लखनऊ हाईकोर्ट की खबरें:मुख्य स्थायी अधिवक्ता चतुर्थ भईयालाल वर्मा हटाए गए; पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्या से है नजदीकी

लखनऊ4 महीने पहले
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राज्य सरकार ने हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में नियुक्त मुख्य स्थायी अधिवक्ता चतुर्थ भईयालाल वर्मा को तत्काल प्रभाव से हटा दिया है। उनकी पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्या से करीबी बताई जाती है। यह आदेश न्याय विभाग के अनुसचिव विनय कुमार पाठक ने जारी किया। आदेश में कहा गया कि भईयालाल की नियुक्ति तत्काल प्रभाव से समाप्त की जाती है।

सरकार ने मंगलवार को अपर महाधिवक्ता ज्योति सिक्का और स्थायी अधिवक्ता अमित मिश्रा को भी हटा दिया था। इससे पहले सरकार ने अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता एचपी श्रीवास्तव और कुछ अन्य सरकारी अधिवक्ताओं को भी हटा दिया था।

इस बीच सचिवालय में ब्रीफ होल्डरों की चल रही स्क्रीनिंग को लेकर अवध बार एसोसिएशन के महासचिव अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी ने जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस सुभाष त्रिपाठी की पीठ के सामने आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने कहा कि ब्रीफ होल्डर्स हाईकोर्ट में ऑफिसर ऑफ कोर्ट माने जाते हैं। ऐसे में उनको सचिवालय में बुलाकर उनका इंटरव्यू लेना वकालत पेशे की गरिमा को गिराने वाला है। उन्होंने कहा कि अगर राज्य सरकार किसी भी सरकारी अधिवक्ता के कामकाज से संतुष्ट नहीं है, तो उसे अधिकार है कि वह उसे अपने पैनल से हटा दे। मगर, इस प्रकार स्क्रीनिंग कर यदि उनके खिलाफ कार्यवाही की गई, तो इससे उनके भविष्य की संभावनाओं पर विपरीत असर पड़ेगा। उन्होंने मांग किया कि सरकार तत्काल इस प्रकार की गतिविधि पर रोक लगाए। पीठ ने इस पर मुख्य स्थायी अधिवक्ता जेके सिन्हा को बुलाकर ब्रीफ होल्डरों को सचिवालय में बुलाकर उनका इंटरव्यू लेने के प्रति नाखुशी जाहिर किया। सुनवाई के दौरान सैकड़ों अधिवक्ता कोर्ट में मौजूद थे।

# सांडी पक्षी विहार की बदहाली दूर करने का हरदोई के DM को आदेश

हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने हरदोई के सांडी पक्षी विहार की बदहाली को लेकर दाखिल एक जनहित याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट ने जिलाधिकारी, हरदोई को आदेश दिया है कि वह झील और पक्षी विहार के बेहतर रख-रखाव के लिए वन विभाग के अधिकारियों और अन्य विभागों के अधिकारियों में सामंजस्य बनाएं। इसके साथ ही कोर्ट ने फॉरेस्ट कंजर्वेटर (इनडेंजर्ड प्रोजेक्ट्स) को भी अगली सुनवाई पर हाजिर होने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 9 मई को होगी।

यह आदेश न्यायमूर्ति डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की खंडपीठ ने इनर व्हील क्लब की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर पारित किया। याचिका सांडी पक्षी विहार में स्थित झील, पक्षियों के बॉयो डाइवर्सिटी और वाइल्ड लाइफ के प्रति लापरवाही को लेकर दाखिल की गई है। याचिका में कहा गया है कि वहां 3.084 वर्ग किलोमीटर की एक झील है, जिसमें काफी मात्रा में पानी है। मगर, अधिकारियों की लापरवाही के कारण न सिर्फ झील की, बल्कि पक्षी विहार की भी स्थिति खराब हो रही है। सुनवाई के दौरान कोर्ट के संज्ञान में लाया गया कि झील में पास में ही बहने वाली गर्रा नदी से पानी पहुंचाने के लिए लिफ्ट नहर के इस्तेमाल का भी प्रयास किया गया। मगर, बिजली का इतना वोलेटेज ही नहीं रहता कि ऐसा किया जा सके। वहीं यह भी संज्ञान में लाया गया कि यहां एक सरकारी मॉटेल भी बनाया गया था। मगर, इसे कभी संचालित ही नहीं किया गया। कोर्ट ने इस पर भी जवाब मांगा है।

# पॉक्सो एक्ट के मामले में वादी को नोटिस प्राप्त न कराने पर हाईकोर्ट सख्त

हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने पॉक्सो एक्ट के एक जमानत मामले में वादी को नोटिस प्राप्त न कराने पर सख्त रुख अपनाते हु, एसपी गोंडा को तलब कर लिया। कोर्ट के आदेश पर हाजिर हुए एसपी ने बताया कि उन्होंने सम्बंधित सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी है। वहीं कोर्ट के संज्ञान में यह भी आया कि इस मामले में शासकीय अधिवक्ता के एक कर्मचारी भी लापरवाही रही। न्यायालय के सख्त रुख को देखते हुए आश्वासन दिया गया कि उक्त कर्मचारी के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की जाएगी।

इसके पहले न्यायमूर्ति राम कृष्ण गौतम की एकल पीठ के समक्ष हाजिर हुए गोंडा के एसपी संतोष कुमार मिश्रा ने अपनी टीम की लापरवाही के लिए बिना शर्त माफी मांगी। उन्होंने कोर्ट को बताया कि जिस सब-इंस्पेक्टर की नोटिस प्राप्त कराने की जिम्मेदारी थी, उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी गई है। हालांकि सुनवाई के दौरान कोर्ट में हाजिर हुए संयुक्त निदेशक, अभियोजन ललित मुद्गल ने कोर्ट को बताया कि बाद में नोटिस प्राप्ति की सूचना शासकीय अधिवक्ता के कार्यालय में प्राप्त करा दी गई थी। लेकिन मनीष श्रीवास्तव नाम के एक कर्मचारी की लापरवाही की वजह से उसे कोर्ट में नहीं पेश किया जा सका। कोर्ट को बताया गया कि मनीष श्रीवास्तव के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है, लेकिन कोर्ट इससे संतुष्ट नहीं हुई। कोर्ट ने कहा कि सर्विस ऑफ नोटिस जैसी तुच्छ बात के लिए इतना समय बर्बाद हुआ। इसके बावजूद उक्त कर्मचारी को सिर्फ कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।

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