यूपी की जेलों का यह कैसा मैनुअल?; बाहर बालिग-अंदर नाबालिग:18 से 21 साल वालों को जेल प्रशासन मानता जुवेनाइल, आसनी से जमानत पर छूट बन जाते हार्ड कोर ​क्रिमिनल

8 महीने पहले
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मंडलीय कारागार में बंद 100 से अधिक बंदियों को कम उम्र की वजह से जेल प्रशासन जुवेनाइल की श्रेणी में मानता है। - Dainik Bhaskar
मंडलीय कारागार में बंद 100 से अधिक बंदियों को कम उम्र की वजह से जेल प्रशासन जुवेनाइल की श्रेणी में मानता है।

यूपी बदल गया, लेकिन अगर कुछ नहीं बदला तो वह है यूपी की जेलों का मैनुअल। यही वजह है कि पुराने जेल मैनुअल की खामियों का फायदा उठाकर गोरखपुर सहित पूरी यूपी के जेलों में बंद कई हार्ड कोर क्रिमिनल अभी भी इसका फायदा उठा रहे हैं। जेल मैनुअल की आड़ में ऐसे बदमाश आसानी से जमानत पर छूटकर चंद दिनों में बड़े अपराधी बन जा रहे हैं। हैरानी वाली बात यह है कि इन्हें मासूम मानते हुए जेल प्रशासन इन बंदियों के सुधार जाने की उम्मीद लगाए बैठा है। जिसकी वजह से ऐसे बंदियों को न कि सिर्फ जेल की अलग बैरकों में रखा जाता है, बल्कि उनसे किसी तरह का कोई श्रम भी नहीं कराया जाता।

जेल में बंद हैं 100 से अधिक 18 से 21 वर्ष वाले कैदी
दरअसल, मंडलीय कारागार में बंद 100 से अधिक बंदियों को कम उम्र की वजह से जेल प्रशासन जुवेनाइल की श्रेणी में मानता है। जिसकी वजह से उन्हें जेल में अलग बैरक में रखा जाता है। इन बंदियों को भी बकायदा नाबालिगों के जैसे बाल सुधार गृह वाली सुविधा दी जा रही है। उधर, इनकी गिरफ्तारी के वक्त रिकॉर्ड में इनकी उम्र 18 से 21 वर्ष होने की वजह से पुलिस इन्हें बालिग मानते हुए जेल तो भेज देती, लेकिन जेल प्रशासन इन्हें नाबालिग मानते हुए इनके साथ जुवेनाइल यानि अल्पवयस्क की तरह व्यवहार करता है।

1988 में ही 18 वर्ष की गई थी बालिग होने की उम्र
दरअसल, पहले बालिग होने की उम्र 21 वर्ष थी। हालांकि 20 दिसंबर 1988 को कानून में संशोधन कर बालिग होने की उम्र 18 वर्ष कर दी गई। तभी से देश की सभी योजनाओं व अन्य सुविधाओं में 18 साल को ही बालिग माना जाता है। पुलिस भी 18 की उम्र वाले बदमाशों को बालिग मानती है और उन्हें अन्य बंदियों की तरह जेल ही भेजती है। जबकि 18 वर्ष से कम उम्र वाले आरोपितों को बाल सुधार गृह भेजा जाता है। बावजूद इसके जेल के नियम कायदे आज भी पुराने ही ढर्रे पर चल रहे हैं। जिसका यह हार्ड कोर क्रिमिनल जमकर फायदा उठा रहे हैं। बड़ी बात यह है कि तब से आज तक जेल मैनुअल में इस नियम में बदलाव करने की न तो कोई पहल हुई और ना ही किसी ने ध्यान दिया।

