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  • The Daughter Studying In The 8th Standard Took Up The Responsibility Of Teaching Her Mother, While Saroj, Who Studied Till The Third Grade, Gave A Tune To The Bhagavad Gita.

जौनपुर...अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस पर पेश की मिशाल:8वीं कक्षा में पढ़ने वाली बेटी ने अपनी मां को पढ़ाने का उठाया जिम्मा, वहीं तीसरी कक्षा तक पढ़े सरोज ने भगवत गीता को दी धुन

जौनपुरएक महीने पहले
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मां को पढ़ाती रेशमा। - Dainik Bhaskar
मां को पढ़ाती रेशमा।

अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस के मौके पर जौनपुर की रेशम यादव और मूलचंद हरिभजन सरोज ने एक मिशाल पेश की है। रेशम की मां पढ़ी लिखी नहीं होने के कारण को हर कागजात पर अंगूठा लगाती थी, जिसे देखकर रेशम को बहुत दुख होता था। ये सब देखने के बाद रेशम ने अपनी मां को पढ़ाने का फैसला लिया। बेटी की यह मेहनत धीरे धीरे रंग लाने लगी। अब रेशम की मां किसी भी दस्तावेज पर अंगूठा नहीं लगाती हैं बल्कि हस्ताक्षर करती हैं। वहीं सिर्फ तीसरी कक्षा तक पढ़े मूलचंद हरिभजन सरोज ने अपने कठिन प्रयास से भागवत गीता को रामचरितमानस की तरह संगीतमय लिपिबद्ध कर दिया।

मां का अंगूठा लगाना नहीं था पसंद

जौनपुर की रेशम यादव प्राथमिक विद्यालय की कक्षा 8 में पढ़ती हैं। रेशम अपनी मां मंजू यादव के साथ रहती हैं। रेशम के पिता बाहर काम कर के परिवार का भरण पोषण करते हैं। रेशम की मां पढ़ी लिखी नहीं हैं। जब भी वह अपनी बेटी के साथ बैंक जाती थी, तो कागजात पर अंगूठा लगाती थी। उनकी बेटी को मां का अंगूठा लगाना अखरता था। मां को अंगूठा लगाता देख बेटी ने उनसे पढ़ने लिखने की जिद की। शुरुआत में मां ने घर के कामों का हवाला देकर बेटी की बात को टाल दिया, लेकिन अपनी मां को अंगूठा लगाना रेशम को बिल्कुल पसंद नहीं था। मां को बेटी की जिद के आगे आखिरकार झुकना पड़ा।

बेटी की जिद के आगे झुक गई मां

रेशम यादव ने अपनी मां को पढ़ाना लिखाना शुरू किया। खुद आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली रेशम यादव स्कूल से आने के बाद अपनी मां मंजू यादव को पढ़ाने लिखाने में जुट जाती थी। मां भी अपना काम जल्दी खत्म कर बेटी के साथ बैठ जाती। यह सिलसिला अभी भी जारी है। बेटी को मां को पढ़ाते हुए 8 महीने हो गए। उसकी मेहनत अब रंग लाने लगी है। माँ मंजू यादव अब अंगूठा नहीं लगाती हैं, बल्कि हस्ताक्षर करती हैं। अपनी बिटिया को इस बात का श्रेय देते हुए वह कहती हैं कि बेटी की बदौलत यह सब कुछ संभव हुआ है। वह अब अपनी बेटी को आगे पढ़ाना चाहती हैं, साथ ही वह खुद भी पढ़ाई जारी रखना चाहती हैं।

भगवत गीता को दी धुन।
भगवत गीता को दी धुन।

नहाते समय मिली थी रामायण और भगवत गीता

जौनपुर के बरजी गांव के मूलचंद हरिभजन सरोज सिर्फ तीसरी कक्षा तक ही पढ़े हैं। परिवार के भरण पोषण के लिए वह नासिक चले गए थे। वहां एक मिल में मजदूरी कर अपने परिवार की आजीविका चलाते थे। एक दिन गंगा गोदावरी में स्नान करते वक्त उन्हें रामायण और भगवत गीता मिली। उन्होंने इसे भगवान का आशीर्वाद समझा। मूलचंद बताते हैं कि उन्होंने भगवत गीता को 7 से अधिक बार पढ़ा। इतनी बार पढ़ने के बाद उनको इसका राग समझ में आने लगा। फिर उन्होंने इस संगीत में लिपिबद्ध करने का फैसला किया। काम करने के बाद उन्हें जो समय खाली मिलता था मूलचंद उसको भागवत को संगीतमय तरह से लिपिबद्ध करने में लगाते। मूलचंद का कहना है कि वो भगवत गीता को इस तरह से लिखना चाहते थे कि लोग उसका भी कीर्तन कर सके। उनका कहना था कि संगीतमय तरह से लिखने के बाद से बड़ी संख्या में लोग भगवत गीता को पढ़ सकेंगे।

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