IIT प्रोफेसर की स्टडी- कोरोना में गुस्सैल हुए बच्चे:लाशों की खबरें और बातों से बच्चे ट्रामा में पहुंचे, ग्रोथ पर असर पड़ सकता है

कानपुर5 महीने पहलेलेखक: शलभ आनंद बाजपेयी

कोरोना की दूसरी लहर में देश में 69 प्रतिशत बच्चे मेंटल ट्रामा का शिकार हुए थे। बच्चों को कोरोना संक्रमण नहीं हुआ लेकिन सोशल मीडिया, टीवी के जरिए, पड़ोसियों या एंबुलेंस को देख कर बच्चों के दिल और दिमाग में कोरोना ने घर बना लिया। यह स्टडी आईआईटी कानपुर के ह्यूमैनिटीज और सोशल साइंस के प्रोफेसर बृज भूषण ने की है। इसके पहले भी सुनामी के समय उन्होंने अपनी स्टडी के जरिये यह बताया था कि कैसे ऐसी आपदा बच्चों के लिए घातक हो सकती है। उनका कोरोना की दूसरी लहर की स्टडी जर्नल फ्रंटियर्स इन साइकोलॉजी के जनवरी के संस्करण में पब्लिश होने जा रही है। प्रो बृज भूषण ने कहा कि तीसरी लहर में संक्रमित होने वाले बच्चों की संख्या और बढ़ सकती है।

दूसरी लहर के 30 दिनों बाद शुरू किया था सर्वे...
प्रो बृज भूषण ने बताया, कोरोना की दूसरी लहर मार्च 2021 से शुरू हुई थी और मई के अंत तक खत्म हो गई थी। दूसरी लहर में कई लोगों ने अपने प्रियजनों को खोया। जितना आघात उनके परिवार वालों को हुआ उससे कहीं ज्यादा इसका असर देश के बच्चों पर पड़ा। इसी को लेकर हमने अपना सर्वे जुलाई एक तारीख से शुरू किया। देश के अलग अलग हिस्सों से 9 से 20 साल तक के 412 बच्चों पर हमने अपनी स्टडी की। इनमे 223 लड़के और 189 लड़कियां शामिल रही। यह सर्वे हमने शहरी और ग्रामीण इलाकों दोनों जगह किया।

कोरोना के ट्रामा से प्रभावित हुए बच्चे
प्रो बृज भूषण ने बताया, हम लोगों ने अपनी स्टडी में 68.9 फीसदी बच्चों में पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस पाया। इस उम्र में ऐसा होना उनके आने वाले जीवन को प्रभावित कर देता है, जिससे उनकी ग्रोथ भी रुक सकती है। यह इसलिए हुआ क्योंकि अप्रैल से कोरोना के कारण लॉकडाउन लगा दिया गया था। वह लोग घर पर ही रहने को मजबूर थे। कोरोना की दूसरी लहर में भले ही बच्चों को अपनी चपेट में नहीं लिया लेकिन उनको पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस ने अपनी चपेट में जरूर ले लिया। हमने अपनी स्टडी में 43 फीसदी शहरी और 57 ग्रामीण इलाकों के बच्चों को शामिल किया। इनमें से 89 फीसदी के एक से अधिक भाई-बहन थे, जोकि आपस में बातचीत करके अपना स्ट्रेस दूर कर लेते हैं। 50 फीसदी बच्चे अपने माता-पिता या दादा-दादी के साथ रह रहे थे।

कैसे पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस से ग्रसित हुए बच्चे...
प्रो बृज भूषण, जिन बच्चों पर हमनें अपनी स्टडी की उनकी उम्र 9 से 20 साल थी। इस उम्र में जो हम देखते या सुनते है उसी पर विश्वास करने लगते है। ऐसे में लॉकडाउन के समय हम सभी ने न्यूज़ चैनल के माध्यम से नदियों में लाशें देखी, अस्पतालों के बाहर रोते बिलखते लोगों की तस्वीरें देखी। घर पर रहते हुए एम्बुलेंस की सायरन सुने। इसके अलावा घर के बड़ों के मुँह से पड़ोसियों या उनके मिलने वालों या कोरोना कितना घातक हो गया है यह सब सुना। यह सब बातों ने बच्चों के दिमाग में अपना घर बना लिया जिसकी वजह से यह बच्चे पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस से ग्रसित मिले।

क्या लक्षण होते है स्ट्रेस के...
प्रो बृज भूषण ने बताया, स्टडी के मुताबिक बच्चों के व्यक्तित्व में काफी बदलाव देखने को मिले। जैसे शहरी इलाकों के बच्चों में ज्यादा उत्तेजना देखने को मिली जैसे छोटी छोटी बातों में गुस्सा हो जाना, घर के बड़ों के प्रति अपना गुस्सा जाहिर करना कई दिनों तक ठीक से खाना नहीं खाना और एक ही चीज के बारे में बात करना। वहीं ग्रामीण इलाकों के बच्चों में मानसिक आघात अधिक पाया गया। इसका मुख्य कारण इन इलाकों के बच्चों के पास न तो मोबाइल फोन था और न ही मनोरंजन का कोई साधन। साथ ही जिस तरह से लॉकडाउन के समय ग्रामीण इलाकों के लोगों को घर पर रहने पर मजबूर किया जा रहा था वह भी एक बड़ा कारण बना इस मानसिक आघात का।

किन शहरों या राज्यों में किया गया सर्वे...
प्रो बृज भूषण ने बताया, हम लोगों ने चंडीगढ़, दिल्ली, शिमला, लखनऊ, कानपुर, हरियाणा और पंजाब के ग्रामीण इलाकों में, उत्तराखंड के अलावा कई बड़े शहरों में हमने सर्वे किया।