लखनऊ हाईकोर्ट की बड़ी खबरें:जेल में लंबे समय तक बंद रहने से ही जमानत नहीं मिल जाती; तथ्य और परिस्थितियां भी होनी चाहिएं

लखनऊ6 महीने पहले
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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने अंडर ट्रायल अभियुक्त के जमानत के बारे में बड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि अभियुक्त का लंबे समय से जेल में बंद होना मात्र जमानत का आधार नहीं होता। कोर्ट ने कहा कि यह जमानत का एक आधार हो सकता है, लेकिन मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है। यह आदेश जस्टिस राजेश सिंह चौहान की एकल पीठ ने गोविंद की जमानत याचिका को खारिज करते हुए दिया। याची पर एक 8 साल की बच्ची के साथ ओरल सेक्स करने का आरोप है।

याची के अधिवक्ता बीएम सहाय ने दलील दी कि मामला 2017 का है। अभियुक्त 1 सितंबर 2017 से जेल में है। इस प्रकार अभियुक्त 4 साल और 7 महीने जेल में बिता चुका है। बहस के दौरान यह भी दलील दी गई कि वास्तव में वर्तमान मामला मकान मालिक और किराएदार के बीच विवाद का है। पीड़िता के माता-पिता अभियुक्त के घर में किराएदार थे।

राज्य सरकार की ओर से जमानत का विरोध किया गया। कोर्ट ने अभियुक्त की ओर से दी गई दलीलों को खारिज करते हुए पॉक्सो की धारा 4(2) को उद्धत किया। जिसमें 16 साल से कम के बच्चे के साथ सेक्स में न्यूनतम 20 साल की सजा का प्रावधान है। उल्लेखनीय है कि सजा का उक्त प्रावधान 2019 में लागू किया गया था।

# अपर महाधिवक्ता ज्योति सिक्का को सरकार ने हटाया; शासन में शुरू हुए सरकारी वकीलों के इंटरव्यू

योगी सरकार की दूसरी पारी शुरू होते ही हाईकोर्ट के सरकारी वकीलों पर गाज गिरना शुरू हो गई है। मंगलवार को सरकार ने लखनऊ पीठ में आबद्ध अपर महाधिवक्ता ज्योति सिक्का की आबद्धता तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी है। वहीं सरकार ने स्थाई अधिवक्ता अमित शर्मा की नियुक्ति भी तत्काल प्रभाव से समाप्त करने का आदेश जारी किया है।

यह आदेश शासन के विशेष सचिव प्रफुल्ल कमल ने जारी किया। महाधिवक्ता को प्रेषित अपने आदेश में उन्होंने कहा है कि इन सरकारी अधिवक्तागणों की नियुक्ति पूर्व में की गई थी किंतु अब सरकार उक्त पदों पर उनकी आबद्धता समाप्त कर रही है। उल्लेखनीय है कि महाधिवक्ता राघवेंद्र सिंह के बारे में चर्चा है कि उन्होंने महाधिवक्ता कार्यालय खाली कर दिया है और अपनी गाड़ी और स्टाफ भी वापस कर दिया है। नए महाधिवक्ता की नियुक्ति की चर्चा के कयास कई दिनों से लगाए जा रहे हैं। इस बीच शासन के निर्णयों ने सरकारी वकीलों के बीच खलबली मचा दी है। एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में तमाम सरकारी वकीलों को मंगलवार को सचिवालय के न्याय विभाग में बुलाकर उनका इंटरव्यू लिया गया। कोर्ट में चर्चा है कि शासन में अपर महाधिवक्ता स्तर तक के सभी सरकारी वकीलों को बुलाकर उनका इंटरव्यू लिया जाएगा और तत्पश्चात उनकी आबद्धता को आगे जारी रखने पर निर्णय होगा।

# हाईकोर्ट का फर्जी आदेश बनाने के मामले में दोषियों की अपील खारिज

दहेज हत्यारोपी को हाईकोर्ट के फर्जी जमानत आदेश से रिहा कराने के आरोपियों फैयाज अहमद खान, ओम प्रकाश पांडे, रामकिशोर और सांवल प्रसाद मिश्र की अपराधिक अपीलों को निरस्त कर दिया गया। सीबीआई की विशेष न्यायाधीश मीना श्रीवास्तव ने निचली अदालत के निर्णय की पुष्टि करते हुए न्यायालय में हाजिर सांवल प्रसाद मिश्रा को जेल भेज दिया है। जबकि फैयाज अहमद खान, ओम प्रकाश पांडे एवं रामकिशोर के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया है।

सीबीआई के अनुसार जनपद गोंडा की फास्ट ट्रेक कोर्ट में सरकार बनाम अवधेश कुमार के नाम से दहेज हत्या का मुकदमा चल रहा था। इस मुकदमे में आरोपी रामकिशोर की जमानत नहीं हो रही थी। इसके बाद सभी आरोपियों ने षडयंत्र कर के 2 मई, 2002 की तिथि में न्यायमूर्ति वीरेंद्र सरन के नाम से फर्जी एवं कूट रचित आदेश बनाकर 22 जुलाई, 2002 को जमींदार ओमप्रकाश एवं प्रेमनाथ की जमानत पर रिहा करा लिया।

फर्जी जमानत से जेल से बाहर आने की सूचना पर वादी अवधेश कुमार ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। इस पर 27 अगस्त, 2004 को हाईकोर्ट ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट गोंडा को मुकदमा दर्ज कराने का आदेश दिया। इसके बाद हाईकोर्ट के आदेश पर 22 जुलाई, 2005 को इस मामले को सीबीआई को सौंपा गया। विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रदूषण) द्वारा सभी आरोपियों को 28 सितंबर, 2019 को कारावास एवं अर्थदंड की सजा से दंडित किया था। जिस पर सभी आरोपियों ने सत्र अदालत के समक्ष अपील दायर की थी। जिसे विशेष न्यायाधीश सीबीआई द्वारा पोषणीय न पाते हुए खारिज कर दिया।

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