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हाथरस में शुरू हुआ 110वां लक्खी मेला:हिंदू-मुस्लिम सद्भावना का प्रतीक है यह मेला, काले खां की मजार पर चादर चढ़ाकर होती है मेले की शुरुआत

हाथरस9 दिन पहले
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श्री दाऊजी महाराज का 108वां लक्ख - Dainik Bhaskar
श्री दाऊजी महाराज का 108वां लक्ख

हाथरस यानि ब्रज की देहरी पर भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई दाऊबाबा का जन्मोत्सव आज छठ के रूप में मनाया जा रहा है। जिलाधिकारी रमेश रंजन व अन्य अधिकारियों के साथ शहर के अन्य लोगों ने कोविड-19 को देखते हुए इस बार मेला श्री दाऊजी महाराज का आयोजन सांकेतिक रूप से पूजा-अर्चना के साथ किया। मंदिर को रंग-बिरंगी झालरों से सजाया गया है। मंदिर में आज सुबह पूजा-अर्चना के साथ दाऊ बाबा और रेवती मैया का अभिषेक हुआ। सोशल डिस्टेसिंग का पालन करते हुए भक्त भगवान के दर्शन कर सकेंगे। इस साल 110वां लक्खी मेला कोविड की वजह से सांकेतिक रूप से लगाया जा रहा है। यह मेला हिंदू मुस्लिम संद्भावना का प्रतीक भी है। मेले की शुरुआत परिसर में स्थित बाबा काले खां की मजार से होती है। दाऊजी के मंदिर पर ध्वजा के साथ पहले काले खां की मजार पर चादर चढ़ाई जाती है।

दाऊजी मेले का इतिहास

जानकारों का कहना है कि अब से 110 वर्ष पूर्व हाथरस के तहसीलदार श्यामलाल हुआ करते थे। बताते हैं कि श्यामलाल के बेटे की तबीयत काफी खराब थी और वह मृत्यु के निकट था। मान्यता है कि तब तहसीलदार को सपने में दाऊजी महाराज का आदेश हुआ कि मंदिर को खुलवाकर सेवा शुरू कराओ। तहसीलदार ने मंदिर खुलवाकर सेवा-पूजा शुरू कराई तो मृत्यु शैया पर पड़ा बेटा ठीक हो गया। इस पर तहसीलदार ने पहली बार मेला आयोजित कराया था, तभी से यहां हर साल ये मेला लगता है, लेकिन दो वर्ष से कोविड के कारण केवल सांकेतिक रूप से मेले का आयोजन पूजा-अर्चना के साथ दर्शन के लिए ही हो रहा है।

श्री दाऊजी महाराज मंदिर।
श्री दाऊजी महाराज मंदिर।

हाथरस किला और मंदिर का इतिहास

हाथरस रियासत के राजा दयाराम थे, जिनके किले में सैकड़ों वर्ष पुराना श्री दाऊजी महाराज का मंदिर है। अंग्रेजी हुकूमत के आगे न झुकने की गवाही किले पर बने दाऊजी मंदिर की प्राचीर आज भी देता है। अंग्रेजों ने मंदिर पर तोप के गोले दागे। बताते हैं कि भगवान की कृपा से गोलों से मंदिर को कोई क्षति नहीं पहुंची। आज भी मंदिर में गोला रखा है। श्री दाऊजी महाराज के मंदिर में श्रीकृष्ण के नाम से श्री दाऊजी महाराज का विग्रह विराजमान है।

सद्भावना का प्रतीक है दाऊजी महाराज का मेला

हाथरस के किला क्षेत्र में लगने वाला मेला श्री दाउजी महाराज आज भी सदभाव का प्रतीक है। इस मेला परिसर में एक छोर पर दाऊजी महाराज का मंदिर है तो दूसरी ओर काले खां की मजार है, जहां सभी धर्मों के लोग मंदिर के दर्शन भी करते हैं तो मजार पर मत्था भी जरूर टेकते हैं। 110 साल से ये मेला लगाया जा रहा है। बृज क्षेत्र में लगने वाले मेलों में हाथरस के देवछट मेले का भी अलग महत्त्व है। इस मेले के जरिये आमजन में सांप्रदायिक सद्भावना पैदा होती है।

श्री दाऊजी महाराज मंदिर में आरती करते पुजारी।
श्री दाऊजी महाराज मंदिर में आरती करते पुजारी।

बाबा काले खां की मजार से होती है मेले की शुरुआत

प्रतिवर्ष लगने वाले इस मेले की शुरुआत परिसर में स्थित बाबा काले खां की मजार से ही होती है। दाऊजी के मंदिर पर ध्वजा के साथ पहले काले खां की मजार पर चादर चढ़ाई जाती है। मजार पर चादर चढ़ाने के बाद ही मेले का विधिवत उद्घाटन होता है। कहा जाता है कि काले खां और दाऊजी महाराज के बीच मित्रता का भाव था। इस मेले को देखने के लिए दूर-दराज से लोग आते हैं। इस मेले में विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ-साथ दंगल का भी आयोजन होता है। मेले में हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही दाऊजी के मंदिर जाते हैं और खरीददारी भी करते हैं।

कोविड के कारण 2 साल से नहीं लग रहा मेला

देश और दुनिया मे फैली कोरोना महामारी के चलते 2 साल से दाऊजी महाराज का मेला भव्य रूप से नहीं लग रहा है। इससे पहले 108 साल तक यह मेला भव्य रूप से करीब 20 से 25 दिन तक लगता था, लेकिन दो साल से केवल सांकेतिक रूप से मेले का आयोजन किया जा रहा है।

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