिरी बिजली।

इटावा में चंबल के बीहड़ में ऐतिहासिक भारेश्वर मंदिर पर बिजली गिरने से बड़ा नुकसान हुआ है। पुजारी ने बताया कि रात करीब 2 बजे बिजली गिरी है। मंदिर का ऊपरी हिस्सा क्षतिग्रस्त हुआ है। निचले हिस्से में भी नुकसान हुआ है। भारेश्वर मंदिर का पांडवों से भी खास नाता रहा है। भगवान श्रीकृष्ण के निर्देश पर पांडवों ने शंकर भगवान की आराधना हेतु भीमसेन द्वार व शंकर की विशाल पिंडी की स्थापना की थी।

इटावा जिले के भरेह थाना क्षेत्र के भरेह गांव में चंबल और यमुना नदी के संगम स्थल पर यह ऐतिहासिक भारेश्वर मंदिर स्थापित है। ग्राम प्रधान राधवेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि बिजली गिरने से भारेश्वर मंदिर को बड़ा नुकसान हुआ है। नुकसान का आकलन करने के लिए राजस्व विभाग के अफसरों से सर्वे कराने का अनुरोध किया गया है।

बिजली गिरने से क्षतिग्रस्त हुआ मंदिर का ऊपरी हिस्सा।
बिजली गिरने से क्षतिग्रस्त हुआ मंदिर का ऊपरी हिस्सा।

444 फीट की ऊंचाई पर बना है यह मंदिर

बिजली गिरने से मंदिर का गुबंद कई जगह न केवल जल गया बल्कि पत्थर के टुकड़े भी टूट-टूट कर जमीन पर आ गिरे। चंबल नदी के किनारे स्थित भारेश्वर महादेव का हजारों साल पुराना मंदिर महाभारत के मुख्य पात्र पांडवों की आस्था का केंद्र रहा है। भारेश्वर मंदिर के पुजारी चंबल गिरी बताते हैं कि 444 फीट की ऊंचाई पर बने मंदिर तक पहुंचने के लिए 108 सीढ़ियां हैं। सीढ़ियों की बनावट व मंदिर का शिखर यह बताता है कि यह द्वापर युगीन है। इस तथ्य पर कई विद्वान भी एक मत हैं। उन्होंने बताया कि भरेह के राजा रूप सिंह ने अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ इस स्थल पर सेना की प्रशिक्षण कार्यशाला बनाई थी।

यहां अंग्रेज भी पीछे हटने को हुए थे मजबूर

ऐसा कहा जाता है कि एक बार जब अंग्रेजों ने मंदिर को घेर लिया तो मंदिर से निकलीं मधुमक्खियों ने उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। बनारस के विद्वान नीलकंठ भट्ट ने भगवंत भास्कर नामक ग्रंथ में मंदिर की महिमा का वर्णन करते हुए लिखा है कि, ‘कृत शालिनी मध्य देशे ख्याता भरेह नगरी, किल तत्र राजा राजीव लोचन रतो भगवंत देवा’।

ऐतिहासिक भारेश्वर मंदिर।
ऐतिहासिक भारेश्वर मंदिर।

आध्यात्मिक ज्ञान एवं तपस्या का केंद्र रहा है यह मंदिर

यमुना-चंबल संगम पर स्थित भारेश्वर महादेव मंदिर प्राचीन काल से आध्यात्मिक ज्ञान एवं तपस्या का केंद्र रहा है। मान्यता है कि विद्वान नीलकंठ ने कर्मकांड एवं दंड के 12 मयूक (ग्रंथ) एवं आयुर्वेदिक ग्रंथ इसी मंदिर में रहकर लिखा था। आगरा जाते समय महात्मा तुलसीदास भी इस मंदिर में कुछ समय रहे। परमहंस गुंधारी लाल ने भारेश्वर महाराज की तपस्या कर अपना कर्मक्षेत्र ग्राम बडेरा को बनाया। परमहंस पुरुषोत्तम दास महाराज ने बिना भोजन व जल के भोलेनाथ की तपस्या की।

पांडवों ने यहीं की थी पूजा-अर्चना

पांडवों ने अज्ञातवास के समय भगवान श्रीकृष्ण के निर्देश पर शंकर भगवान की आराधना हेतु भीमसेन द्वार व शंकर की विशाल पिंडी की स्थापना की थी, जिसकी द्रोपदी सहित पांचों पांडवों ने पूजा-अर्चना की। मान्यता के अनुसार जो भक्त भगवान भोलेनाथ की पूजा करके बाहर नंदी के कान में जो भी मनोकामना मांगता है, वह शीघ्र ही पूरी हो जाती है।

जर्जर हो चुका है भरेह का किला

पंचनद के साथ भरेह भी पर्यटक स्थल घोषित कर दिया गया है, लेकिन अभी इस इलाके में विकास संभव नहीं हो सका है, जबकि भरेह के जर्जर हो चुके किले का भी जीर्णोंधार होना जरूरी है, क्योंकि सैलानियों के लिए किला भी आकर्षण का केंद्र है।

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