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16 जून से 'बुद्धम शरणम गच्छामि':कुशीनगर में फिर से बौद्ध महापरिनिर्वाण स्थली का पर्यटक कर सकेंगे दीदार, पर्यटन से जुड़े लोगों में व्यापार बढ़ने की जगी उम्मीद

कुशीनगर3 महीने पहले
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भगवान बुद्ध के मंदिर का स्थापत्य अजंता की गुफाओं से प्रेरित है। - Dainik Bhaskar
भगवान बुद्ध के मंदिर का स्थापत्य अजंता की गुफाओं से प्रेरित है।

कुशीनगर में बौद्ध महापरिनिर्वाण स्थली 16 जून से आम लोगों के लिए खोल दिया जाएगा। कोरोना की दूसरी लहर आने के बाद 15 जून तक के लिए इसे बंद किया गया था। पर्यटन स्थल के खुलने की जानकारी मिलने के बाद से यहां के लोग काफी खुश हैं। वहीं पर्यटन से जुड़े लोगों में व्यापार बढ़ने उम्मीद जगी है।

फिर से लौटेगी कुशीनगर की रौनक
पुरातत्विक एतिहासिक धरोहर बुद्ध महापरिनिर्वाण स्थली अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थलों में शुमार है। पर्यटन से जुड़े लोगों का कहना है कि कोरोना की दूसरी लहर के बाद कुशीनगर की रौनक गुम हो गई थी। लेकिन अब दोबारा से इसके खुलने से रौनक पुनः लौट आएगी। पर्यटकों और श्रद्धालुओं को कुशीनगर स्थित मंदिरों के दर्शन हो सकेंगे और पर्यटन से जुड़े कारोबार तथा कारोबारियों को काफी लाभ होगा।

बुद्ध महापरिनिर्वाण स्थली अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थलों में शुमार है।
बुद्ध महापरिनिर्वाण स्थली अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थलों में शुमार है।

सभी धरोहरों को 15 जून तक बंद करने का था आदेश
देश में करोना के दूसरी लहर के चलते सभी धरोहरों को 15 जून तक बंद करने के आदेश पारित हुए थे। जिसके बाद महापरिनिर्वाण मंदिर, माथा कुंवर और रामाधार स्तूप के प्रवेश द्वारों पर ताले लटका दिए गए थे। जिसके चलते दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक मायूस होकर लौट रहे थे।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने आदेशों को नहीं बढ़ाया आगे
कोरोना संक्रमण के नियंत्रण में आने के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने अपने आदेशों को आगे नहीं बढ़ाया है। जिससे 16 जून को इन मंदिरों को खुलने की उम्मीद बढ़ गई है। अनुविभाग के अधिकारी / निदेशक धरोहर डॉक्टर एनके पाठक ने दिया है। इस संबंध में स्थानीय पुरातत्व संरक्षण अधिकारी शादाब खान ने बताया कि आदेश तो है जहां तक उम्मीद है कि 16 जून तक महापरिनिर्वाण स्थली खुल जाएगी।

महापरिनिर्वाण मंदिर

बौद्ध धर्म में इस मंदिर का विशेष महत्व है। यहीं भगवान बुद्ध ने अपने प्राण त्याग किए थे। इसलिए इसको मुख्य मंदिर भी कहा जाता है। इस मंदिर में भगवान बुद्ध की 21.6 फिट लम्बी लेटी हुई प्रतिमा स्थापित है। जो कि सेठ हरिबल ने कलाकार दिन से बनवाई थी। यह प्रतिमा मथुरा शैली की है। यह 1876 में खुदाई से प्राप्त हुई है। इस लेटी प्रतिमा की सबसे ख़ास बात यह है कि यह तीन मुद्राओं में दिखाई देती है।

पैर की तरफ से देखने पर शान्ति चित्त मुद्रा (महापरिनिर्वाण मुद्रा), बीच से देखने पर चिंतन मुद्रा और सामने से चेहरा देखने पर मुस्कुराते हुई मुद्रा दिखाई देती है। अभिलेख के अनुसार कह सकते हैं कि इस प्रतिमा का संबंध पांचवीं शताब्दी से है। ऐसा भी कहा जाता है कि हरीबाला नामक बौद्ध भिक्षु गुप्त काल के दौरान यह प्रतिमा मथुरा से कुशीनगर लाई गई थी।

हरीबाला नामक बौद्ध भिक्षु गुप्त काल के दौरान यह प्रतिमा मथुरा से कुशीनगर लाई गई थी।
हरीबाला नामक बौद्ध भिक्षु गुप्त काल के दौरान यह प्रतिमा मथुरा से कुशीनगर लाई गई थी।

बुद्ध पूर्णिमा पर होता है विशेष उत्सव
बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली कुशीनगर में स्थित इस महापरिनिर्वाण विहार पर एक माह का मेला लगता है। यह तीर्थ गौतम बुद्ध से संबंधित है, लेकिन आस-पास के क्षेत्र में हिंदू धर्म के लोगों की संख्या ज्यादा है और यहां के विहारों में पूजा-अर्चना करने वे बड़ी श्रद्धा के साथ आते हैं। इस विहार का महत्व बुद्ध के महापरिनिर्वाण से जुड़ा होने के कारण काफी ज्या्दा है।

मंदिर का स्थापत्य अजंता की गुफाओं से प्रेरित है। यह विहार उसी स्थान पर बनाया गया है, जहां से यह मूर्ति निकाली गयी थी। विहार के पूर्व हिस्से में एक स्तूप है। यहां पर भगवान बुद्ध का अंतिम संस्कार किया गया था। यह मूर्ति भी अजंता में बनी भगवान बुद्ध की महापरिनिर्वाण मूर्ति की प्रतिकृति है।

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