जौनपुर…कोविड फ्रंटलाइन वर्कर्स की आपबीती:कोरोना काल में संविदा पर हुई थी नियुक्ति, अब नौकरी भी गई और सैलरी भी नहीं मिली

जौनपुर7 महीने पहले

कोरोना के संकट में कोविड फ्रंटलाइन वर्कर्स में अभूतपूर्व काम को भला कौन भूल सकता है। हेल्थ सेक्टर में कोविड वॉरियर्स ने अपनी जान की परवाह किए बगैर काम किया, लेकिन इन्हीं फ्रंटलाइन वर्कर्स को अब नौकरी से निकाल दिया गया है। इनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जिनको अभी तक सैलरी नहीं मिली है। ऐसे में इनके सामने जीवन यापन को लेकर बड़ा संकट खड़ा हो गया है। कोविड में जान पर खेल कर नौकरी करने वाले ये फ्रंटलाइन वर्कर्स नौकरी से निकाले जाने से हताश हो गए हैं। इनमें से कुछ अब दूसरी नौकरी की तलाश में जुटे हुए हैं।

47 पदों पर नियुक्ति हुई

पंचायती राज अनुभाग 3 के तहत कोविड-19 के समय संविदा के 47 पदों पर नियुक्ति हुई थी। वार्ड आया, स्वीपर, एक्स-रे टेक्नीशियन और वार्ड बॉय के विभिन्न पदों पर 43 लोगों को तैनात किया गया था। 15 दिसंबर 2020 से इन लोगों ने काम करना शुरू कर दिया था। 30 मार्च 2021 को एक पत्र जारी हुआ। पत्र में लिखा था कि 31 मार्च 2021 को स्वतः कार्यमुक्त कर दिया जाएगा। पत्र में इस बात का भी जिक्र है कि शासन के अग्रिम आदेश तक कार्यमुक्त कर दिया गया है। इसके बाद इन लोगों द्वारा कई बार धरना प्रदर्शन किया गया।

कोविड की दूसरी लहर में फिर से काम पर बुलाया

कोविड की दूसरी लहर में जब स्थिति बिगड़ने लगी तो इन लोगों को काम पर पुनः बुलाया गया। 18 अप्रैल 2021 से 31 मई 2021 तक कोविड के विभिन्न हॉस्पिटल में इनको दोबारा तैनात किया गया, लेकिन कोविड का कहर कम होने के बाद दोबारा इन्हें काम से हटा दिया गया। अग्रिम आदेश का हवाला देकर कोविड फ्रंटलाइन वॉरियर्स को काम से हटाया गया। इस दौरान जोखिम में जान डालकर काम करने वाले कुछ कर्मचारियों को वेतन भी नहीं मिला है।

कोरोना काल में डेड बॉडी तक पैक किया

शिवांगी शर्मा की नियुक्ति स्वीपर पद पर हुई थी। कोविड के समय में शिवांगी जौनपुर के सदर अस्पताल में तैनात थीं। शिवांगी बताती हैं कि उनकी तनख्वाह 9,054 रुपए थी। शिवांगी को लगभग ढाई महीने का वेतन भी नहीं मिला है। शिवांगी कहती हैं कि उनके पिता सैलून पर काम करते हैं। ऐसे में परिवार का खर्चा चलाना मुश्किल नजर आ रहा है। कोविड के समय पर जान पर खेलकर उसने अपनी नौकरी की। शिवांगी स्वीपर के पद पर तैनात थीं, लेकिन उससे डेड बॉडी तक पैक कराई जाती थी। वो बताती हैं कि उस वक्त डॉक्टर्स भी ये काम करने से कतराते थे।

जौनपुर से लेकर लखनऊ तक लगा चुके हैं गुहार

सुजीत की नियुक्ति एक्सरे टेक्नीशियन के पद पर हुई थी। उनका वेतन मान 15 हजार रुपए था। वो बताते हैं कि काम से निकाले जाने के बाद वो बेरोजगार हो गए हैं। वो जौनपुर से लेकर लखनऊ तक गुहार लगा चुके हैं, लेकिन कोई भी नतीजा नहीं निकल रहा है। वो चाहते हैं कि उन्हें नौकरी पर दोबारा रख लिया जाए। किसी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर उन्हें रख लिया जाए।

नौकरी जाने से परेशान हैं प्रीति पाल

सुजीत की तरह की प्रीति पाल भी संविदा पर नौकरी कर रही थीं। कोविड के समय वो भी अस्पताल में तैनात थीं, लेकिन नौकरी से निकाले जाने के बाद वो अब परेशान हो गई हैं। पिता किसान हैं तो मां किराना की दुकान चलाती हैं। प्रीति बीएससी की छात्रा हैं। किसी तरह से वो पैसे इकट्ठा कर के अपनी पढ़ाई कर रही हैं। संविदा पर काम करने वाले सौरभ नौकरी के दौरान बेहोश हो गए थे। सौरभ की नियुक्ति भी एक्सरे टेक्नीशियन पद पर हुई थी।

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