अब गोरखपुर चिड़ियाघर में ब्रीडिंग कर रहीं टिटहरी:रामगढ़ताल झील छोड़ पक्षियों ने बदला ठिकाना, प्राणी उद्यान बना ​सुरक्षित आशियाना

गोरखपुर7 महीने पहले
अब गोरखपुर चिड़ियाघर में अण्डे से रही टिटहरी।

गोरखपुर के रामगढ़ताल झील को छोड़ अब पक्षियों ने शहीद अशफाक उल्ला खॉ प्राणी उद्यान परिसर को अपना सुरक्षित ठिकाना बनाना शुरू कर दिया है। चिड़ियाघर स्थित वन्यजीव अस्पताल के पास ग्रीन बेल्ट में अब टिटहरियों ने ब्रीडिंग शुरू कर दी है। रामगढ़ताल में बढ़ती आबादी और शोरगुल के बाद अब पक्षियां अब चिड़ियाघर में अण्डे देकर से रही है।

सोमवार को चिड़ियाघर के फोटोग्रॉफर कुछ तस्वीरे कैद करते हुए उधर बढ़ें तो वह पक्षी उड़ गई, लेकिन अपने पीछे वह एक नवजात पक्षी और दो अण्डे छोड़ गई है। यह देख फोटोग्रॉफर भी दूर हो गए। प्राणी उद्यान के वाइल्ड लाइफ विशेषज्ञ डॉ योगेश प्रताप सिंह का कहना है कि समझ नहीं आ रहा कि इसे कैसे सरक्षित किया जाए? फिलहाल उन्होंने अपने स्टॉफ को हिदायत दी है कि वे उस एरिया में सावधानी बरतें।

रामगढ़ झील के पास टिटहरी काफी बड़ी संख्या में दिखती थी, लेकिन अब अपने सुरक्षित ठिकानों के लिए संघर्ष करती दिख रही है।
रामगढ़ झील के पास टिटहरी काफी बड़ी संख्या में दिखती थी, लेकिन अब अपने सुरक्षित ठिकानों के लिए संघर्ष करती दिख रही है।

शोरगुल बढ़ा तो बदल लिया ठिकाना
दरअसल, रामगढ़ झील के पास टिटहरी काफी बड़ी संख्या में दिखती थी, लेकिन अब अपने सुरक्षित ठिकानों के लिए संघर्ष करती दिख रही है। ऐसे में शहीद अशफाक उल्ला खॉ प्राणी उद्यान का परिसर उसके लिए काफी सुरक्षित साबित हो रहा है। रामगढ़ झील में बढ़ता जलीय प्रदूषण, मलबा, मानवीय हस्तक्षेप और बढ़ता शोर इन्हें नुकसान पहुंचा रहा है।

पानी के पास रहती हैं टिटहरी
वाइल्ड लाइफ विशेषज्ञ डॉ आरके सिंह कहते हैं कि टिटहरी पानी के स्त्रोत के पास रहती है। अण्डों और बच्चों को बचाने के लिए उंचे स्थान पर अंडे देती है। यहां तक की रेलवे लाइन के पत्थरों पर भी अण्डे देती है लेकिन मानव हस्तक्षेप नहीं चाहिए। जब ट्रेन आती है तो उड़ जाती है, फिर आ जाती है। अंडों बच्चों को बचाने के लिए शिकारी या इंसान के सिर पर चोंच मारती है, बिल्कुल नहीं डरती है।

रामगढ़ताल में बढ़ती आबादी और शोरगुल के बाद अब पक्षियां अब चिड़ियाघर में अण्डे देकर से रही है।
रामगढ़ताल में बढ़ती आबादी और शोरगुल के बाद अब पक्षियां अब चिड़ियाघर में अण्डे देकर से रही है।

भारत में चार प्रजातियां, यलो लैपविंग लुप्त प्राय
हेरिटेज फाउंडेशन के ट्रस्टी वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर अनिल कुमार तिवारी बताते हैं कि टिटहरी का अंग्रेजी नाम लैपविंग और वैज्ञानिक नाम रेड वॉटल्ड लैपविंग है। इनकी चार प्रजातियों में सलेटी टिटहरी लुप्तप्राय हैं। जिसे अंतरराष्ट्रीय यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर एवं नेचुरल रिर्सोसेस (आईयूसीएन) ने वर्ष 2006 में जारी रेड बुक में सलेटी टिटहरी को लुप्त श्रेणी में रखा है।

काफी कम दिखती हैं यलो लैपविंग
यलो लैपविंग भी काफी कम दिखती है। रिवर लैपविंग और लैपविंग सहज दिखती हैं। ये बगुले से मिलती जुलती दिखती हैं। गर्दन बगुले सी छोटी होती है। सिर और गर्दन के ऊपर की तरफ और गले के नीचे का रंग काला होता है।

इसके पंखों का रंग चमकीला कत्थई होता है। सिर से गर्दन के दोनों ओर सफेद रंग की एक चौड़ी पट्टी होती है। दोनों आंखों के पास एक गूदेदार रचना पाई जाती है। यह मनमौजी पक्षी खुले स्थान पर कीड़े-मकोड़े खाना पसंद करता है।

टिटहरी मार्च से अगस्त के बीच 02 से 04 तक अंडे देती है। अंडों से 28 से 30 दिन में बच्चे निकल आते हैं।
टिटहरी मार्च से अगस्त के बीच 02 से 04 तक अंडे देती है। अंडों से 28 से 30 दिन में बच्चे निकल आते हैं।

मार्च से अगस्त तक प्रजनन का समय
वाइल्ड लाइफ विशेषज्ञ डॉ आरके सिंह कहते हैं कि टिटहरी मार्च से अगस्त के बीच 02 से 04 तक अंडे देती है। अंडों से 28 से 30 दिन में बच्चे निकल आते हैं। टिटहरी के अंडों का रंग मटमैला होने से दूसरों की नजर कम पड़ती है। इसके बच्चों का रंग भी धरती के रंग जैसा ही होता है।

नर और मादा दोनों मिल बच्चों को पालते हैं। इसकी लंबाई 11 से 13 इंच तक होती है। इनके शरीर का भार 128 से 330 ग्राम तक होता है। बेहद सजग टिटहरी हल्की से आहट या किसी जानवर को देखकर शोर मचाने लगती है।