कुशीनगर में समाज कल्याण के स्कूलों का नहीं हुआ कल्याण:टाट पट्‌टी पर बैठकर पढ़ते हैं बच्चे, पीने के पानी का नहीं इंतजाम, बिल्डिंगें भी जर्जर

कुशीनगर2 महीने पहले

उत्तर प्रदेश सरकार के बेसिक शिक्षा विभाग और समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित विद्यालयों की व्यवस्था में बड़ा अंतर देखा जा रहा। एक तरफ परिषदीय विद्यालयों को मॉडर्न करते हुए सजाया जा रहा है। उन्हीं के आसपास पिछड़े इलाके में गरीबों के बच्चों के लिये संचालित समाज कल्याण विभाग के स्कूलों की स्थिति काफी दयनीय है। इन विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे मूलभूत सुविधाओं और शिक्षा को तरस रहे हैं।

जिले का बेसिक शिक्षा विभाग बच्चो के लिए मॉर्डन स्कूल बना रहा ताकि उनमें पढ़ने वाले छात्र खुद को कान्वेंट स्कूल से कम न समझें। लेकिन जिले के दूर दराज इलाको में परिषदीय विद्यालय के आसपास संचालित समाज कल्याण विभाग की अनसूचित प्राथमिक पाठशाला के बच्चे जर्जर भवन और जमीनों पर दयनीय स्थिति में शिक्षा ग्रहण करने को विवस हैं।

25 स्कूलों में नियुक्त हैं 63 शिक्षक

निचले तबके के उत्थान के लिए संचालित अनसूचित प्राथमिक पाठशाला की संख्या जिले में 25 है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 1200 बच्चों का नामांकन है। शिक्षा विभाग की तरफ से बच्चों को पढ़ाने के लिए 63 शिक्षक नियुक्त हैं। जिनकी तनख्वाह सरकार समाज कल्याण विभाग के जरिये दे दिया जाता है। लेकिन इन स्कूलों पर सरकार और जिले के जिम्मेदार की कभी नजर भी नही डालते। जिसका खामियाजा अनुसूचित विद्यालय के बच्चे उठा रहे हैं। इन्हीं विद्यालय के कुछ दूरी पर संचालित परिषदीय विद्यालयों को मॉर्डन करने की कवायद तेज रफ्तार से चल रही।

लेकिन गरीबो के बच्चों के लिये शुरू किए गए इन स्कूलों में किताबे और ड्रेस के साथ अनुदान सबसे बाद में आता है। एक स्कूल के प्रबंधक ने बताया कि पिछले साल तो बच्चों का ड्रेस ही नहीं आई।

किसी स्कूल में चेयर हैं तो अधिकांश में बच्चे टाटपट्‌टी पर बैठकर पढ़ते हैं।
किसी स्कूल में चेयर हैं तो अधिकांश में बच्चे टाटपट्‌टी पर बैठकर पढ़ते हैं।

जर्जर भवनों में चल रहे स्कूल

अनुसूचित प्राथमिक विद्यालयों के मूलभूत सुविधाओं की बात करें तो मासूम बच्चों के लिए संचालित इन विद्यालयों के भवन काफी पुराने और जर्जर हैं कई तो पक्के भवनों के अभाव में कैटीन में संचालित है। जो कभी भी किसी बड़े हादसे का कारण बन सकते हैं। उनमें जरूरी सुविधाओं जैसे ऑफिस, कक्षाओं, रसोईघर व शौचालयों की व्यवस्था का टोटा हैं।

इस स्कूल में बच्चे आज भी टाट पट्‌टी पर बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं।
इस स्कूल में बच्चे आज भी टाट पट्‌टी पर बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं।

पीने के पानी को भी तरसते हैं बच्चे

बच्चों के लिए पेय जलापूर्ति की भी कोई उचित प्रबंध नहीं है। स्कूल में नियुक्त रसोईया बच्चो के लिए एमडीएम कक्षाओं या ऑफिस के कोनों में बनाते हैं। अनुसूचित प्राथमिक विद्यालय से जुड़े हुए प्रबंधकों की माने तो इन विद्यालयों की शुरुआत अंग्रेजों के समय 1937 में की गयी। जिससे पिछड़े इलाके के उपेक्षित अनुसूचित जातियों के बच्चों को शिक्षा मील सके।

इन विद्यालयों की उपेक्षा के कारण काफी पुराने हो गए हैं। कही कहीं शिक्षक और प्रबन्धक चन्दा जुटाकर या किसी के सहयोग से थोड़ा बहुत काम करा देते है। अगर सरकार थोड़ा ध्यान दे तो इन बच्चों को भी पढ़ाई के लिए बेहतर परिवेश मिल जाये।

संचालिका बोलीं- वेतन छोड़ कोई अनुदान नहीं आता

समाज कल्याण विभाग के इन विद्यालयों का संचालन देखने वाली अधिकारी रश्मि मिश्रा ने बताया, " जिले में पहले 26 विद्यालय हुआ करते थे पर एक विद्यालय एयरपोर्ट में आने से टूट गया। जिले में अभी भी 25 विद्यालय विभाग द्वारा संचालित कराए जाते हैं। हमारे विभाग के पास शिक्षकों का वेतन छोड़ कोई अतिरिक्त अनुदान नहीं आता है। जिससे स्कूलों को ठीक कराया जा सके। हम लोग पंचायत और अन्य विभागों की मदद से इनकी व्यवस्थाओं को सुधारने का प्रयास कर रहे हैं। जिले के सभी संचालित विद्यालयों में सेवरहि ब्लॉक का बहिराबारी और गोसाई पट्टी की हालत तो दयनीय है। साथ ही अन्य विद्यालय में भी काफी काम हैं। "

स्कूल में टीचरों के लिये जो कुर्सियां मेजे दी गई हैं वे भी टूटी हैं।
स्कूल में टीचरों के लिये जो कुर्सियां मेजे दी गई हैं वे भी टूटी हैं।