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टीचर्स डे स्पेशल:शहर के बड़े शिक्षा संस्थानों के मुखिया भी कभी रहे है शागिर्द, अब गुरु बनकर राष्ट्र निर्माण में तैयार कर रहे है छात्रों की नई फौज

कानपुर3 महीने पहले
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एक बच्चा जब इस दुनिया में जन्म लेता है तो उसके कई रिश्तेदार होते है। लेकिन इन रिश्तेदारों के अलावा भी एक और शख्स होता है, जो एक बच्चे के सुनहरे भविष्य के लिए उसके वर्तमान को सुधारता है और उसको आगे बढ़ने में मदद करता है, उसको हम शिक्षक कहते है। एक शिक्षक छात्र के जीवम में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। कानपुर शहर के कई बड़े संस्थानों में कुछ ऐसे शिक्षक है जो कभी इन्हीं संस्थानों में पढ़ा करते थे और आज इन संसथान के मुखिया के रूप में छात्रों को सवारने में लगे है।

संसथान का मुखिया बनना गर्व की बात...
आईआईटी कानपुर के निदेशक प्रो. अभय करंदीकर ने बताया, मैंने आईआईटी कानपुर से एमटेक पीएचडी इसी संस्थान से किया है। मेरी काफी यादें जुडी है यहाँ से, जब मैंने सन 1982 में एडमिशन लिया था तब जो शिक्षक हमको पढ़ते थे उनसे मैं आज भी जुड़ा हु और समय समय पर उनसे कई चीजों पर सलाह लेता रहता हु। जब कोई किसी इंस्टिट्यूट में पढ़ चूका हो और कई सालों बाद उसे उसी इंस्टिट्यूट का मुखिया बाना दिए जाए तो यह उसके लिए गर्व की बात होती है। ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ,यहां से पढ़ कर जाने के बाद मुझे 34 साल बाद आईआईटी कानपुर की डायरेक्टरशिप ऑफर की गयी तो मेरी आँखों के सामने एक बार फिर से वही 1982 की तस्वीरें जीवित हो गई। यहां बिताया हुआ हर एक पल ताजा हो गया गया और सबसे बड़ी बात यहाँ के शिक्षकों से मिला ज्ञान और अन्य बातें याद आने लगी। मेरे जीवन में यहीं पढ़ाने वाले प्रोफेसर ने काफी बदलाव किया, जैसे प्रो पीआरके राव, उन्होंने मुझे सिर्फ पढ़ाया नहीं बल्कि जीवन जीने का तरीका समझाया। इनके अलावा प्रो एमयू सिद्धकी और प्रो वीपी सिन्हा ने भी मुझे काफी मोटीवेट किया। मैं आज भी इन सभी शिक्षकों से जुड़ा हु।

आईआईटी कानपुर के निदेशक प्रो. अभय करंदीकर छात्रों को सम्भोधित करते हुए
आईआईटी कानपुर के निदेशक प्रो. अभय करंदीकर छात्रों को सम्भोधित करते हुए

सम्मान की बात है...
एचबीटीयू के वीसी प्रो शमशेर ने भी एचबीटीयू जब एचबीटीआई हुआ करता था तब यहां से पढ़ाई की थी। उन्होंने बताया, सन 1983 में मैकेनिकल इंजीनियरिंग में मैंने एचबीटीआई में एडमिशन लिया था। तब में बहुत अंतर आ गया है। तब के बच्चों में अपने शिक्षकों से ज्यादा कनेक्ट रहता था क्योंकि बच्चों के पास उनके अलावा कोई और विकल्प नहीं रहता था, लेकिन आजकल के बच्चे इंटरनेट को भी अपना शिक्षक मानने लगे है। मेरे जीवन प्रो एनएल कच्छारा ने अहम भूमिका निभाई है, में जो आज हु सिर्फ उन्हीं की वजह से हु। उनका पढ़ने का तरीका ही कुछ अलग था। जब वो पढ़ते थे तब हम लोगों को किताबों की जरूरत नहीं पड़ती थी, उनका पढ़ाया हुआ एक एक शब्द बच्चों के दिमाग में बैठ जाता था। अगर अपनी पढ़ाई पूरी होने के इतने सालों बाद उसे उसी संसथान का वीसी बनाया जाये तो उससे बड़े सम्मान की बात क्या हो सकती है। मैंने जब यहां से पढ़ाई पूरी की तो कई तरह की समस्यों को भी झेला, अब जब मैं यहां का मुखिया बन कर लौटा हु तो मैं यह चाह रहा हु कि यहाँ पढ़ रहे बच्चों को वह समस्याओं से ना झूझना पड़े।

1987 में एचबीटीयू के वीसी प्रो शमशेर अपने शिक्षकों के साथ
1987 में एचबीटीयू के वीसी प्रो शमशेर अपने शिक्षकों के साथ

जीवन में बदलाव जरूरी है...
छत्रपति शाहूजी महाराज यूनिवर्सिटी के वीसी प्रो विनय पाठक की माने तो जीवन में बदलाव ज़रूरी है। उन्होंने बताया, 1991 में जब एचबीटीआई कानपूर यूनिवर्सिटी के अंतर्गत आता था तब मैंने अपनी पढ़ाई इस संसथान से शुरू की थी। उस समय में और आज के समय में कई परिवर्तन देखे है। उस समय प्रो गणेश बगड़िया हुआ करते थे जो हम लोगों को पढ़ाई के अलावा एक छात्र के जीवन का महत्व क्या होता है वह उन्होंने मुझको समझाया। उन्हीं के कहने के अनुसार मैंने अपने जीवन में बदलाव किए और आज जो कुछ भी मै हु उन्हीं के द्वारा दिखाए गए मार्ग की वजह से हु। आजकल के स्टूडेंट्स शिक्षक को उतना महत्व नहीं देते जितना पहले दिया करते थे, इसकी मुख्य वजह जो एक छात्र अपने शिक्षक से चाहता है वह उसको नहीं मिल पता इसी लिए शिक्षकों का महत्व समाप्त होता जा रहा है। छात्र एक शिक्षक से ज्यादा इंटरनेट और टेक्नोलॉजी पर निर्भर रह रहे है।

छत्रपति शाहूजी महाराज यूनिवर्सिटी के वीसी प्रो विनय पाठक
छत्रपति शाहूजी महाराज यूनिवर्सिटी के वीसी प्रो विनय पाठक

शिक्षक और छात्र के बीच बढ़ते फासले...
चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के डीन डॉ. डीआर सिंह ने 1984 में एमएससी की पढ़ाई सीएसए से पूरी की और अब वह यहां के डीन है। उन्होंने बताया, हम लोग यहां जब पढ़ते थे तब शिक्षकों का पढ़ने का तरीका अलग होता था, वह लोग छात्रों को समय देते थे, साथ ही अगर किसी छात्र को कहीं दिक्कत होती थी तो वह उसको अलग से समझाते थे, आज भी ऐसा होता है लेकिन छात्र शिक्षक के पास अपनी समस्या लाने की बजाए इंटरनेट पर इसका जवाब ढूंढ़ना ज्यादा आसान समझते है। यह बदलाव अच्छा है लेकिन इंटरनेट पर आपको हर सवाल का जवाब नहीं मिल पता। शिक्षक और एक छात्र के बीच यह फासला बढ़ता ही चला जा रहा है।

चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के डीन डॉ. डीआर सिंह
चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के डीन डॉ. डीआर सिंह
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