कौशांबी में निभाई जा रही 244 साल पुरानी परंपरा:10 किलोमीटर के दायरे में होती है रामलीला, अलग-अलग मोहल्लों में होता है मंचन

कौशांबी2 महीने पहले

आधुनिक होते युग में हाई-टेक रामलीला को मंच पर आपने देखा होगा, जिसमें लाइट और साउंड के नाम पर बिजली दुरुपयोग किया जाता है। आज हम आपको कौशांबी के कड़ा कस्बे की रामलीला से रु-ब-रु कराते हैं। जो बिजली की बचत के साथ मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्श को लोगो के बीच पहुंचाते है। खास बात यह है कि रामलीला अपनी 244 साल पुरानी परंपरा को आज भी कायम रखे हुए है। यह रामलीला कड़ा कस्बे की 10 किलोमीटर की परिधि में अलग-अलग दिन अलग अलग मोहल्लों में होती है।

रामलीला का मंचन करते हुए कलाकार।
रामलीला का मंचन करते हुए कलाकार।

भगवान राम की निकाली गई सवारी

कड़ा कस्बे की अनोखी रामलीला दोपहर को श्रृंगार भवन से सज धज कर गाजे बाजे के साथ भगवान राम की सवारी निकलती है। जिन्हें रास्ते भर दर्शक उन्हें निहारते रहते है। हर रोज किसी नए स्थान पर रामलीला का सजीव चित्रण के बाद राम की सवारों भक्तों के घर पहुंचती है। जहां भक्त अपने भगवान को घर की चौखट पर पाकर श्रद्धा भाव से पूजन करते है। भक्तों के पास जो कुछ होता है उसी से भगवान को भोग लगाते है। घर के सभी सदस्य राम जी का आशीष पाने को लालायित रहते है। रामलीला देखने आई स्वेक्षा तिवारी, शिखा तिवारी ने बताया, दिन के समय बिना बिजली का दुरूपयोग और कानफोड़ू साउण्ड से दूर यह रामलीला उन्हें बहुत पसंद आती है। जिसमें रामलीला के सभी किरदारों को बेहद नजदीक से देखने को मिलता है।

रामलीला में सजे हुए कलाकार।
रामलीला में सजे हुए कलाकार।

12 दिन तक चलती है रामलीला

आयोजक मंडल के सदस्य पंडित नील कमल मिश्रा ने बताया, रामलीला की सबसे खास बात जो हर रामलीला से यह अपने को अलग करती है। वह है इसकी नाट्य शैली। इस रामलीला में कलाकार उन्हीं कस्बों के होते है। जिन मोहल्लों और कस्बों में इस रामलीला का मंचन किया जाता है। 12 दिनों तक चलने वाली इस रामलीला में हर दिन का मंचन पहले से निर्धारित कर दिया जाता है। जो अपने तय समय और दिन के आधार पर मोहल्लों और कस्बों में मंचित किया जाता है।

सदस्य अभय मिश्रा ने बताया, 244 साल से उन्होंने भगवान् राम के चरित्र को नई पीढ़ी को दिखने के साथ सामाजिक मुद्दों पर भी लोगो को जागरूक किया है। यही कारण है कि उनकी यह रामलीला पूरी तरह से बिजली का दुरूपयोग न कर प्राकृतिक संसाधनों पर ही निर्भर है। बुजुर्गों की परंपरा को आगे बढ़ाना इसका सबसे बड़ा मकसद बताया है।

देखें रामलीला की झलकियां...

खबरें और भी हैं...