खंडहर हो चुका है शाहपुर की रानी का किला:1857 में अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला वॉर का केंद्र रहा, कोतवाली होती थी संचालित

कानपुर देहात4 महीने पहले
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देश को आजाद हुए 15 अगस्त को 75 साल पूरे होने जा रहे हैं। हम सभी देशवासी हर्षोल्लास के साथ जश्न मना रहे हैं। 75 वर्ष में हम सब बदले हमारा रहन-सहन बदला लेकिन आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाने वाले क्रांतिकारियों से जुड़े स्थानों को हम बचाकर कर नहीं रख पाए।

जिसके चलते बहुत सारे किले आज गुमनामी के अंधेरे में खोने को तैयार हैं। ऐसा ही एक किला कानपुर देहात के अकबरपुर में मौजूद है। जो 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला वॉर का केंद्र रहा था। आज खंडहर में बदल चुके अवशेष अभी भी वीरता की कहानी बयां करते हैं। इस किले का आजादी की लड़ाई में बेहद बड़ा योगदान रहा है। आज वह जर्जर अवस्था में अपने अस्तित्व को खोता चला जा रहा है।

गुमनामी के अंधेरे में डूबा किला

कानपुर देहात के इतिहास को संजोने वाले प्रोफेसर लक्ष्मीकांत त्रिपाठी की किताब और सूचना विभाग की पुस्तिका में भी शाहपुर की रानी के इतिहास का जिक्र है। जिसमें साफ तौर पर लिखा गया है कि कानपुर देहात के अकबरपुर कस्बे में स्थित शाहपुर की रानी का किला आजादी की लड़ाई का गढ़ रहा है। 1857 में क्रांतिकारियों ने यहां डेरा डालकर अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिए थे।

पूरी तरह से कर लिया था कब्जा

शाहपुर की रानी के सैनिकों ने 10 अगस्त 1857 को तात्या टोपे की फौज के 6 हजार सिपाहियों और 18 तोपों संग मिलकर कालपी से आगे आने पर कालपी रोड पर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा लिया था। इसके बाद 16 और 17 अगस्त 1857 को यहां एकत्र हुए क्रांतिकारियों, रियासतदारों ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोलकर सचेंडी तक अंग्रेजों को खदेड़कर पूरी तरह से कब्जा कर लिया था।

खंडहर में हो रहा है तब्दील

कर्नल हैवलाक ने अकबरपुर स्थित क्रांति के गढ़ रहे इस किले को ध्वस्त कर यहां तहसील और कोतवाली संचालित कराई थी। साल 1998 तक इसी जगह तहसील कायम रही। 28 अगस्त 1999 को माती रोड पर बने भवन में तहसील का संचालन हो रहा है। लेकिन अभी भी यहां पुलिस चौकी कायम है। क्रांतिकारियों का गढ़ रहा शाहपुर की रानी का किला मौजूदा समय में खंडहर में तब्दील होने के साथ ही गुमनामी के अंधेरे में डूबा है।

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