• Hindi News
  • Local
  • Uttar pradesh
  • Ghaziabad
  • Brown Tiger Will Go To The Village Today, Farmers Are Also Bringing Pots And Huts; The Youth Who Came To Ask For Jobs Had Also Joined This Movement.

एक आंदोलन जो अनूठे रिश्ते दे गया:किसान आंदोलन में शामिल रामकुमार बोले- सालभर इसी घड़े का पानी पीकर जिंदा रहा, अब इसको संजोकर रखूंगा

गाजियाबादएक महीने पहलेलेखक: सचिन गुप्ता
गाजीपुर बॉर्डर से लौट रहे हैं किसान

यूपी-दिल्ली के गाजीपुर बॉर्डर पर 383 दिन तक चला किसान आंदोलन कई अनूठे रिश्ते जोड़ गया। शुरुआती दिनों से बॉर्डर पर रहा भूरा टाइगर (स्ट्रीट डॉग) आज एक किसान के साथ उनके घर जा रहा है। भूरा को अब कोई आवारा नहीं कहेगा। राम कुमार घड़ा लेकर अपने गांव जा रहे हैं। कह रहे हैं कि सालभर इसी घड़े का पानी पीकर जिंदा रहा, अब इसको संजोकर रखूंगा।

राजस्थान के कुछ युवा कम्प्यूटर भर्ती को लेकर दिल्ली आए थे, लेकिन गाजीपुर बॉर्डर से ऐसा लगाव हुआ कि ताउम्र याद रहेगा। किसानों के चले जाने का मलाल उन बच्चों को भी है, जो कूड़ा-कचरा बीनने के बाद खाना खाने के लिए धरने में आते थे।

बॉर्डर पर पला-बढ़ा भूरा टाइगर अब दौराला में रहेगा

दौराला के किसान रवींद्र चौधरी ने भूरा को अपने बच्चे की तरह पाला और ट्रेनिंग दी। इसी का नतीजा है कि वह हमेशा उनके साथ ही रहता है।
दौराला के किसान रवींद्र चौधरी ने भूरा को अपने बच्चे की तरह पाला और ट्रेनिंग दी। इसी का नतीजा है कि वह हमेशा उनके साथ ही रहता है।

गाजीपुर बॉर्डर पर किसानों के रिश्ते ही मजबूत नहीं हुए, बल्कि जानवरों से भी आत्मीय संबंध बन गए। इस कुत्ते का नाम है भूरा टाइगर। जब आंदोलन शुरू हुआ, तब यह बहुत छोटा था। जैसे-जैसे आंदोलन परवान चढ़ा, भूरा भी बड़ा होता गया।

दौराला के किसान रवींद्र चौधरी ने इसे अपने ही बच्चे की तरह पाला और ट्रेनिंग दी। इसी का नतीजा है कि भूरा हमेशा उनके साथ ही रहता है। उनके टेंट में ही सोता है। बॉर्डर पर साथ-साथ घूमता है। साथ ही उनकी भाषा भी अच्छी तरह जानता-समझता है। इन दोनों में ऐसा रिश्ता बना कि 380 दिनों के बाद अब भी दोनों साथ-साथ ही रहेंगे। रवींद्र बुधवार को भूरा को अपने साथ गांव लेकर जा रहे हैं।

बच्चों को भी किसानों के जाने का मलाल

कूड़े-करकट से पन्नी-गत्ता और अन्य सामान बीनने वाले बच्चों को सुबह से शाम तक भरपेट खाना मिला।
कूड़े-करकट से पन्नी-गत्ता और अन्य सामान बीनने वाले बच्चों को सुबह से शाम तक भरपेट खाना मिला।

ऐसा ही रिश्ता इस आंदोलन का ऐसे तबके से बना, जो दिनभर दो समय की रोटी की तलाश में कूड़ा बीनते-बीनते बड़े होते हैं। ये देश के वे सितारे हैं, जिनके नन्हे हाथ चाहकर भी चांद-सितारे छूने की केवल तमन्ना ही कर सकते हैं। 1 साल 15 दिन तक इन बच्चों ने अपना मूल पेशा यानी कूड़े-करकट से पन्नी-गत्ता और अन्य सामान ढूंढना तो नहीं छोड़ा। इतना जरूर हुआ कि सुबह से शाम तक भरपेट खाना इन्हें मिला। जो मन आया, जी भरकर खाया। लंगर और भंडारे से कभी भी इन्हें निराश नहीं लौटना पड़ा।

