अयोध्या राजनीतिक ब्रांड का अड्‌डा, विपक्षी दल का बना केंन्द्र:केन्द्रीय मंत्री कौशल किशोर का तंज : ओवैसी अयोध्या जा रहे तो रामलला के दर्शन करें, तब ही यात्रा सफल होगीं

लखनऊ5 महीने पहले
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कहीं न कहीं भाजपा के पीच पर विपक्षी दल अगामी 2022 चुनाव लड़ने की तैयारी में अयोध्या को राजनीति ब्रांड मान बैठे हैं - Dainik Bhaskar
कहीं न कहीं भाजपा के पीच पर विपक्षी दल अगामी 2022 चुनाव लड़ने की तैयारी में अयोध्या को राजनीति ब्रांड मान बैठे हैं

एक बार फिर अयोध्या उत्तर प्रदेश के चुनाव के लिए राजनीतिक केन्द्र बन गया है। 37 साल पहले से भाजपा का मुख्य केन्द्र रहा अयोध्या अब विपक्षी दलों के लिए चुनावी यात्रा और चुनावी समीकरण पर मंथन करने का अड्डा बनता हुआ नजर आ रहा हैं। सपा-कांग्रेस और बसपा के बाद अन्य छोटे -बडे़ दल अपना राजनीतिक चुनावी शुरुआत अयोध्या से करने से गुरेज नहीं कर रहे हैं। मुस्लिम के लिए खुलकर बोलने वाले ओवैसी अपनी तीन दिसवीय चुनावी यात्रा अध्योया से शुरु करने के ऐलान के बाद यह चर्चा तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने अयोध्या को अपना केन्द्र बना लिया हैं। वहीं केन्द्रीय राज्यमंत्री कौशल किशोर ने AIMIM प्रमुख असादुदीन ओवैसी के अयोध्या जाने पर बोले हम कहते राम नगरी जाने वाले को राम लला के जरुर दर्शन करना चाहिए।

बीते एक महीने से सभी दल अयोध्या में हुए सक्रियता

बीएसपी के प्रबुद्ध सम्मेलन में जय श्रीराम : 23 जुलाई 2021 को बसपा के महासचिव सतीश चन्द्र मिश्र ने 2022 के चुनाव को लेकर बसपा पूरे प्रदेश में अनुसूचित जातियों के साथ ब्राह्मणों के वोट बैंक को जिताने के लिए सम्मेलन की शुरुआत अयोध्या से की। बीएसपी नेता सतीश चंद्र मिश्रा ने अयोध्या से ही अपनी पार्टी के प्रबुद्ध सम्मेलन में जय श्रीराम की नारे लगे थे। ब्राह्मण समुदाय के लिए खास तौर से अयोध्या की अहमियत रही है।

मंदिर बनने के बाद दर्शन करने जाएंगे अखिलेश - समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव साल 2020 के 15 दिसंबर को अयोध्या गए थे। अयोध्या विधानसभा से पहली बार विधायक बने सपा सरकार में मंत्री रहे पवन पांडेय ज्यादा ही सक्रिय दिखाई देते हैं। ऐसे में अखिलेश यादव ने बीते दिनों एक बयान दिया था जब राम मंदिर बन जाएगा तब राम लला के दर्शन करने अयोध्या जाएंगे और दक्षिणा भी चढ़ाएंगे। वही 2022 चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी ने भी ब्राह्मणों को बढ़ावा देने क समाजवादी पार्टी ने भी ब्राह्मण समाज के वोट बैंक को बढ़ाने के लिए एक समिति का गठन किया है।

कांग्रेस का घोषण पत्र बनाने पहुंचे पूर्व केन्द्रीय मंत्री : उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव को लेकर सभी पार्टियां अपने दावे कर रहे हैं तो वहीं इस बार कांग्रेसी पीछे नहीं है। कांग्रेस के मुताबिक उत्तर प्रदेश की घोषणा पत्र को तैयार किया जा रहा है। 15 दिन पहले इस घोषणापत्र में अयोध्या के मुद्दों को शामिल करने की योजना तैयार की है। जिसके लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद भी अयोध्या पहुंचे थे और चौपाल लगाकर स्थानीय लोगों से भी बातचीत किया।

आप की तिरंगा यात्रा की शुरुआत : आम आदमी पार्टी भी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर तैयारियां कर रहा है। दिल्ली के तर्ज पर उत्तर प्रदेश में सुविधाओं को देने का दावा कर रही है लेकिन इस बार अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शुरू हो चुका है। 14 सितंबर को आप तिंरगा यात्रा की शुरुआत करने से पहले रामलला के दर्शन भी करेगी।

छोटे दल खेल बिगाड़ने के लिए सक्रिय: उत्तर प्रदेश में भाजपा, कांग्रेस, सपा और बसपा के साथ-साथ अब अन्य छोटी पार्टियां भी अपने आप को प्रदर्शित करने के लिए अयोध्या की तरफ कुंच कर दिया है। जनसत्ता दल लोकतांत्रिक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया भी अयोध्या पहुंचें। जहां पर राम लला का दर्शन कर 2022 चुनाव को लेकर जन सेवा संकल्प यात्रा की शुरुआत की। तो वहीं दूसरी तरफ असदुद्दीन ओवैसी अयोध्या में बनने वाली मस्जिद से कुछ ही दूरी पर 7 सितंबर को मुस्लिम समाज को लेकर कार्यकर्ता सम्मेलन करेंगे। ओवैसी ने भी 2022 चुनाव में उत्तर प्रदेश में लड़ने का दावा किया है उसको लेकर अब अयोध्या में मुस्लिम संगठनों को तैयार करने के लिए पहुंचेंगे।

22 से ज्यादा बार आ चुके सीएम योगी
यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद करीब 22 बार से ज्यादा अयोध्या आ चुकें है। यहीं नहीं प्रदेश और केन्द्र सरकार के मंत्री भी अयोध्या दौरे करने में पीछे नहीं रहते हैं। इससे बीजेपी के लिए इस जगह की अहमियत का अंदाजा लगाया जा सकता है। दूसरी पार्टियां के लिए भी अयोध्या महत्वपूर्ण है और वे इसे भुनाने की कोशिश में दिख रही हैं। 2022 का विधानसभा चुनाव जीतने के लिए अयोध्या में मजबूत मौजूदगी सभी के लिए अहम है।

जातीय समीकरण पर अयोध्या की राजनीति ही तोड़
वर्ष 1991 में पहली बार भाजपा की सरकार राम मंदिर मुद्दे के सहारे ही बनी लेकिन 1993 में जातीय समीकरण ने भावनाओं के ज्वार को तोड़ दिया और भाजपा 177 सीटों पर अटक गई। तब भी भावनाओं का ज्वार था लेकिन सपा-बसपा के साथ आने से यह परवान नहीं चढ़ सका। राजनीति के जानकार कहते हैं कि मौजूदा हालात में जातीय समीकरणों का पलड़ा सियासी समर में भारी रहता है। अगर भावनाओं का ज्वार असर किया तो निःसंदेह पार्टी को लाभ मिल सकता है लेकिन भाजपा को यह नहीं भूलना चाहिए कि वर्ष 2014 के बाद से उत्तर प्रदेश में उसकी बढ़त की मुख्य वजह उसका जातीय समीकरण को अपने पक्ष में करना रहा है। चाहे वह गैर यादव-गैर जाटव की राजनीति रही हो या फिर पिछड़ों को पाले में करने की सफल कवायद। हालांकि इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि वक्त के साथ 1993 जैसा जातीय उन्माद अब कुंद पड़ चुका है।

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