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कानपुर के देवी मंदिरों में उमड़ा आस्था का सैलाब:बारादेवी मंदिर में भक्तों ने टेका माथा, एएसआई के सर्वेक्षण के अनुसार 1500 से 1700 साल पुराना है मंदिर

कानपुर15 दिन पहले
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बारा देवी मंदिर की सबसे खास बात यह है कि जो भक्त दर्शन के लिए आता है वह अपनी मनोकामना मान कर चुनरी बांधता है । - Dainik Bhaskar
बारा देवी मंदिर की सबसे खास बात यह है कि जो भक्त दर्शन के लिए आता है वह अपनी मनोकामना मान कर चुनरी बांधता है ।

कानपुर में शारदीय नवरात्र के पहले दिन मंदिरों में उमड़ा भक्तों का सैलाब। शहर के 6 देवी मंदिर बारहदेवी (बारादेवी) , मां बुद्धा देवी, मां तपेश्वरी देवी, जंगली देवी, मां कुष्मांडा और काली मठिया मंदिरों में भारी संख्या में भक्तों की कतार पहुंची। शहर के सुप्रसिद्ध बारा देवी मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ सबसे ज्यादा देखी गई।

बारादेवी मंदिर में भक्तों की भारी भीड़।
बारादेवी मंदिर में भक्तों की भारी भीड़।

कानपुर में कई इलाके देवी के नाम पर
कानपुर के दक्षिणी इलाके में स्थित बारा देवी मंदिर सिर्फ मंदिर की वजह से ही नहीं बल्कि इलाके का नाम से ही जाना जाता है। जिस इलाके में यह मंदिर बना है उस इलाके का नाम भी बारा देवी है। इनमें बर्रा 01 से लेकर बर्रा 09 तक, बारासिरोही शामिल हैं। इसके अलावा बर्रा विश्व बैंक का नाम भी देवी के नाम पर ही रखा गया है।

मंदिर का मुख्य द्वार।
मंदिर का मुख्य द्वार।

चुनरी बांधने से पूरी होती है मनोकामना

बारा देवी मंदिर में अपनी मनोकामना को पूरा करने के लिए भक्त यहां चुनरी बांधते है। मन्नत पूरी होती है वह चुनरी खोल देते है, सालों से ये परंपरा से चली आ रही है। लोगो को इस पर अटूट विश्वास है। मंदिर के लोगों की मानें, तो भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) की टीम ने जब इसका सर्वेक्षण किया था और यह पाया था कि मंदिर की मूर्ति लगभग 15 से 17 सौ साल पुरानी है।

लोगों की अटूट आस्था
बिधनू से आए ब्रजलाल, पनकी से आए वल्लभ सिंह और बगाही से आई मोनी ने बताया कि बारा देवी पर उनकी आस्था अटूट है। हर साल हम परिवार के साथ माता के दर्शन के लिए आते हैं। माता के दर्शन से एक आत्मविश्वास की जाग्रति होती है और हमारी सभी मनोकामनाए पूरी होती है।

मंदिर के बाहर तक लगी है भक्तों की कतार।
मंदिर के बाहर तक लगी है भक्तों की कतार।

इसलिए कहा जाता है बारहदेवी
- प्राचीन कथाओं के मुताबिक एक बार पिता से हुई अनबन पर उनके कोप से बचने के लिए घर से एक साथ 12 बहनें भाग गई।
- सारी बहनें किदवई नगर में मूर्ति बनकर स्थापित हो गई।
- पत्थर बनी यही 12 बहनें कई सालों बाद बारा देवी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुई।
- कहा जाता है कि बहनों के श्राप से उनके पिता भी पत्थर हो गए थे।

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