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इत्र कारोबारी की एक गलती ने बनाया विलेन:पिता के सिखाए फार्मूले से पीयूष जैन ने इतना कमाया कि 195 करोड़ कैश तो रेड में मिल गए

कानपुर/कन्नौज5 महीने पहलेलेखक: रवि पाल

195 करोड़ कैश... हजार करोड़ के लगभग का साम्राज्य और इन सबके पीछे एक ही नाम- पीयूष जैन। अगर कोई कन्फ्यूजन हो तो दूर कर लें कि ये रुपए न तो किसी और के हैं और न ही इस तरह से कमाए गए हैं, जिसे हम आप देख-समझ नहीं सकते हैं। पिता के इत्र के फुटकर व्यापार और उनके एक हुनर (आर्गेनिक इत्र और कैमिकल इत्र को मिलाने का फार्मूला) से पीयूष जैन ने व्यापार को इस स्तर तक पहुंचा दिया कि देश की दिग्गज पान मसाला कंपनियां भी इस फार्मूले की मोहताज हो गईं। 40 से 50 पान मसाला फैक्ट्रियों में इसके फार्मूला की सप्लाई थी।

पीयूष जैन की गलती सिर्फ इतनी थी कि उसने टैक्स नहीं जमा किया और न ही रुपयों का लेखा-जोखा रखा। इस केस में महज पांच साल से कम की सजा का प्रावधान है।

पढ़िए पीयूष जैन की पूरी कहानी-

पढ़ने में सामान्य, हिन्दी मीडियम से साइंस ग्रेजुएट...न कोई तकनीकी डिग्री और न कोई विशेष ट्रेनिंग। लेकिन इस इत्र कारोबारी के कन्नौज और कानपुर के घर से अब तक कुल 194.45 करोड़ कैश मिल चुका है। इनमें से 177 करोड़ कानपुर से और 19 करोड़ कन्नौज से मिला है।

इसके अलावा 23 किलो सोना और 6 करोड़ कीमत का चंदन ऑयल बरामद हुआ था। कार्रवाई पूरी करने के बाद पीयूष को गिरफ्तार करने के साथ ही कोर्ट में पेश किया गया। जहां से पीयूष को 14 दिन ही न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया।

इसी कड़ी में दैनिक भास्कर के रिपोर्टर ने पीयूष के पड़ोसियों और उसके पड़ोसियों से बातचीत की, जाना कि पीयूष कैसे इस अकूत संपत्ति का मालिक बन गया? ज्यादातर लोगों ने बताया कि बेहद सीधा और चुपचाप रहने वाला पीयूष अपने काम में मास्टर है। करीब 25 साल पहले उसे अपने पिता महेश चंद्र जैन के साथ कंपाउंड बनाना सीखना शुरू किया। इसे बनाने में उसने वो महारथ हासिल की कि उसके आगे पूरे कन्नौज में कोई नहीं टिकता है।

पीयूष के साथ 12वीं तक की पढ़ाई करने वाले दोस्त शिव कुमार द्विवेदी ने बताया कि बचपन में भी पीयूष सीधे स्वभाव का रहा। 12वीं तक की पढ़ाई उसने ग्वाल मैदान एसएन इंटर कॉलेज (अब केके इंटर कॉलेज) से पूरी की। वह पढ़ने में काफी अच्छा था। इसके बाद साल 1983 में कानपुर के क्राइस्ट चर्च कॉलेज से BSc की पढ़ाई पूरी की। फिर वो कन्नौज वापस लौट आया और पिता के साथ कंपाउंड बनाने का काम सीखने लगा।

घर के बगल में छोटी सी जगह में गोपनीय तरीके से कंपाउंड बनाता था पीयूष।
घर के बगल में छोटी सी जगह में गोपनीय तरीके से कंपाउंड बनाता था पीयूष।

कभी कोई आपराधिक इतिहास नहीं रहा मित्र शिव कुमार ने बताया कि उसका कभी कोई आपराधिक इतिहास नहीं रहा। वो सिर्फ अपने परिवार और काम से मतलब रखता था। बेहद साधारण तरीके से रहता था। पीयूष की सूंघने की शक्ति कमाल की है। उसे एक साथ कई इत्र भी सूंघा दो तो वो सभी इत्र के नाम अलग-अलग बता देगा। कंपाउंड बनाने वाले की सूंघने की शक्ति कमाल की होनी चाहिए। यही कारण रहा कि पीयूष का बनाया कंपाउंड देश का अकेला संस्थान फ्रेंगरेंस एंड फ्लावर डेवलमेंट सेंटर (FFDC) भी कभी फेल नहीं कर पाया।

गली के एक छोर से दूसरे छोर तक फैला हुआ है पीयूष का घर।
गली के एक छोर से दूसरे छोर तक फैला हुआ है पीयूष का घर।

कन्नौज में पिता लेकर आए कंपाउंड
इत्र कारोबारी मणिक जैन ने बताया कि 1978 में पीयूष के पिता महेश चंद्र जैन मुंबई से केमिकल का कंपाउंड बनाने का काम सीखकर आए थे। पहले कन्नौज में सिर्फ प्राकृतिक इत्र बनाने का काम होता था। केमिकल से खुशबू बनाने का काम महेश चंद्र जैन ने शुरू किया। उनका विरोध भी हुआ था। लेकिन वक्त के साथ लोगों ने इसे स्वीकार कर लिया। पीयूष ने कंपाउंड बनाना अपने पिता से ही सीखा।

