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रानी लक्ष्मी बाई के 163वें बलिदान दिवस पर विशेष:झांसी बयां कर रहा रानी लक्ष्मी बाई की दास्तां, आज भी कायम है वीरता की झलक

झांसी2 महीने पहले
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पार्क में लगी रानी लक्ष्मी बाई की प्रतिमा। जो आज भी लोगों को उनके बलिदान की याद दिला रही है। - Dainik Bhaskar
पार्क में लगी रानी लक्ष्मी बाई की प्रतिमा। जो आज भी लोगों को उनके बलिदान की याद दिला रही है।

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी। गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी...।

रानी लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी में 19 नवम्बर 1828 को हुआ था। पिता मोरोपंत तांबे और माता का नाम भागीरथी था। रानी को बचपन में मणिकर्णिका और छबीली के नाम से पुकारा जाता था। रानी को 1851 में एक पुत्र हुआ। मगर कुछ महीने बाद उसकी मृत्यु हो गई। राजा गंगाधर राव ने कुछ समय के बाद एक पुत्र को गोद लिया, जिसका नाम दामोदर राव रखा गया। पुत्र वियोग में 21 नवंबर 1853 में गंगाधर राव के निधन हो गया था। अंग्रेज जनरल डलहौजी ने रानी के दत्तक पुत्र दामोदर राव को झांसी का उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया, लेकिन रानी ने इस बात का विरोध किया। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध करने का ऐलान कर दिया। घोड़े पर सवार रानी दोनों हाथों में तलवार लेकर पीठ पर अपने पुत्र को बांधकर एक शेरनी की तरह अंग्रेजों पर टूट पड़ी, ब्रिटिश हुकूमत को अब रानी झांसी के युद्ध कौशल का अंदाजा हो गया था।

चाहती थीं न लगे अंग्रेजों के हाथ, इसलिए कुटिया में हुआ अंतिम संस्कार

रानी की सेना अंग्रेजी सेना के सामने बहुत कम संख्या में थी। इसके बावजूद रानी की सेना ने डटकर मुकाबला किया। पर सेना और धन की कमी के कारण अंग्रेजों ने झांसी किले पर कब्जा कर लिया। रानी लगातार अंग्रेजी सेना से युद्ध लड़ती रही, जब रानी को चारों ओर से घेर लिया तब रानी अपने घोड़े पर सवार होकर किले से कूदी गईं थीं। ग्वालियर रियासत के पास युद्ध हुआ और 18 जून 1858 में रानी जख्मी हो जाने के कारण अपने विश्वासपात्र गुलमुहम्मद, देशमुख और रघुनाथ सिंह के साथ बाबा गंगा दास की कुटिया में पहुंची। कुटिया में पानी पीने के बाद महारानी लक्ष्मीबाई ने दम तोड़ दिया। रानी झांसी चाहती थी कि मरने के बाद अंग्रेज उनके शव को हाथ ना लगाएं , इसलिए उस कुटिया को जलाकर वही रानी का अंतिम संस्कार हो गया था

झांसी जिले के समथर कस्बे से 7 किमी की दूरी पर बसा है, लोहागढ़ गांव। पहाडी पर मौजूद लोहागढ़ की गढी
झांसी जिले के समथर कस्बे से 7 किमी की दूरी पर बसा है, लोहागढ़ गांव। पहाडी पर मौजूद लोहागढ़ की गढी

आजादी की जंग में लक्ष्मी बाई का योगदान

इतिहासकार डॉ. चित्रगुप्त बताते हैं झांसी जिले के समथर कस्बे से 7 किमी की दूरी पर बसा है, लोहागढ़ गांव । पहाडी नुमा ऊचाई पर मौजूद लोहागढ़ की गढी अपने अतीत के संघर्ष को बयाँ करती हैं जब गांव के किसान-मजदूरों ने भी अंग्रेजों से टक्कर ली थी।ईस्ट इंडिया कंपनी की बढ़ती ताकत के कारण देशभक्त रियासतों पर अंग्रेजी हुकूमत का अत्याचार चरम पर था , इन्हीं रियासतों में झांसी को अपने अधीन करने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी बड़ी सेना लेकर हमला बोल दिया था यहां की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी सेना सहित इनसे डटकर मुकाबला किया। ईस्ट इंडिया कंपनी के पास अत्याधुनिक हथियार थे। अंग्रेजों की भारी सेना के हमले के कारण तहत रानी को झांसी छोड़कर कालपी पहुँचना था, जहाँ उन्हें दूसरी मराठी सेना का सहयोग मिलता। रानी झांसी किले से निकलकर कालपी के लिए रवाना हुई। लेकिन अंग्रेजी सेना उनके पीछे लग गयी। रानी लक्ष्मीबाई समथर के पास लोहागढ़ से होकर निकली तो लोहागढ़ के ग्राम वासियों को पता चला कि अंग्रेजी सेना रानी साब के पीछे है ,तो पूरे ग्रामीण एकजुट हो गये। गांव के किसान, मजदूर सहित सभी वर्ग के स्त्री पुरुष अपने परंपरागत हथियार तीर तलवार, गढासे, कुल्हाड़ी आदि से अंग्रेजी सेना से मुकाबला करने को तैयार हो गये।

