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वर्ल्ड सेप्सिस डे की पूर्व संध्या पर KGMU में मंथन:हार्टअटैक व कैंसर के बाद सेप्सिस मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण,डॉक्टरों ने एंटीबायोटिक से चेताया,बोलें - बेवजह इस्तेमाल पर लगे रोक

लखनऊ8 महीने पहले
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बोले KGMU के विशेषज्ञ - दुनियाभर में हार्टअटैक व कैंसर के बाद सेप्सिस मौतों का तीसरा सबसे बड़ा कारण है - Dainik Bhaskar
बोले KGMU के विशेषज्ञ - दुनियाभर में हार्टअटैक व कैंसर के बाद सेप्सिस मौतों का तीसरा सबसे बड़ा कारण है

लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल विश्वविद्यालय में वर्ल्ड सेप्सिस डे की पूर्व संध्या पर चिकित्सकों ने एंटीबायोटिक दवाओं को लेकर अलर्ट करते दिखे।केजीएमयू के विशेषज्ञों के अनुसार मौजूदा वक्त में हार्ट अटैक और कैंसर के बाद सेप्सिस दुनिया में तीसरी सर्वाधिक मौतों की वजह है और सेप्सिस होने के कारण एंटीबायोटिक दवाओं का प्रयोग बताया।यही कारण रहा कि चिकित्सकों ने देशभर में एंटीबायोटिक दवाओं का बेवजह इस्तेमाल के चलन पर तत्काल रोक लगाने की मांग की।डॉक्टरों ने चेताया कि यदि इसे नहीं रोका गया तो वह दिन दूर नहीं, जब भारत में सर्वाधिक मौतें सेप्सिस के चलते होंगी।

गंभीर है सेप्सिस का खतरा, नही कर सकते नजर अंदाज

KGMU में पल्मोनरी एंड क्रिटिकल केयर मेडिसिन के विभागाध्यक्ष डा. वेद प्रकाश ने बताया कि आइसीयू के कुल मरीजों में 60 - 70 फीसद मरीज सेप्सिस के शिकार हैं। इनमें सबसे ज्यादा 35 फीसद मरीज रेस्पिटरेट्री सेप्सिस यानी सांस रोग संबंधी संक्रमण व 25 फीसद मरीज यूरो सेप्सिस यानी मूत्र संबंधी संक्रमण से पीड़ित हैं।उन्होंने दावा कि KGMU से लेकर SGPGI व लोहिया संस्थान के अलावा सभी अस्पतालों के आइसीयू में भर्ती विभिन्न बीमारियों के मरीजों में सबसे बड़ी वजह सेप्सिस है।

घातक है एंटीबायोटिक व पेन किलर दवाओं की लत

डा. वेद के अनुसार कोरोना काल में भी फेफड़ों और मूत्र संबंधी सेप्सिस से ज्यादा मौतें हुईं।सेप्सिस पर नियंत्रण नहीं मिलने पर शरीर के अन्य अंग भी फेल होने लगते हैं।नतीजतन मरीज की मौत हो जाती है।इन सबके पीछे सबसे बड़ी वजह एंटीबायोटिक व दर्द निवारक दवाओं का जरूरत से अधिक प्रयोग व डाक्टरों व मरीजों की अनभिज्ञता है।विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में यह स्थिति और ज्यादा भयावह है।

ग्रामीणों इलाकों में ज्यादा खतरा,झोलाछाप बढ़ा रहे सेप्सिस

ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरों तक क्लीनिक, नर्सिंग होम व छोटे-छोटे अस्पताल चला रहे झोलाछाप डाक्टरों व बगैर फार्मासिस्ट चल रहे मेडिकल स्टोर संचालकों ने सेप्सिस के खतरे को सबसे ज्यादा बढ़ाया है।जिन बीमारियों में कम डोज वाली एंटीबायोटिक व बिना एंटीबायोटिक के काम चल सकता है, वहां भी इसके प्रभावों से अनभिज्ञ चिकित्सक पहली ही बार में एंटीबायोटिक की हाई डोज दे रहे हैं।इसके अलावा लोग जरा से जुकाम-बुखार या हल्की फुल्की चोट में कई बार सीधे मेडिकल स्टोर से ही कोई भी एंटीबायोटिक दवाएं खरीद लाते हैं।यह स्थिति और भी घातक है।

बिना डाक्टर के परामर्श के न करे एंटीबायोटिक

जब कोई कुशल डाक्टर तीन या पांच दिन दवा लिखे तो मरीज खुद से एक-दो दिन कम या उससे अधिक दिन तक बची हुई दवा खाने का प्रयास करता है।यह दोनों स्थिति घातक हो सकती है।अगर परामर्श से कम दिन दवा ली तो बचे हुए वायरस बैक्टीरिया बाद में शरीर में रजिस्ट्रेंस पावर विकसित कर लेते हैं।ऐसे में फिर कभी दिक्कत होने पर वह दवाएं काम नहीं करेंगी।वहीं परामर्श से अधिक समय तक दवा लेने से सेप्सिस का खतरा और बढ़ेगा इसलिए खुद से एंटीबायोटिक का इस्तेमाल न करें।इस दौरान प्रो.बीएन प्रसाद ने कहा कि अस्पतालों में साफ-सफाई न होना व उपकरणों का संक्रमण भी सेप्सिस की बड़ी वजह है।वहीं यूरोलोजी विभाग के प्रो. अपुल गोयल के मुताबिक ओल्ड ऐज,शुगर, मोटापा, कैंसर व कीटनाशकों और रसायनों का अधिक प्रयोग भी सेप्सिस के बढ़ते खतरे का कारण है।

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