जन्माष्टमी पर विशेष...कृष्ण की लीलाएं देखिए:कालयवन से डरते हुए ललितपुर में छिपे थे कृष्ण..रणछोड़ पड़ा था नाम, बिजनौर में दुर्योधन का 56 भोग छोड़कर विदुर की कुटी में खाया था बथुए का साग

ललितपुर/बिजनौर2 महीने पहले
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यूपी में आज धूमधाम से जन्माष्टमी मनाई जा रही है। सभी जानते हैं कि श्रीकृष्ण का नाता मथुरा से है लेकिन श्री कृष्णा का संबंध बुंदेलखंड के ललितपुर और पश्चिमी यूपी के बिजनौर से भी है। ललितपुर में जहां श्रीकृष्ण को रणछोड़ नाम मिला था तो वहीं बिजनौर में कृष्णा भगवान ने विदुर कुटी में बथुआ का साग खाया था। जिसके बारे में महाभारत में भी बताया गया है।

ललितपुर की गुफा में मिला रणछोड़ नाम

ललितपुर से लगभग 50 किमी दूर घने जंगलों के बीच यूपी एमपी बॉर्डर पर बेतवा नदी के किनारे रणछोड़ धाम बना हुआ है। बेतवा की कल कल बहती पानी की धारा और लंबी पर्वत श्रंखलाओं के बीच श्री कृष्णा का मंदिर विराजमान हैं। यहां आने वाले प्राकृतिक छटाओं के बीच श्री कृष्णा की लीलाओं के बारे में जानते हैं। यहां घने जंगलों के बीच से आने का रास्ता है। बताते हैं कि यहीं पर श्री कृष्ण भगवान को रणछोड़ नाम पड़ा था। इसका उल्लेख भगवत गीता में भी है।

यह उस समय की बात है जब जरासंध ने मथुरा पर धावा बोल दिया था। जरासंध अपने साथ कालयवन राक्षस को भी लाया था। कालयवन को वरदान था कि न तो चंद्रवंशी न ही सूर्यवंशी उसे मार सकते हैं। उसे न तो कोई हथियार खरोंच सकता है न ही कोई उसे अपने बल से हरा सकता है। श्री कृष्ण को उसके वरदान के बारे में पता था कि उसे हराया नहीं जा सकता है। ऐसे में वह रणभूमि छोड़ कर भाग गए और ललितपुर की एक गुफा में छुप गए। गुफा में राक्षसों से युद्ध करने राजा मुचकुंद त्रेता युग से ऋषि के रूप में तपस्या में लीन थे। उन्हें देवराज इंद्र ने वरदान दिया था कि जो तुम्हे तपस्या से जगायेगा वह भस्म हो जायेगा।

श्री कृष्ण को यह पता था। वह गुफा के अंदर गए और और उन्होंने राजा पर अपना पीताम्बर डाल दिया। इधर कालयवन भगवन के पीछे पीछे दौड़ा आया और यही उसने उन्हें रणछोड़ के नाम से पुकारा। कालयवन भी गुफा में घुसा और उसने ऋषि की तपस्या भंग कर दी। ऋषि के तपस्या से उठते ही वह भस्म हो गया। यहीं से श्री कृष्ण को रणछोड़ नाम मिला। यहां श्री कृष्ण का 5 हजार वर्ष पुराना मंदिर भी बना हुआ है।

यहां श्री कृष्ण का 5 हजार वर्ष पुराना मंदिर भी बना हुआ है।
यहां श्री कृष्ण का 5 हजार वर्ष पुराना मंदिर भी बना हुआ है।

बिजनौर में दुर्योधन का छप्पन भोग छोड़ खाया था बथुए का साग

बिजनौर की विदुर कुटी का पौराणिक महत्व है। इसका वर्णन महाभारत में भी मिलता है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार मनाने के लिए देश के कोने-कोने से लोग यहां आते हैं। विदुर कुटी के बारे में कहावत है कि भगवान श्री कृष्ण विदुर कुटी पर विदुर काका से मिलने आए थे। महाभारत में वर्णित पंक्ति‘दुर्योधन की मेवा त्यागी, साग विदुर घर खायो' इसी ऐतिहासिक स्थल से जुड़ी है। बताया जाता है कि महाभारत के युद्ध से पहले धृतराष्ट्र ने विदुर से महाभारत का युद्ध टालने के लिए नीति बताने का अनुरोध किया था।

हालांकि, धृतराष्ट्र पुत्र मोह में फंसकर उस नीति को नहीं अपना सके। जिसका परिणाम महाभारत का युद्ध हुआ। इसके बाद महात्मा विदुर हस्तिनापुर छोड़कर गंगा के किनारे एक टापू पर अपनी कुटिया बनाकर रहने लगे। यही कुटिया बाद में विदुर कुटी के नाम से प्रसिद्ध हुई। युद्ध के पहले श्री कृष्ण दुर्योधन का 56 भोग का व्यंजन छोड़ कर विदुर कुटी पर उनसे मिलने पहुंचे थे और यहां बथुए का साग खाया था।

इस स्थान पर 12 महीने बथुआ खिला रहता है। बथुए के साग से विदुर कुटी हरी भरी रहती है। विदुर कुटी से गंगा की धारा लगभग एक किलोमीटर दूर बह रही है लेकिन वर्ष में एक बार विदुर की तपोस्थली को स्पर्श करने के लिए गंगा एक बार यहां अवश्य आती है।

विदुर कुटी से गंगा की धारा लगभग एक किलोमीटर दूर बह रही है लेकिन वर्ष में एक बार विदुर की तपोस्थली को स्पर्श करने के लिए गंगा एक बार यहां अवश्य आती है।
विदुर कुटी से गंगा की धारा लगभग एक किलोमीटर दूर बह रही है लेकिन वर्ष में एक बार विदुर की तपोस्थली को स्पर्श करने के लिए गंगा एक बार यहां अवश्य आती है।
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