गाजीपुर के लाल ने उड़ाए थे 7 पाकिस्तानी पैटर्न टैंक:परमवीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद ने शहीद होकर आने वाली पीढ़ियों के लिए लिख दी देशभक्ति

गाजीपुर2 दिन पहले

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।” 1 जुलाई 1933 को गाजीपुर के धामूपुर गांव में एक मामूली परिवार में जन्म लेने वाले परमवीर चक्र विजेता वीर अब्दुल हमीद ने भी अपने शौर्य और पराक्रम के दम पर ऐसा मुकाम हासिल किया। जिले के इस लाल को याद कर देश के तमाम लोग गर्व का अनुभव करते हैं। देश की सरहद की सुरक्षा में तैनात गाजीपुर के इस लाल ने सन 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान न सिर्फ दुश्मन देश के 7 पैटर्न टैंकों के परखच्चे उड़ा कर पाक सेना के दांत खट्टे कर दिये, बल्कि वतन की रक्षा करते हुये अपनी जान की कुर्बानी देकर देश के वीर सैनिकों की सूची में अपना और जिले का नाम स्वर्णाक्षरों मे अंकित करा दिया।

देश के सर्वोच्च सैनिक सम्मान परमवीर चक्र से नवाजे गये गाजीपुर के इस लाल की शहादत देशवासियों के लिए लगातार प्रेरणा स्त्रोत बनी रहेगी। 27 दिसम्बर 1954 को गाजीपुर के जखनियां तहसील के धामूपुर गांव में मो. उस्मान और सकीना बेगम के बेटे के रूप में जन्म लेने वाले वीर अब्दुल हमीद ने देशभक्ति के जज्बे के चलते भारतीय सेना में सैनिक के रूप मे देश सेवा शुरू की। भारतीय थल सेना में तैनात अब्दुल हमीद जब 33 वर्ष के थे, तो नियति ने उनके जीवन मे देश भक्ति के असली इम्तहान का वक्त मुकर्रर किया।

अेकले ही युद्ध में पहुंच गए थे अब्दुल हमीद

वर्ष 1965 के भारत-पाक जंग के दौरान दुश्मन देश की फौज ने अभेद पैटर्न टैंको के साथ 10 सितम्बर को पंजाब प्रांत के खेमकरन सेक्टर में हमला बोला। देश की रक्षा का संकल्प लिए भारतीय थलसेना की चौथी बटालियन की ग्रेनेडियर यूनिट में तैनात कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद अपनी जीप मे सवार दुश्मन फौज को रोकने के लिए आगे बढ़े। इसे शौर्य और पराक्रम का चरम ही कहा जायेगा कि गाजीपुर के इस लाल ने अकेले ही अभेद पैटर्न टैंकों का ग्रेनेड के जरिये सामना करना शुरू कर दिया। दुश्मन फौज हैरत में पड़ गई और भीषण गोलाबारी के बीच पलक झपकते ही अब्दुल हमीद के अचूक निशाने ने पाक सेना के पहले पैटर्न टैंक के परखच्चे उड़ा दिये।

दुश्मन फौज में मच गई थी खलबली

दिल में देश की रक्षा का जज्बा और दुश्मनों को नेस्तानाबूद कर देने के फौलादी इरादों के साथ मोर्चा संभाले अब्दुल हमीद ने पाक फौज की अग्रिम पंक्ति के सात पैटर्न टैंकों को चंद मिनटों मे ही धराशायी कर डाला। देश के वीर सपूत के इस शौर्य और पराक्रम को देख दुश्मन फौज में खलबली मच गयी। चारों ओर से इस बहादुर नौजवान को घेरा जाने लगा। पाक फौज के पैटर्न टैंकों से निकला एक गोला इस अदम्य साहसी भारतीय सैनिक की जीप पर आ गिरा।

शहीद होने के बाद मिला परमवीर चक्र सम्मान

देश की सरहद की रक्षा करते हुये गाजीपुर का लाल शहीद हो गया और आने वाली पीढ़ियों के लिए देशभक्ति, साहस और वीरता की नई परिभाषा लिख गया। शौर्य और साहस के दम पर अमर हो चुके इस लाल की शहादत के एक हफ्ते बाद 16 सितम्बर 1965 को भारत सरकार ने मृत्योपरांत देश का सर्वोच्च सैनिक सम्मान परमवीर चक्र देने की घोषणा की। देश जंग में पाक को बुरी तरह पराजित कर चुका था। दुश्मनों को वीर भारतीय सैनिकों के आगे मुंह की खानी पड़ी थी। 26 जनवरी 1966 गणतंत्र दिवस पर तत्कालीन राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने वीर अब्दुल हमीद की बेवा पत्नी रसूलन बीबी को परमवीर चक्र प्रदान किया।

अब्दुल हमीद के नाम डाक टिकट भी जारी

पूरे देश की ओर से वीर अब्दुल हमीद को सलाम किया गया। शहादत को वर्षों गुजर जाने पर भी वीर अब्दुल हमीद की वीरता के चर्चे भारतीय सेना में ही नहीं देश के तमाम लोगों की जुबान पर आज भी आम हैं। गाजीपुर के लोगों को अपने इस बेटे पर हमेशा नाज रहेगा। देश भी अपने इस लाल को याद कर गर्व महसूस करता है। विख्यात फिल्मकार चेतन आनंद द्वारा बनाये गये टीवी सीरियल परमवीर चक्र विजेता मे मशहूर कलाकार नसीरुद्दीन शाह ने अब्दुल हमीद की भूमिका निभाई। जबकि आर्मी पोस्टल सर्विस की ओर से वीर अब्दुल हमीद की स्मृति मे 10 सितम्बर 1979 और 28 जनवरी 2000 को डाक टिकट जारी किये गये।

गंगा नदी पर हमीद सेतु

गाजीपुर के इस वीर सपूत को भारतीय सेना ने खेमकरन सेक्टर के तरन तारन साहिब के पास दफना कर स्मारक बनाया, जो आज भी भारतीय सैनिकों के लिए प्रेरणा स्रोत बना हुआ है। उनकी याद में गाजीपुर मे गंगा नदी पर हमीद सेतु बनाया गया और उनके पैतृक गांव मे भी स्मारक का निर्माण किया गया है। जहां हर साल 10 सितम्बर को पहुंच कर लोग नम आंखों के साथ गाजीपुर के इस लाल को याद करते हैं और गर्व महसूस करते हैं।

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