जालौन में लहलहा रही महाराष्ट्र के केले की फसल:1 हेक्टेयर जमीन पर शुरू की गई खेती 2 गांवों तक पहुंची, 1 लाख की लागत में 7 लाख तक मुनाफे की उम्मीद

जालौन19 दिन पहलेलेखक: अनुज कौशिक
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पिछले डेढ़ दशक से सूखे, बेमौसम बारिश और ओलों की मार झेल रहे बुंदेलखंड के किसानों ने अब नई राह चुन ली है। किसानों ने अपनी परंपरागत खेती को छोड़ कर नई फसल की पैदावार करना शुरू कर दिया है। यह फसल महाराष्ट्र की प्रसिद्ध फसल केले की खेती है। जिसे अब जालौन के किसान भी उगा रहे हैं। किसान इस केले की फसल को ऑर्गेनिक तरीके से उगा रहे हैं।

महाराष्ट्र के जलगांव से आया केले की खेती करने का आइडिया

केले की फसल जालौन में उगाने का आइडिया उरई तहसील के अंतर्गत आने वाले एक छोटे से गांव अकोढ़ी बैरागढ़ के रहने वाले किसान बृजेश त्रिपाठी और उनके पुत्रे अतुल त्रिपाठी को आया था। किसान बृजेश त्रिपाठी ने बताया कि वह महाराष्ट्र के जलगांव गए हुए थे। जहां पर उन्होंने केले की खेती की बागवानी को देखा। वहां से ही केले का पेड़ लाकर उन्होंने भी टिश्यू कल्चर को अपनाते हुए अपने गांव में 6x6 की पद्धति के तहत एक हेक्टेयर से ज्यादा जमीन में G-9 प्रजाति के केले का पेड़ लगाया। पेड़ में गोबर खाद का प्रयोग करते हुए पानी दिया और आज यह पेड़ लगभग डेढ़ साल के हो गए हैं। इनमें फल भी अच्छी मात्रा में आ रहे हैं।

ऑर्गेनिक तरीके से केले की खेती करने वाले बृजेश ने बताया कि जालौन में G-9 प्रजाति की केले की खेती पहली बार की जा रही है।
ऑर्गेनिक तरीके से केले की खेती करने वाले बृजेश ने बताया कि जालौन में G-9 प्रजाति की केले की खेती पहली बार की जा रही है।

पहले भी लगाई गई थी फसल पर सफल नहीं हुए

केले की फसल को किसान बृजेश ने अगस्त 2020 में लगाया था। डेढ़ साल होने पर उसमें अच्छे फल आने शुरू हो गए हैं। ऑर्गेनिक तरीके से केले की खेती करने वाले बृजेश ने बताया कि जालौन में G-9 प्रजाति की केले की खेती पहली बार की जा रही है। इससे पहले कई किसानों ने केले की फसल जरूर लगाई थी, लेकिन वह सफल नहीं हो सकी।

फसल अच्छी हुई तो बढ़ा देंगे उत्पादन

किसान बृजेश त्रिपाठी ने बताया कि वह परंपरागत खेती से काफी नुकसान उठा चुके थे। जिसके बाद उन्होंने केले की फसल को लगाया। यह फसल उन्होंने 1 लाख रुपए की लागत से लगाई है, लेकिन जिस तरह से फसल में फूल आ रहे हैं उम्मीद है कि हमें इसमें 6 से 7 लाख रुपए का फायदा हो जाएगा। उन्होंने बताया कि अभी यह फसल एक हेक्टेयर से ज्यादा में लगाई गई है। धीरे-धीरे इसका उत्पादन बढ़ाएंगे। केले की खेती करने वाले किसान ब्रजेश त्रिपाठी के पुत्र अतुल त्रिपाठी भी अपने पिता का पूरा सहयोग देने में लगे हुए हैं।

सान बृजेश त्रिपाठी ने बताया कि वह महाराष्ट्र के जलगांव गए हुए थे। जहां पर उन्होंने केले की खेती की बागवानी को देखा।
सान बृजेश त्रिपाठी ने बताया कि वह महाराष्ट्र के जलगांव गए हुए थे। जहां पर उन्होंने केले की खेती की बागवानी को देखा।

यूट्यूब पर वीडियो देखकर फसल को कर रहे हैं बेहतर

युवा किसान अतुल ने बताया कि वह लगातार यूट्यूब पर देखते रहते हैं कि किस तरह से फसल की देखरेख करनी चाहिए। वह वैज्ञानिक पद्धति से केले की खेती कर रहे हैं, जिससे वह ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमा सकें। उन्होंने बताया कि वो यूट्यूब पर वीडियो देखकर पौधे की सिंचाई, जमीन की गुड़ाई और फिर उसमें खाद डालने का काम करते हैं। जिससे पेड़ की पकड़ भी मजबूत हो गई है। उन्होंने बताया कि वो लोग कीटाणु से बचाव के लिए दवा का छिड़काव भी करते रहते हैं। जिससे पेड़ों में कीड़ें न लग पाए।

दो गांव के किसानों ने शुरू की केले की खेती

किसान बृजेश त्रिपाठी ने बताया कि हमारी खेती देखने के बाद जालौन के शालावास गांव के रहने वाले लक्ष्मी नारायण चतुर्वेदी और उदनपुर गांव के गुप्ता जी ने भी G-9 प्रजाति के पेड़ लगाने शुरू किए हैं। वो लोग हमारे गांव में केले की खेती देखकर बहुत प्रभावित हुए थे। उन्होंने बताया कि उन लोगों को भी अपनी परंपरागत खेती में बहुत नुकसान हो रहा था। उद्यान विभाग भी हमारी इस पहल में मदद के लिए आगे आ रहा है। उनका कहना है कि किसान अगर इसी तरह से बागवानी की तरफ जाएगा, तो निश्चित ही बुंदेलखंड की धरा एक बार फिर से हरी भरी हो सकती है और किसानों को दोगुना लाभ मिल सकता है।

युवा किसान अतुल ने बताया कि वह लगातार यूट्यूब पर देखते रहते हैं कि किस तरह से फसल की देखरेख करनी चाहिए।
युवा किसान अतुल ने बताया कि वह लगातार यूट्यूब पर देखते रहते हैं कि किस तरह से फसल की देखरेख करनी चाहिए।

पहली बार उगाई जा रही है G-9 केले की फसल

बुंदेलखंड का पंजाब कहे जाने वाले जालौन में पिछले डेढ़ दशक से किसान परेशान थे। मौसम की मार उनकी फसलों और मेहनत पर पानी फेर रही थी। किसान अपनी परंपरागत खेती गेहूं, चना, मटर, मसूर और तिलहन की फसल में काफी नुकसान उठा रहा थे। कर्ज के बोझ के कारण मजबूरन किसानों को आत्महत्या करनी पड़ रही थी। बुंदेलखंड के जालौन में पहली बार केले की खेती की जा रही है।

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