पीयूष जैन के साथ 12वीं तक पढ़ाई करने वाले दोस्त शिव कुमार द्विवेदी।
पीयूष जैन के साथ 12वीं तक पढ़ाई करने वाले दोस्त शिव कुमार द्विवेदी।

बेहद गोपनीय रखा जाता है कारोबार
कन्नौज में इत्र कारोबारी बेहद गोपनीयता बरतते हैं। स्थानीय निवासी इंद्रेश जैन ने बताया कि किस पान मसाला के कंपाउंड को बनाने में किस इत्र और कैमिकल का यूज और कितना किया गया, ये कोई किसी को भी नहीं बताता है। पान मसाला कंपनियां भी किससे कंपाउंड लेती है, ये भी बेहद गोपनीय रखा जाता है। देश की बड़ी से बड़ी और छोटी से छोटी पान मसाला बनाने वाली कंपनी का कंपाउंड (फ्लेवर और स्वाद) कन्नौज से ही जाता है।

पीयूष के घर पास स्थित करीब 2 बीघे में उसका कारखाना।
पीयूष के घर पास स्थित करीब 2 बीघे में उसका कारखाना।

चीजों से है बेहद लगाव
पीयूष जैन के पड़ोसी निशंक जैन ने बताया कि पीयूष को अपनी चीजों से बेहद लगाव है। कार्रवाई से 3 दिन पहले ही निशंक की पीयूष जैन से दुआ-सलाम हुई थी। बताया कि उसने जो भी चीज खरीदी उसे कभी नहीं बेचा। उसके पास एलएमएल स्कूल के अलावा पुरानी राजदूत मोटरसाइकिल भी है। उसके पास पुरानी सेंट्रो कार भी है तो नई फार्च्यूनर गाड़ी भी है। उसके पास पुरानी क्वालिस गाड़ी भी है। उसका और पूरे परिवार का रहन-सहन भी बेहद साधारण ही रहा है। उसने कानपुर हो या कन्नौज घर को भी खाली नहीं छोड़ा।

पीयूष जैन के पड़ोसी एडवोकेट निशंक जैन।
पीयूष जैन के पड़ोसी एडवोकेट निशंक जैन।

मकानों को बनाने में पैसा पानी की तरह बहाया गया
अरबों की संपत्ति मिलने के बाद पड़ोसी भी बेहद हैरान है और नाराज भी हैं। बताया कि इतना पैसा होने के बावजूद कभी धर्म-कर्म के काम में भी उसने एक रुपए का चंदा तक नहीं दिया। मोहल्ले में उसने एक-एक कर 5 मकान खरीद डाले थे। वहीं एक मकान MLC पुष्पराज जैन की इत्र फैक्ट्री से 20 कदम भी दूरी पर खरीदा है। सभी मकानों को बनाने में पैसा पानी की तरह बहाया गया है। मकान बाहर से साधारण और अंदर से महल की तरह बनाए गए हैं।

घर के पीछे हिस्से में पीयूष जैन ने बना रखा है अपना ऑफिस।
घर के पीछे हिस्से में पीयूष जैन ने बना रखा है अपना ऑफिस।

कैश पर चलता है पूरा कारोबार

स्थानीय इत्र कारोबारी राजेश कुमार के मुताबिक कंपाउंड का ज्यादातर कारोबार कैश पर ही चलता है। पीयूष जैन एक किलो कंपाउंड करीब 5 हजार रुपए में तैयार करता था और इसे पान मसाला कारोबारियों को 50 हजार रुपए से 2 लाख रुपए प्रति किलो तक बेचता था। पान मसाला बनाने में जितना भी कंपाउंड प्रयोग होता था, प्रति किलो के हिसाब से पीयूष जैन सप्लाई करता था।

कई कंपनियों को कारोबार संकट में

पीयूष जैन देश की कई बड़ी पान मसाला कंपनियों को कंपाउंड सप्लाई करता था। अब उन पान मसाला के कारोबार भी संकट खड़ा हो सकता है, जिनको पीयूष जैन कंपाउंड सप्लाई करता था। कंपाउंड बनाने में जो खर्च आता था, उसे ऑन पेपर बेहद कम रेट पर दिखाया जाता था, ताकि GST ज्यादा न चुकानी पड़े। इससे ये भी संभावना है कि 200 करोड़ रुपए से ज्यादा का कैश पीयूष जैन ने इस कैश के कारोबार से ही जुटाया।

कंपाउंड बनाने के लिए मकान खरीदा था
जिस घर में छापेमारी की गई है। वहां एक तहखाना भी मिला है। यहां भी कहीं पर भी CCTV नहीं लगाए गए। मकान के पीछे हिस्से में उसने एक छोटा सा ऑफिस और एक छोटा सा कंपाउंड बनाने के लिए मकान खरीद कर रखा था। GST की टीम ने 500 शीशियों में वहां मिले कैमिकल को जांच के लिए भेजा है। पीयूष जैन अपने धंधे में पूरी गोपनीयता बरतता था। कंपाउंड बनाने का काम भी बेहद अंदर और शांत माहौल में करता था।

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