नोएडा के नलगढ़ा गांव का आजादी से गहरा नाता:6 साल भगत सिंह यहां पर रहे थे, यहीं बनी थी असेंबली में बम फेंकने की रणनीति

नोएडा6 दिन पहले
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सेक्टर-145 के नलगढ़ा में यही स्थान है जहां शहीद पार्क का निर्माण होना था। इसमें सिर्फ एक बोर्ड लगा हुआ है। - Dainik Bhaskar
सेक्टर-145 के नलगढ़ा में यही स्थान है जहां शहीद पार्क का निर्माण होना था। इसमें सिर्फ एक बोर्ड लगा हुआ है।

दिल्ली असेंबली में बम फेंकने के लिए 23 मार्च 1931 को क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई थी। देश को आजादी दिलाने में इन क्रांतिकारियों की भूमिका अहम रही थी। गणतंत्र दिवस के दिन दैनिक भास्कर आजादी से गहरा नाता रखने वाले नोएडा के नलगढ़ा गांव से जुड़ा एक किस्सा आपको बता रहा है।

यह गांव कभी शहीद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, नेता जी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज में कर्नल रहे करनैल सिंह की शरणस्थली रहा है। यहां आज भी उनका परिवार रह रहा है। उनके घर के पास बने गुरुद्वारे में एक पत्थर रखा है। ये वही पत्थर है जिस पर गोला-बारूद को आजमाया जाता था।

करनैल सिंह के परिवार के मुताबिक, भगत सिंह नलगढ़ा गांव में छह साल रहे। यहां रहकर उन्होंने आजादी की लड़ाई को कामयाब बनाने की रणनीति तैयार की। 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली में असेंबली में बम फेंकने की योजना भगत सिंह ने नलगढ़ा गांव में ही बनाई। नलगढ़ा से क्रांतिकारी पैदल यमुना को पार कर दिल्ली गए थे। यहां से सभी क्रांतिकारी एक साथ निकले, इसके बाद अलग-अलग हो गए।

नोएडा के सेक्टर-145 स्थित नलगढ़ा गांव इसी गांव में शहीद भगत सिंह ने बनाया था बम जिसे असेंबली में फेंका गया था
नोएडा के सेक्टर-145 स्थित नलगढ़ा गांव इसी गांव में शहीद भगत सिंह ने बनाया था बम जिसे असेंबली में फेंका गया था

एक सीटी पर लाइन में लगते थे आजाद हिंद फौज के जवान
करनैल सिंह परिवार के पास भगत सिंह और करनैल सिंह से जुड़ी कई यादगार धरोहर हैं। इसमें वो खोल भी है जिसमें बारुद भरकर बम तैयार किया जाता था और वो सीटी भी, जिसके बजते ही आजाद हिंद फौज के सभी जवान एक लाइन में खड़े हो जाते थे। इनकी याद में कभी-कभी वह भावुक भी हो जाती हैं।

बम बनाने में इस पत्थर का होता था इस्तेमाल
बम बनाने में जिस पत्थर का प्रयोग भगत सिंह ने किया था, वो आज भी गांव के गुरुद्वारा में रखा है। इस पत्थर पर लोग मत्था टेकने के लिए दूर-दूर से आते हैं। पत्थर में जगह-जगह गढ्‌ढे बने हैं। इसमें बारुद को भरकर उसे पक्का किया जाता था। मनजीत कौर ने कहा कि इतना ऐतिहासिक स्थल होने के बाद भी आजादी के बाद यहां कोई भी ऐतिहासिक स्थल नहीं बनाया गया है। कम से कम भगत सिंह, करनैल सिंह और शहीदों की याद में गांव के बाहर एक गेट ही बना दिया जाए।

दिल्ली के नजदीक होने की वजह से था पसंदीदा स्थल
दिल्ली से नलगढ़ा की दूरी महज 25 किमी है। ऐसे में दिल्ली से सटा होने की वजह से क्रांतिकारियों की ये पहली पसंद था। परिवार के मुताबिक, यहां बाढ़ जोन एरिया और घना जंगल था। यहां उनको ढूंढ पाना आसान नहीं था। बारिश के समय सूरजपुर से नलगढ़ा तक नाव से सफर होता था और यमुना पार कर दिल्ली जाया करते थे।

नलगढ़ा गांव में बना हुआ गुरुद्वारा इसे 1962 में बनाया गया था।
नलगढ़ा गांव में बना हुआ गुरुद्वारा इसे 1962 में बनाया गया था।

शहीद की अनदेखी का लोगों में दर्द
नलगढ़ा गांव के लोगों में इस शहीद स्थल को विकसित न किए जाने का दर्द है। उनका कहना है कि प्राधिकरण अधिकारी आते हैं और चक्कर लगाकर चले जाते हैं। गांव में म्यूजियम और लाइब्रेरी भी बननी चाहिए। इसका प्लान भी था। दरअसल, नोएडा प्राधिकरण ने इसकी एक डीपीआर (डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट) तैयार की थी। जो फाइलों में कहीं खो गई है। चौंकाने वाली बात ये है सर्किल अधिकारी डीपीआर बनी होने की बात कहते हैं। वहीं प्राधिकरण का ही उद्यान विभाग इस तरह की डीपीआर बनाने की बात से इनकार कर रहा है।

प्राधिकरण के भू लेख विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, इस जमीन का अधिकांश हिस्सा विवादित है। यहां किसानों का अदालतों में केस चला रहा है। जिसमे से आधी जमीन का निस्तारण किया जा चुका है। प्राधिकरण की टीम जब भी वहां जाती है काम करने से रोक दिया जाता है। इसी वजह से प्रस्ताव तैयार करने के बाद भी इसे बोर्ड में नहीं रखा गया।

गुरुद्वारे में रखा गया ये पत्थर वहीं है जिस पर पत्थर को पीस कर बम का मसाला तैयार किया जाता था।
गुरुद्वारे में रखा गया ये पत्थर वहीं है जिस पर पत्थर को पीस कर बम का मसाला तैयार किया जाता था।

गांव की 50 प्रतिशत आबादी सरदार की
गांव में सरदारों के अलावा, जाट, गुर्जर, पंडित व मुस्लिम भी हैं जिनमें 50 प्रतिशत से अधिक सरदार हैं। गौरतलब है कि 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंक गिरफ्तारी दी थी। बताया गया कि यह गांव बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों में आता था और घने जंगलों में था। ऐसे में अंग्रेजी हुकूमत से छिपने के लिए यह बेहतर स्थान था।

ऐसे में शहीद भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव, सुभाष चंद्र बोस, उनके ससुर करनैल सिंह ने यहीं पर मिलकर बारूद से बम बनाया था। वह पत्थर और बम का खोल अभी तक मौजूद है। पत्थर को गांव में 1962 में बनाए गए गुरुद्वारा में हिफाजत से रखा गया है। पत्थर पर पीसकर बम बनाते थे।

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