जेल मैनुअल में हो चुके हैं कई बदलाव
हालांकि, ऐसा नहीं है कि जेल मैनुअल समय के हिसाब से बदला नहीं जा सकता। कई बार जेल मैनुअल में आज के हिसाब से नियमों में बदलाव किया भी जा चुका है। बंदियों के श्रम के बदले दिए जाने वाले पारिश्रमिक में तीन- तीन बार बदलाव कर उसे बढ़ाया जा चुका है। वहीं, अभी पिछले महीने ही जेल मैनुअल में बदलाव कर जेल में मोबाइल, इलेक्ट्रानिक डिवाइस आदि उपकरण के उपयोग करने पर इसे गैर जमानतीय व संज्ञेय अपराध की श्रेणी में लाया गया है।

जेल अधिनियम 1984 की धारा 42 और 43 के तहत 5 वर्ष के कारावास, 50 हजार जुर्माना व मुकदमा दर्ज कराने का प्रावधान किया गया है। क्योंकि पहले इस मामले में केवल जुर्माने की सजा थी। जेल में इन उपकरणों के लगातार हो रहे उपयोग पर लगाम लगाने के लिए जब यह बदलाव हो सकता है तो अब सवाल यह उठता है कि 18 से 21 वर्ष के बंदियों को जुवेनाइल क्यों माना जाता है?

सुधारने की उम्मीद करता है जेल प्रशासन
वहीं, जेल प्रशासन का मानना है कि 18 से 21 वर्ष के बंदियों में जेल मैनुअल के हिसाब से माना जाता है कि इनमें सुधार हो सकता है और ये अपराध की राह छोड़ सकते हैं। लेकिन जेल मैनुअल की इस दरियादिली का ये हार्ड कोर क्रिमिनल लाभ उठा रहे हैं। इनमें सुधार तो नहीं हो रहा बल्कि मौज काटने के बाद जब ये जमानत पर छूट कर बाहर आ रहे हैं तो बड़े अपराधी बन रहे हैं।

बड़े- बड़े मामलों के हैं आरोपी
जुवेनाइल की तरह ट्रीट होने वाले ये बंदी हार्ड कोर क्रिमिनल हैं। इनमें कई बंदी लूट, हत्या, हत्या के प्रयास, दुष्कर्म आदि के आरोप में हैं। इनमें गुलरिहा पुलिस द्वारा 8 दिसंबर 2021 को जेल भेजा गया दुष्कर्म व पाक्सो एक्ट का आरोपित 21 वर्षीय श्यामु निषाद, गुलरिहा पुलिस द्वारा 5 दिसंबर 2021 को जेल भेजा गया धोखाधड़ी कर दूसरी शादी रचाने का आरोपित 21 वर्षीय बबलू जायसवाल शामिल हैं।

ऐसे ही मिथुन बना बड़ा अपराधी
इसी नियम का लाभ उठाकर मिथुन पासवान बड़ा अपराधी बन गया। चौरीचौरा का मिथुन पासवान जब पहली बार छिनैती के आरोप में जेल गया था तो उसकी भी उम्र 20 वर्ष थी। लेकिन जेल से छूटने के बाद वह गैंग बनाकर लूट आदि की घटनाओं को अंजाम देने लगा। कई बार जेल गया, पुलिस पर फायरिंग भी किया। पुलिस ने उस पर इनाम भी रखा और मुठभेड़ में पैर में गोली भी मारी। इसी तरह कुछ माह पहले सिंघड़िया से लेकर मोहद्दीपुर तक दिनदहाड़े फायरिंग कर दहशत फैलाने वालों की उम्र भी 18 से 21 वर्ष के बीच थी। जेल से निकलने के बाद उनकी आदतों में कोई बदलाव नहीं आया।

क्या बोले जेलर?
जेलर प्रेमसागर शुक्ला ने बताया कि जेल मैनुअल के अनुसार 18 से 21 वर्ष के बंदियों को अल्पवयस्क श्रेणी में रखा जाता है। सुधार की गुंजाइश को देखते हुए उन्हें अलग बैरक में अन्य बंदियों से अलग रखा जाता है।

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