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भीम' के जरिये 'राजभर' वोट पर माया का निशाना:भीम राजभर को आगे कर रामअचल व सुखदेव की कमी को दूर करने की पहल, राजभर समाज के पास 4 % वोट

लखनऊ10 दिन पहले
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भीम राजभर के माध्यम से राजभर वोट साधने की राजनीति - Dainik Bhaskar
भीम राजभर के माध्यम से राजभर वोट साधने की राजनीति

विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही उप्र में जातीय गणित को साधने में राजनीतिक दल जुट गए हैं। इस खेल की पुरानी महारथी मायावती ने भी पूर्वांचल से आने वाले राजभर वोट बैंक को साधना शुरू कर दिया है। मऊ से बाहुबली मुख्तार का टिकट काटकर वहां बसपा के प्रदेश अध्यक्ष भीम राजभर को टिकट दिया है। टिकट देना तो एक बानगी भर है, दरअसल माया इस बहाने कई निशाने एक साथ साध रहीं हैं। इसमें पहला कि वह यह संदेश देना चाहती हैं कि उनकी पार्टी में बाहुबलियों-दागियों के लिए कोई जगह नहीं है, दूसरा और सबसे बड़ा दांव यह है कि मायावती इस बहाने अपने पुराने राजभर वोट बैंक का विश्वास फिर से जीतना चाहती हैं। यही वजह है कि वह लगातार भीम राजभर को प्रमोट कर रही हैं।

कभी राजभर वोट बैंक पर था बसपा का एकाधिकार

दरअसल, कभी राजभर वोट माया का हुआ करता था। लेकिन कुछ चुनाव से यह माया से दूर चला गया है। इसकी बड़ी वजह इस समाज से आने वाले नेताओं की माया से दूरी है। कुछ को माया ने निकाल दिया तो कुछ लोग खुद की पार्टी बनाकर बीजेपी के साथ हो लिए। राजभर समाज की आबादी पर नजर डालें तो यूपी में यह करीब 4 फीसदी से ज्यादा हैं। एक समय बसपा के पास ओम प्रकाश राजभर, सुखदेव राजभर, राम अचल राजभर समेत कई बड़े नेता थे।

कुछ दूर हुए, कुछ को अलग किया

मौजूदा समय में राजभर समाज के सबसे बड़े नेता होने का दावा करने वाले ओम प्रकाश राजभर कभी मायावती के साथ थे। लेकिन अब अलग होकर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) बना ली है। इसके अलावा सुखदेव राजभर बुजुर्ग होने के साथ राजनीति से कटते गए। इसके बाद बड़ा नाम राम अचल राजभर का था, जिनको मायावती ने प्रदेश अध्यक्ष और राष्ट्रीय महासचिव जैसा पद देने के अलावा कई बड़ी जिम्मेदारियां दीं। लेकिन, हाल ही में मायावती ने उन्हें भी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। अंतिम समय में सुखदेव राजभर ने भी बसपा को मिशन से भटकने का आरोप लगाते हुए राजनीति से संन्यास का ऐलान कर दिया है। यहां तक की अखिलेश की तारीफ करते हुए अपने बेटे पप्पू को सपा में शामिल करवा दिया। ऐसे में माया के पास बड़े चेहरे का अभाव हो गया था। मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने भीम राजभर को चेहरा बनाना शुरू कर दिया है। यही वजह है कि चुनाव के समय टिकट देने वाली माया ने इस बार बहुत पहले ही उनको प्रत्याशी बना दिया है।

ओम प्रकाश की गलतियों का फायदा मिल सकता है

बसपा को इसमें सबसे ज्यादा कामयाबी ओम प्रकाश राजभर की कमियों के कारण मिलेगी। वह बड़ा चेहरा थे लेकिन अपनी गलतियों से वह साख खोते जा रहे हैं। कभी बीजेपी को कोसने वाले ओमप्रकाश राजभर अगले ही पल बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष के साथ चाय पीते नजर आते हैं। इसकी वजह से उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता कम होती जा रही है। यहां तक की उनके साथी भी अब उनसे किनारा करने लगे हैं। अब बसपा की कोशिश है कि भीम राजभर को आगे राजभर समाज के एक बड़े वोट बैंक को अपने पाले में लाया जाए।

तीन दशक से कर रहे बसपा की राजनीति

भीम राजभर के पक्ष में जो बात सबसे ज्यादा जाती है वह है पार्टी के प्रति उनकी वफादारी। पिछले तीन दशक से वह बसपा की राजनीति कर रहे हैं। पिछले एक दशक में लगातार कमजोर होती बसपा का साथ बड़े-बड़े नेताओं ने छोड़ दिया, वहीं भीम राजभर अभी भी मायावती और पार्टी के साथ खड़े हैं। उनकी इमेज फायरब्रांड नेता के रूप में रही है। प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद से वे लगातार सभी जिलों में मीटिंग और सम्मेलनों में जा रहे हैं। बेदाग छवि वाले भीम राजभर एकमात्र ऐसे नेता हैं जिन्होंने मुख्तार अंसारी को कड़ी टक्कर दी थी। मुख्तार को 2012 में भीम राजभर के आगे पसीने आ गए थे। मात्र 6 हजार वोट से ही जीत दर्ज कर पाए थे। यह मुख्तार की अब तक की सबसे कम अंतर से जीत दर्ज करने का रिकॉर्ड है। ऐसे में बसपा की पूरी कोशिश होगी कि राजभर समाज को भीम राजभर के जरिए एक बार फिर से बसपा के पाले में लाया जाए।

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