जालौन में शक्तिपीठ मां शारदा का है मंदिर:ग्यारहवी सदी में राजा टोडलमल ने करवाया था निर्माण, पृथ्वीराज और आल्हा-उदल के युद्ध की गवाह हैं देवी

जालौन2 महीने पहले
  • कॉपी लिंक
जालौन में मां शारदा के दर्शन के लिए दूर-दूर से आते हैं लोग। - Dainik Bhaskar
जालौन में मां शारदा के दर्शन के लिए दूर-दूर से आते हैं लोग।

जालौन में शक्तिपीठ शारदा मां का मन्दिर है। नवरात्र के सप्तमी के दिन मां कालरात्रि के स्वरूप की मंदिरों मे पूजा अर्चना की जाती है। यह मन्दिर आखिरी हिंदूराजा पृथ्वीराज और बुंदेलखंड के वीर योद्धा आल्हा-उदल के युद्ध का गवाह है। यह मन्दिर बैरागढ़ नाम के गांव में स्थित है। यहां पूरे देश से लोग दर्शन करने नवरात्रि ही नहीं बल्कि पूरे 12 महीने आते हैं।

जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है मन्दिर
जिला मुख्यालय उरई से लगभग 30 किलो मीटर दूर यह मंदिर ग्राम बैरागढ़ में बना हुआ है। यहां पर ज्ञान की देवी सरस्वती मां शारदा के रूप में विराजमान है। मां शारदा की अष्टभुजी मूर्ति लाल पत्थर से बनी है। इस मन्दिर की स्थापना चंदेलकालीन राजा टोडलमल ने ग्यारहवी सदी में करवाई थी। लोगों को बीच फैली बातों के अनुसार यह मन्दिर आदिकाल में निर्मित कराया गया था। मां शारदा की मूर्ति मन्दिर के पीछे बने एक कुंड से निकली थी। कुंड से मां शारदा प्रकट हुई थी। इसीलिए इस स्थान को सिद्ध पीठ कहा जाता है। वर्तमान में यह मन्दिर खेतों में स्थित है।

दिन में कई रूपों में दिखाई देती है प्रतिमा
मां शारदा शक्ति पीठ के बारे में लोग बताते है कि मूर्ति कई रूपों में दिखाई देती है। सुबह के समय मूर्ति कन्या के रूप में नजर आती है। तो दोपहर के समय युवती के रूप में और शाम के समय मां के रूप में मूर्ति दिखाई देती है। इनके दर्शन के लिए पूरे भारत से श्रद्धालू आते है।

पृथ्वीराज और आल्हा-उदल के युद्ध का गवाह है मंदिर
मां शारदा शक्ति पीठ आखिरी हिन्दू राजा पृथ्वीराज और आल्हा के युद्ध का गवाह है। पृथ्वीराज ने बुंदेलखंड को जीतने के उद्देश्य से ग्यारहवी सदी के बुंदेलखंड के तत्कालीन चंदेल राजा परमर्दिदेव (राजा परमाल) पर चढ़ाई की थी। उस समय चंदेलों की राजधानी महोबा थी। आल्हा-ऊदल राजा परमाल के मंत्री के साथ-साथ वीर योद्धा भी थे। बैरागढ़ के युद्ध मे आल्हा-उदल ने पृथ्वीराज चौहान को युद्ध में बुरी तरह परास्त कर दिया था।

आल्हा को मां शारदा से मिला था अजेय का वरदान
बताया जाता है कि आल्हा और उदल मां शारदा के उपासक थे। जिसमें आल्हा को मां शारदा का वरदान था कि उन्हें युद्ध मे कोई नहीं हरा पाएगा। ऊदल की मौत के बाद आल्हा ने प्रतिशोध लेते हुए अकेले ही पृथ्वीराज से युद्ध किया और विजय प्राप्त की थी। उसके बाद आल्हा ने विजय स्वरूप माता के चरणों में भाला गाढ़ दिया और युद्ध से बैराग ले लिया। वह भाला आज भी मन्दिर के मठ के ऊपर गढ़ा है। यह भाला 30 फिट से भी ज्यादा ऊंचा है और जमीन में भी इतना ही अधिक गढ़ा है। जब आल्हा ने युद्ध से बैराग लिया तभी से यहां का नाम बैरागढ़ हो गया था।

पूरे देश में दो ही स्थान पर माँ शारदा के मन्दिर
देश में यह मन्दिर दो ही स्थान पर है। जिसमें एक जालौन के बैरागढ़ में और दूसरा मध्य प्रदेश के सतना जनपद के मैहर में है। मन्दिर की प्राचीनता और सिद्ध पीठ होने के कारण मां शारदा के दर्शन करने के लिए दूर दराज से श्रद्धालू आते है। मन्दिर के पुजारी श्याम जी महाराज का कहना है कि माता के दर्शन करने प्राचीन समय में आल्हा-ऊदल आते थे। उन्होंने बताया कि लोग अपनी मनोकामनाओं के लिए चैत्र और शारदीय नवरात्रि पर दर्शन करने आते है। यहां विशाल मेला लगता है जो पूरे एक महीने तक चलता है। मन्दिर के पीछे एक कुंड है। इस कुंड में नहाने से सभी प्रकार के चरम रोग खत्म हो जाते है।

खबरें और भी हैं...