एनफील्ड रायफल वाले सैनिकों को भागने पर मजबूर किया

रानी को गांव से सुरक्षित निकल जाने दिया और यह अफवाह उड़ा दी गयी, कि रानी लोहागढ गढी में सुरक्षित है। अंग्रेजी सेना तक ये खबर पहुंची तो लोहागढ पर हमला कर दिया। गांव वालों ने जमकर मुकाबला किया। अपने परंपरागत हथियारों से ही अंग्रेजी एनफील्ड रायफल वाले सैनिकों को भागने पर मजबूर कर दिया। लेकिन, इस संघर्ष में अनेक गांव वाले शहीद हो गये थे। घर घर मौत ने डेरा जमा लिया था। उसी दिन गांव के एक वीर यौद्धा ,जन श्रुतियों में उन्हें दुल्हासाब कहा जाता है, का विवाह होकर उसी दिन दुल्हन विदा हुई थी, लेकिन दुल्हासाब अपनी तलवार लेकर अंग्रेजों से भिङ गये। दर्जनों सैनिको मार डाले, अंग्रेजी सैनिक उनके दूल्हे के रूप में और सहरा पहने देखकर आश्चर्य कर रहे थे। दुल्हा साब काफी समय तक लड़ते रहे। लेकिन पीछे से एक गोली उनको निशाना बना कर मारी गयी। किसी दुश्मन सैनिक ने घायल दुल्हासाब का सिर काट लिया लेकिन फिर भी वे काफी देर तक लडते हुऐ शहीद हो गये। इस युद्ध में अनेक ग्रामवासी शहीद हो गये लेकिन उन्होंने रानी की रक्षा करने में सफलता प्राप्त की थी। आज भी इन शहीदों की समाधियां गांव में बनी हुई हैं। जहां लोग श्रद्धा से पूजते हैं। झांसी बलिदान दिवस स्पेशल: महारानी लक्ष्मी बाई के बलिदान दिवस पर शत शत नमन रानी झाँसी का बलिदान दिवस पूरे देश में याद किया जाता है,

झांसी किले से रानी की समाधि स्थल ग्वालियर फूलबाग़ के लिए रवाना होती बलिदान ज्योति शौर्य यात्रा
झांसी किले से रानी की समाधि स्थल ग्वालियर फूलबाग़ के लिए रवाना होती बलिदान ज्योति शौर्य यात्रा

बलिदान दिवस पर जाती है मशाल

बलिदान दिवस की पूर्व संध्या पर झांसी किले से रानी झांसी बलिदान ज्योति शौर्य यात्रा निकली गई। हिंदू जागरण मंच के प्रदेश संगठन मंत्री राजेश और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महानगर प्रचारक अनुराग सहित कई लोग यात्रा में शामिल हुए। रानी झांसी के चित्र पर तिलक और माल्यार्पण कर मशाल रौशन किया गया, इसके बाद यात्रा प्रारंभ हुई। यात्रा झांसी दुर्ग से प्रारंभ होकर नगर में भ्रमण करते हुए रानी की समाधि स्थल ग्वालियर फूलबाग़ पहुंची।

रानी की तलवार का आज भी इंतजार

बुंदेलखंड क्रांति दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष सतेंद्र पाल सिंह ने बताया महारानी की तलवार की वापसी की मांग लंबे समय से की जा रही है। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश सेना से अपनी तलवार से मुकाबला करते हुए रानी आज ही के दिन 18 जून 1858 को ग्वालियर में वीरगति को प्राप्त हो गई थीं। मगर सरकारों व जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के कारण देश की आजादी के 72 सालों बाद भी रानी की तलवार ग्वालियर से झांसी वापस नहीं आ सकी। जिसका आज भी इंतजार है। शहर के लोग आज के दिन अपने घरों में दिए जलाकर रानी के बलदान को याद करते हैं।

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