गाजीपुर बॉर्डर पर हाईवे पर लगे लंगर का आखिरी दिन मंगलवार था। ये बच्चे रोज की तरह पेट की आग शांत करने में जुटे थे। पूछने पर मुस्कान भरे चेहरे से बस यही कहते कि अब यहां तो खाना नहीं मिलेगा। घर से ही खाकर निकलेंगे। बताते हैं कि ऐसा खाना कभी नहीं खाया। घर में या तो रोटी-सब्जी मिलती है या दाल-चावल। कभी-कभी केवल नमकीन रोटी ही मिल पाती है। कहते हैं यहां की याद तो आएगी। यहां सभी लोग बहुत अच्छे थे। दाढ़ी और पगड़ी वाले अंकल कभी नहीं भगाते थे। घर ले जाने के लिए खाना भी दे देते थे।

राजस्थान की कंप्यूटर भर्ती और किसान आंदोलन

राजस्थान में कंप्यूटर ऑपरेटरों को संविदा पर करने के खिलाफ कुछ युवाओं ने आंदोलन शुरू किया था।
राजस्थान में कंप्यूटर ऑपरेटरों को संविदा पर करने के खिलाफ कुछ युवाओं ने आंदोलन शुरू किया था।

राजस्थान में कंप्यूटर ऑपरेटरों को संविदा पर करने के खिलाफ कुछ युवाओं ने आंदोलन शुरू किया। करीब 150 लोग 22 जून, 2021 को नई दिल्ली के ऑल इंडिया कांग्रेस मुख्यालय पर आए। यहां उनकी सुनवाई नहीं हुई। उन्होंने दिल्ली में कुछ दिन रुकने का फैसला लिया। रुकने का ठिकाना नहीं था। इसलिए गाजीपुर बॉर्डर पहुंच गए। यहां किसानों का धरना चल रहा था। युवाओं ने राकेश टिकैत को पूरा मामला बताया। टिकैत ने राजस्थान के सभी युवाओं को खाना खिलाया और अपने पास तंबू में ठहराया।

2-4 दिन बाद इन युवाओं ने भी अपना तंबू गाड़ लिया। यहीं से उन्होंने अपना भी मूवमेंट चलाया। पिछले दिनों वे लखनऊ में कांग्रेस के प्रदेश मुख्यालय पर गए। प्रियंका गांधी से मुलाकात की। प्रियंका के आश्वासन के बाद कंप्यूटर ऑपरेटर संविदा से नियमित कर दिए गए। अब जब गाजीपुर बॉर्डर पर किसान आंदोलन खत्म हुआ, तो राजस्थान के इन युवाओं ने भी विदाई ली।

चलती-फिरती झोपड़ियां बुलंदशहर लाई जाएंगी

भाकियू के मेरठ मंडल अध्यक्ष गुड्डू प्रधान और NCR अध्यक्ष मांगेराम त्यागी ने कई लाख रुपए का चंदा इकट्ठा करके दो चलती-फिरती झोपड़ी बनवाई थीं।
भाकियू के मेरठ मंडल अध्यक्ष गुड्डू प्रधान और NCR अध्यक्ष मांगेराम त्यागी ने कई लाख रुपए का चंदा इकट्ठा करके दो चलती-फिरती झोपड़ी बनवाई थीं।

भारतीय किसान यूनियन के मेरठ मंडल अध्यक्ष गुड्डू प्रधान और NCR अध्यक्ष मांगेराम त्यागी ने कई लाख रुपए का चंदा इकट्ठा करके दो चलती-फिरती झोपड़ी बनवाई थीं। इन्हें ट्रॉली के ऊपर रखकर बनाया गया था। इसमें टीन की शेड और दीवारें थीं। अंदर डबल बेड, गद्दे, सोफे और एयर कंडीशन जैसी सुविधाएं थी।

दोनों ट्रॉलियां एक साल से गाजीपुर बॉर्डर पर खड़ी थी, जिसमें तमाम किसान सोते थे। अब ये ट्रॉलियां बुलंदशहर जिले में लाई जा रही हैं। इन्हें एक उचित स्थान पर खड़ा किया जाएगा। ये ट्रॉलियां सभी को किसान आंदोलन की याद दिलाती रहेंगी।