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  • 75 Independence Day This Movement Of Farmers Had Changed The Attitude Of The Freedom Struggle, Instead Of Being Limited To Talukdars And Zamindars, Congress Had Formed Annadata workers' Party.Munshiganj Massacre

रायबरेली में भी हुआ था जलियांवाला बाग जैसा कांड:निहत्थे किसानों पर अंग्रेजों ने बरसाई थी गोलियां, 750 से ज्यादा लोग हुए थे शहीद; पं. नेहरू का बयान आज भी यहां दर्ज है...

लखनऊ5 महीने पहले
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आज पूरा देश आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है। इतिहास के आइने में तमाम आंदोलन दर्ज हैं, जो आजादी दिलाने में सहायक बने। उनमें से एक रायबरेली जिले में मुंशीगंज किसान आंदोलन है। यहां शहीद किसानों की याद में स्मारक है, जो अंग्रेजों के जुल्म और सितम के काले अध्याय के विरुद्ध भारतीय किसानों के बलिदान की याद दिलाता है।

इस माटी में देश के उस किसान आंदोलन की खुशबू है, जिसने अंग्रेजी हुकूमत की जड़े हिला दी थी। भारतीय किसानों के इस आंदोलन को मुंशीगंज गोलीकांड का नाम दिया गया। कई जानकर इसे जलियांवाला बाग कांड से भी बड़े हत्याकांड का दर्जा देते है।

कहा जाता है कि अंग्रेजी शासन के हुक्म से सभा में मौजूद सैकड़ों निहत्थे और बेकसूर किसानों पर पुलिस बलों द्वारा गोलियों की बौछार कर दी गई। इसके बाद सई नदी की धारा किसानों के खून से रक्त रंजित हो उठी। 750 से ज्यादा किसान मारे गए थे और 1500 से ज्यादा घायल हुए थे।

राष्ट्र के लिए सैकड़ों किसानों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। देश की स्वतंत्रता के अमृत वर्ष के अवसर पर भारतीय किसानों के उस अदम्य साहस और शौर्य की अमर गाथा मुंशीगंज गोली कांड के कुछ अनछुए पहलुओं से दैनिक भास्कर आपको रूबरू करा रहा है।

7 जनवरी 1921 का वो काला दिन...

जलियांवाला बाग कांड की तरह ही रायबरेली में भी अंग्रेजों ने निहत्थों पर गोलियां बरसाईं थी। यहां शहीदों की याद में मुंशीगंज में स्मारक बना हुआ है।
जलियांवाला बाग कांड की तरह ही रायबरेली में भी अंग्रेजों ने निहत्थों पर गोलियां बरसाईं थी। यहां शहीदों की याद में मुंशीगंज में स्मारक बना हुआ है।

रायबरेली जिले में शहर के एक क्षोर पर स्थित मुंशीगंज कस्बा सई नदी के तट पर बसा है। 5 जनवरी 1921 को किसान तत्कालीन कांग्रेस शासकों के अत्याचारों से तंग आकर, अमोल शर्मा और बाबा जानकी दास के नेतृत्व में एक जनसभा कर रहे थे। दूर-दूर के गांव के किसान भी सभा में भाग लेने के लिए आए थे। इस जनसभा को असफल करने के मकसद से तालुकेदार ने तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर एजी शेरिफ से मिलकर दोनों नेताओं को गिरफ्तार करवा कर लखनऊ जेल भिजवा दिया।

दोनों नेताओं की गिरफ्तारी के अगले ही दिन रायबरेली में लोगों के बीच तेजी से यह खबर फैल गई कि लखनऊ के जेल प्रशासन द्वारा दोनों नेताओं की हत्या करवा दी गई है। इसके चलते 7 जनवरी 1921 को रायबरेली के मुंशीगंज में सई नदी के तट पर अपने नेताओं के समर्थन में एक विशाल जनसमूह एकत्रित होने लगा। किसानों के भारी विरोध को देखते हुए नदी किनारे बड़ी मात्रा में पुलिस बल तैनात कर दिया गया था।

मुंशीगंज का शहीद स्मारक।
मुंशीगंज का शहीद स्मारक।

नहीं पहुंच पाएं थे जवाहर लाल नेहरु

शहीद स्मारक में नेहरु का शिलापट।
शहीद स्मारक में नेहरु का शिलापट।

रायबरेली में उपजे हालात की गंभीरता को भांपते हुए जवाहरलाल नेहरू ने भी मुंशीगंज का रुख किया। लेकिन पहुंचने से पहले ही उन्हें कलेक्ट्रेट परिसर के नजदीक ही उन्हें रोक दिया गया। अंग्रेजी शासन ने सभा में मौजूद किसानों पर पुलिस बलों द्वारा गोलियों की बौछार करा दी। इसके बाद सई नदी की धारा किसानों के खून से लाल हो गई। 750 से ज्यादा किसान इस नरसंहार में मारे गए थे और 1500 से ज्यादा हताहत हुए थे।

किसानों ने लिखी थी अजर अमर की गाथा

शहीद स्मारक परिसर में भारत माता मंदिर।
शहीद स्मारक परिसर में भारत माता मंदिर।

यहां के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी संगठन के प्रभारी अनिल मिश्रा कहते हैं कि मुंशीगंज गोलीकांड भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऐतिहासिक परिस्थितियों की वह अंगड़ाई थी, जिसे सई का जल और सैकड़ों किसानों का तर्पण प्राप्त हुआ। इसलिए यह कांड उस काल से ही जंगे आजादी की अजर अमर गाथा बन गया।

मुंशीगंज गोली कांड ने बदली जंगे आजादी की दिशा व दशा

मुंशीगंज का शहीद स्मारक परिसर।
मुंशीगंज का शहीद स्मारक परिसर।

स्थानीय राजनीतिक जानकार विजय विद्रोही कहते हैं कि मुंशीगंज गोलीकांड कई मायनों में बेहद खास है। इसकी तुलना अन्य किसी आंदोलन से करना भी उचित नहीं होगा। हालांकि, यह बात सही है कि मुंशीगंज गोलीकांड को स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में वह दर्जा नहीं मिल सका, जिसका यह हकदार रहा। लेकिन जंगे आजादी की दिशा और दशा बदलने में यह जरूर कामयाब रहा।

मुंशीगंज गोली कांड का ही नतीजा रहा कि गुलामी के खिलाफ अंग्रेजों के विरुद्ध बिगुल फूंक चुकी कांग्रेस सिर्फ तालुकेदार और जमींदारों तक सीमित न रहकर अन्नदाता और मजदूरों की पार्टी का रूप ले चुकी थी। यही आंदोलन रहा जिसके कारण स्वाधीनता संग्राम में आम जनमानस की सहभागिता बढ़ी और आगे चलकर 1947 में स्वाधीनता का लक्ष्य प्राप्ति पूरा हो सका।

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